मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
DevanagariHindipublished335 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
पूर्वमेघः
| श्लोक | श्लो० | पृ० | श्लोक | श्लो० | पृ० |
|---|---|---|---|---|---|
| अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः० | १४ | ३७ | त्वन्निष्यन्दोच्छ्वसति-वसु० | ४२ | १०५ |
| अप्यन्यस्मिञ्जलधर ! म० | ३४ | ८९ | त्वय्यादातुं जलमवनते शा० | ४६ | ११६ |
| अम्भोविन्दुग्रहणचतुरांश्च० | ५५ | त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति० | १६ | ४३ | |
| आपृच्छस्व प्रियसखममुं० | १२ | ३३ | त्वामारूढं पवनपदवीमुद्० | ८ | २४ |
| आराध्यैनं शरवणभवं देव० | ४५ | ११४ | त्वामासार-प्रशमित-वनो० | १७ | ४५ |
| आसीनानां सुरभितशिलं० | ५२ | १३८ | दोर्घीकुर्वन्पटुमदकलं कू० | ३१ | ७७ |
| उत्पश्यामि त्वयि तटगते० | ५० | १४७ | धूमज्योतिः सलिलमरुतां० | ५ | १५ |
| उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे० | २२ | ५७ | नीचैराख्यं गिरिमधिवसे० | २५ | ६३ |
| कर्तुं यच्च प्रभवति महीमु० | ११ | ३१ | नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं० | २१ | ५३ |
| कश्चित्कान्ता-विरहगुरुणा० | १ | १ | (पत्रश्यामा दिनकरहयस्प०) | ८४ | |
| गच्छन्तीनां रमणवसतिं० | ३७ | ९७ | पश्चादुच्चैर्भुज-तरुवनं म० | ३६ | ९४ |
| गत्वा चोर्ध्वं दशमुखभुजो० | ५८ | १४५ | पाण्डुच्छायोपवनवृतयः के० | २३ | ५९ |
| गम्भीरायाः पयसि सरित० | ४० | १०३ | पादन्यासैः क्वणित-रश० | ३५ | ९२ |
| छन्नोपान्तः परिणतफल० | १८ | ४६ | प्रत्यासन्ने नभसि दयिता० | ४ | १३ |
| जातं वंशे भुवन-विदिते० | ६ | १८ | (प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं व०) | ८२ | |
| जालोद्गीर्णैरुपचितवपु० | ३२ | ८५ | प्राप्यावन्तीनुदयनकथा-को० | ३० | ७५ |
| ज्योतिर्लेखावलयि गलितं० | ४४ | ११२ | प्रालेयाद्रेरुप-तटमति-क्र० | ५६ | १४२ |
| तं चेद्वायौ सरति सरल० | ५३ | १३३ | ब्रह्मावतं जनपदमथच्छा० | ४८ | १२१ |
| तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्या० | ५५ | १३८ | भर्तुः कण्ठच्छविरितिगणैः० | ३३ | ८७ |
| तत्र स्कन्दं नियतवसतिं० | ४३ | ११० | मन्दं मन्दं नुदति पवन० | ९ | २७ |
| तत्रावश्यं वलयकुलिशोद्० | ६१ | १५१ | मार्गं तावच्छृणु कथयत० | १३ | ३५ |
| तस्मात् गच्छेरनुकनखलं० | ५० | १२६ | ये संरम्भोत्पतनरभसाः० | ५४ | १३६ |
| तस्मिन्काले नयनसलिलं० | ३९ | १०१ | रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इ० | १५ | ४१ |
| तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबला० | २ | ६ | वक्रः पन्था यदपि भवतः० | २७ | ६८ |
| तस्य स्थित्वा कथमपि पुर० | ३ | १० | विश्रान्तः सन्ब्रज वनन० | २६ | ६६ |
| तस्याः किञ्चित्करधृतमि० | ४१ | १०८ | वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रे० | २८ | ७१ |
| तस्याः पातुं सुरगज इव० | ५१ | १२१ | वेणी-भूतप्रतनु-सलिला० | २९ | ७३ |
| तस्यास्तिक्तैर्वनगजमदैर्वा० | २० | ५१ | शब्दायन्ते मधुरमनिलैः० | ५६ | १४० |
| तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव० | ६३ | १५५ | सन्तप्तानां त्वमसि शरणं० | ७ | २१ |
| तां कस्यांचिद्भवन-वलभौ० | ३८ | ९९ | स्थित्वा तस्मिन्वनचर० | १९ | ४८ |
| तां चावश्यं दिवसगणनात्० | १० | २९ | (हारांस्तारांस्तरलगुटिका०) | ८० | |
| तामुत्तीर्य व्रज परिचितभ्रू० | ४७ | ११९ | हित्वा तस्मिन् भुगज-व० | ६० | १४९ |
| तेषां दिक्षु प्रथितविदिशा० | २४ | ६१ | हित्वा हालामभिमतरसां० | ४९ | १२३ |
| हेमाम्भोजप्रसवि सलिलं० | ६२ | १५३ |
४ मे० दू०