मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
DevanagariHindipublished335 पृष्ठ
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उत्तरमेघः
| श्लोक-प्रतीक | श्लो० | पृ० | श्लोक-प्रतीक | श्लो० | पृ० |
|---|---|---|---|---|---|
| अक्ष्यान्तर्भवन-निधयः प्र० | ८ | १७९ | नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथि० | ५ | १७२ |
| अङ्गेनाङ्गं प्रतनु तनुना० | ३९ | २५४ | नूनं तस्यां प्रबलरुदितो० | २१ | २१० |
| आद्ये बद्धा विरहदिवसे या० | २९ | २३१ | नेत्रा नीतोः सततगतिना० | ६ | १७४ |
| आधिक्षामां विरहशयने स० | २६ | २२४ | पादानिन्दोरमृतशिशिरा० | २७ | २२६ |
| (आनन्दोत्थं नयनसलिलं०) | १६५ | भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे ! वि० | ३६ | २४७ | |
| आलोके ते निपतति पुरा० | २२ | २१३ | भित्त्वासद्यः किसलयपुटा० | ४४ | २६५ |
| आश्वास्यैवं प्रथमविरहोद० | ५० | २८० | भूयश्चाहं त्वमपि शयने० | ४८ | २७४ |
| इत्याख्याते पवनतनयं मै० | ३७ | २४९ | मत्वा देवं धनपतिसखं य० | १० | १८३ |
| उत्सङ्गे वा मलिनवसने० | २३ | २१६ | मन्दाकिन्याः सलिल-शि० | ४ | १७० |
| एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रा० | ५२ | २८५ | मामाकाशप्रणिहितभुजं० | ४३ | २६३ |
| एतस्मान्मां कुशलिनमभि० | ४९ | २७६ | यत्र स्त्रीणां प्रियतमभुजा० | ७ | १७७ |
| एभिः साधो हृदयनिहि० | १७ | २०० | (यत्रोन्मत्तभ्रमरमुखराः०) | १६३ | |
| कच्चित्सौम्य ! त्ववसि० | ५१ | २८२ | यस्यां यक्षाः सितमणिम० | ३ | १६७ |
| गत्युत्कम्पादलकपतितैर्य० | ९ | १८१ | रक्ताशोकश्चलकिसलयः० | १५ | १९५ |
| गत्वा सद्यः कलभतनुतां० | १८ | २०२ | रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्ज० | ३२ | २३८ |
| जाने सख्यास्तव मनः म० | ३१ | २३६ | वापी चास्मिन् मरकत० | १३ | १९० |
| (तं सन्देशं जलधरवरो ) | २८८ | वामश्चास्याः कररुहपदैर्मु० | ३३ | २४० | |
| तत्रागारं धनपतिगृहानुत्त० | १२ | १८८ | वासश्चित्रं मधु नयनयो० | ११ | १८६ |
| तन्मध्ये च स्फटिकफलका० | १६ | १९७ | विद्युत्वन्तं ललित-वनि० | १ | १५८ |
| तन्वी श्यामा शिखरिदश० | १९ | २०४ | शब्दाख्येयं यदपि किलः० | ४० | २५६ |
| तस्मिन् काले जलद ! यदि० | ३४ | २४३ | शापान्तो मे भुजगशयना० | ४७ | २७१ |
| तस्यास्तीरे रचितशिखरः० | १४ | १९२ | शेषान्मासान्विरहदिवस्था० | २४ | २१९ |
| तां जानीथाः परिमितक० | २० | २०७ | श्यामास्वङ्गं चकितहरि० | ४१ | २५८ |
| तामायुष्मन्म च वचना० | ३८ | २५२ | (श्रुत्वाबातांजलदकवितां०) | २९० | |
| तामुप्याप्य स्वजलकणिका० | ३५ | २४५ | संक्षिप्यते क्षण इव कथं० | ४५ | २६७ |
| त्वामालिख्य प्रणयकुपितां० | ४२ | २६१ | सव्यापारामहनि न तथा० | २५ | २२१ |
| नन्वात्मानं बहु विगणय० | ४६ | २६९ | सा संन्यस्ताभरणमबला० | ३० | २३३ |
| निःश्वासेनाधरकिसलयक० | २८ | २२८ | हस्ते लीलाकमलमलके० | २ | १६० |