भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

उत्तरमेघः

श्लोक-प्रतीकश्लो०पृ०श्लोक-प्रतीकश्लो०पृ०
अक्ष्यान्तर्भवन-निधयः प्र०१७९नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथि०१७२
अङ्गेनाङ्गं प्रतनु तनुना०३९२५४नूनं तस्यां प्रबलरुदितो०२१२१०
आद्ये बद्धा विरहदिवसे या०२९२३१नेत्रा नीतोः सततगतिना०१७४
आधिक्षामां विरहशयने स०२६२२४पादानिन्दोरमृतशिशिरा०२७२२६
(आनन्दोत्थं नयनसलिलं०)१६५भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे ! वि०३६२४७
आलोके ते निपतति पुरा०२२२१३भित्त्वासद्यः किसलयपुटा०४४२६५
आश्वास्यैवं प्रथमविरहोद०५०२८०भूयश्चाहं त्वमपि शयने०४८२७४
इत्याख्याते पवनतनयं मै०३७२४९मत्वा देवं धनपतिसखं य०१०१८३
उत्सङ्गे वा मलिनवसने०२३२१६मन्दाकिन्याः सलिल-शि०१७०
एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रा०५२२८५मामाकाशप्रणिहितभुजं०४३२६३
एतस्मान्मां कुशलिनमभि०४९२७६यत्र स्त्रीणां प्रियतमभुजा०१७७
एभिः साधो हृदयनिहि०१७२००(यत्रोन्मत्तभ्रमरमुखराः०)१६३
कच्चित्सौम्य ! त्ववसि०५१२८२यस्यां यक्षाः सितमणिम०१६७
गत्युत्कम्पादलकपतितैर्य०१८१रक्ताशोकश्चलकिसलयः०१५१९५
गत्वा सद्यः कलभतनुतां०१८२०२रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्ज०३२२३८
जाने सख्यास्तव मनः म०३१२३६वापी चास्मिन् मरकत०१३१९०
(तं सन्देशं जलधरवरो )२८८वामश्चास्याः कररुहपदैर्मु०३३२४०
तत्रागारं धनपतिगृहानुत्त०१२१८८वासश्चित्रं मधु नयनयो०१११८६
तन्मध्ये च स्फटिकफलका०१६१९७विद्युत्वन्तं ललित-वनि०१५८
तन्वी श्यामा शिखरिदश०१९२०४शब्दाख्येयं यदपि किलः०४०२५६
तस्मिन् काले जलद ! यदि०३४२४३शापान्तो मे भुजगशयना०४७२७१
तस्यास्तीरे रचितशिखरः०१४१९२शेषान्मासान्विरहदिवस्था०२४२१९
तां जानीथाः परिमितक०२०२०७श्यामास्वङ्गं चकितहरि०४१२५८
तामायुष्मन्म च वचना०३८२५२(श्रुत्वाबातांजलदकवितां०)२९०
तामुप्याप्य स्वजलकणिका०३५२४५संक्षिप्यते क्षण इव कथं०४५२६७
त्वामालिख्य प्रणयकुपितां०४२२६१सव्यापारामहनि न तथा०२५२२१
नन्वात्मानं बहु विगणय०४६२६९सा संन्यस्ताभरणमबला०३०२३३
निःश्वासेनाधरकिसलयक०२८२२८हस्ते लीलाकमलमलके०१६०

॥ श्रीः ॥

मेघदूतम्

'इन्दुकला' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्


अथ पूर्वमेघः

कश्चित् कान्ता-विरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः ।
यक्षश्चक्रे जनक-तनया-स्नान-पुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ॥ १ ॥

अन्वयः—स्वाधिकारात् प्रमत्तः कान्ताविरहगुरुणा वर्षभोग्येण भर्तुः शापेन अस्तङ्गमितमहिमा कश्चित् यक्षः जनक-तनया-स्नानपुण्योदकेषु स्निग्धच्छाया-तरुषु रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे।

व्याख्या—स्वाधिकारात् = निजकर्तव्यात्, प्रमत्तः = असावधानः, कान्ता-विरहगुरुणा = प्रेयसीवियोगदुःसहेन, वर्षभोग्येण = संवत्सराप्येन, भर्तुः = स्वामिनः कुबेरस्येति यावत्, शापेन = दुरेषणया, अस्तङ्गमितमहिमा = अक्षम-महत्त्वः, कश्चित् = अकथ्यनामा, यक्षः = गुह्यकः, जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु = सीतामज्जनपूतजलेषु, स्निग्धच्छायातरुषु = सान्द्रच्छायावृक्षेषु, रामगिर्याश्रमेषु = रामगिरिनामकपर्वताश्रमेषु, वसतिं = वासं, चक्रे = चकार।

शब्दार्थः—स्वाधिकारात् = अपने कर्तव्य से, प्रमत्तः = असावधान, कान्ता-विरहगुरुणा = प्रेयसी के वियोग से दुःसह, वर्षभोग्येण = (एक) वर्ष तक भोगे जाने वाले, भर्तुः = मालिक (कुबेर) के, शापेन = शापसे, अस्तंगमितमहिमा = जिसकी महिमा मलिन (असमर्थ) बना दी गयी है, यक्षः = गुह्यक "एक

२ | मेघदूतम्

देवयोनिविशेष," जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु = सीता जी के स्नान करने के कारण पवित्र हो गया है जल जहाँ का, स्निग्धच्छायातरुषु = घने छाया वाले वृक्ष हैं जहाँ पर, ( ऐसे ) रामगिर्याश्रमेषु = रामगिरि नामक पर्वत के आश्रमों में ' वसति = अपना निवास, चक्रे = बनाया।

**भावार्थ:—**स्वकर्तव्ये असावधानः कश्चिदज्ञातनामधेयो यक्षः, स्वामिनः कुबेरस्य प्रियावियोगरूपैकवर्षभोग्यात् शापात्, (तमभिशप्तसमयमतिवाहयितुम्) गहनच्छायायुक्तवृक्षेषु "रामगिरि" पर्वतकुटीरेषु स्वनिवासं कृतवान् ।

**हिन्दी—**अपने कर्तव्य में असावधानी करने वाले, ( अत एव ) अपनी प्रियतमा के वियोग के कारण दुःसह एवं एक वर्ष तक भोगे जाने वाले स्वामी कुबेर के शाप से असमर्थ महिमावाले, किसी यक्ष ने, "रामगिरि" नामक पर्वत के आश्रमों में अपना निवासस्थान बनाया ।

**समास:—**कान्ताविरहगुरुणा = कान्तायाः विरहः कान्ताविरहः ( ष० तत् ० ) कान्ताविरहेण गुरुः ( तृ० तत् ० ) कान्ताविरहगुरुस्तेन कान्ताविरहगुरुणा । स्वाधिकारात् = स्वस्य अधिकारः स्वाधिकारः ( ष० तत् ०) अथवा स्वः अधिकारः = स्वाधिकारः ( कर्मधारय ) । अस्तंगमितमहिमा = अस्तंगमितो महिमा यस्य ( बहुव्रीहि ) स अस्तंगमितमहिमा । वर्षभोग्येण = वर्षं भोग्यः वर्षभोग्यः, यहाँ पर वर्ष के आगे जो द्वितीया विभक्ति है वह "कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से विहित है; पश्चात् "अत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से समास किया गया है । जनकतनयायाः स्नानं = जनकतनयास्नानम् ( ष० तत् ० ) जनकतनयास्नानैः पुण्यानि उदकानि येषु ( बहुव्री० ) जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । स्निग्धच्छायातरुषु = स्निग्धा च सा छाया स्निग्धच्छाया (कर्मधारय), यहाँ पर "पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु" इस सूत्र से "स्निग्धा" इस स्त्रीवाचक शब्दको पुंवद्भाव होकर स्निग्ध ऐसा रूप बना; पश्चात् तुगादि करके स्निग्धच्छाया ऐसा प्रयोग बनाया जाता है । स्निग्धच्छाया प्रधानास्तरवो येषु स्निग्धच्छायातरुषु,यहाँ पर "शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपश्च" इस वार्तिक से "प्रधान" इस मध्यम पद का लोप कर समास किया गया है ।

पूर्वमेघः

कोशः—प्रमादोऽनवधानता इत्यमरः। गुरुस्तु गीष्पते श्रेष्ठे गुरौ पितरि दुर्भरे इति शब्दार्णवः। शापाक्रोशौ दुरेषणा इत्यमरः। विद्याधरोऽप्सरोयक्षरक्षो-गन्धर्वकिन्नराः इत्यमरः। वत्सरे वर्षमस्त्रियाम् इत्यमरः। स्निग्धं तु मसृणे सान्द्रे इति शब्दार्णवः। छाया वृक्षो नमेरुः स्यात्।

टिप्पणीस्वाधिकारात्—अधिक्रियते अस्मिन्निति अधिकारः, यहाँ पर ‘अधि’ उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ धातु से अधिकरण में ‘हलश्च’ ( पा० अ० ३।३।१ ) सूत्र से ‘घञ्’ प्रत्यय होकर ‘अधिकारः’ यह शब्द निष्पन्न हुआ है। ‘स्वाधिकारात्’ यहाँ जो पञ्चमी विभक्ति आयी है, वह ‘प्रमत्तः’ इस पद का योग रहने के कारण ‘जुगुप्सा-विराम-प्रमादार्थनामुपसंख्यानम्’ इस वार्तिक से अपादान संज्ञा होकर ‘अपादाने पञ्चमी’ से पंचमी हुई है। प्रमत्तः- ‘प्र’उपसर्ग पूर्वक ‘मद्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय होकर ‘प्रमत्तः’ ऐसा रूप बना है। (प्र + मद् + क्त = प्रमत्तः)। वर्षभोग्येण-इस पद का विभक्त्यादि विश्लेषण तो समास के सन्दर्भ में ही प्रदर्शित कर दिया गया है, यहाँ पर ‘भोग्य’ इस पद के साधुत्व पर थोड़ा विचार किया जा रहा है—‘भोक्तुं योग्यः’ इस विग्रह में पालन और अभ्यवहार ( भक्षण ) इस अर्थ में स्थित रुधादिगणस्थ ‘भुज्’ धातु से ‘ऋहलोर्ण्यत्’ इस से ‘यत्’ प्रत्यय का विधान करके ‘चजोः कुघिण्यतोः’ इस सूत्र से जकार को कुत्व गकार होकर गुणादि करके ‘भोग्य’ ऐसा रूप बनता है। इसी धातु से भक्षण अर्थ में ‘भोज्यं भक्ष्ये’ इस सूत्र से कुत्व का अभाव विधान करके ‘भोज्य’ ऐसा रूप बनता है। भर्तुः—बिभर्ति इति भर्त्ता तस्य भर्तुः, धारण और पोषण अर्थ में विद्यमान ‘(डु) भृञ्’ धातु से ‘ण्वुल्तृचौ’ इस सूत्र से कर्त्ता में तृच् प्रत्यय होकर ‘भर्तृ’ शब्द सिद्ध होता है, उक्त प्रयोग उसी शब्द के षष्ठी एकवचन का है। शापेन—शपनं शापः शप्यते इति शापः इन दोनों विग्रहों से आक्रोश अर्थ में विद्यमान ‘शप्’ धातु से भाव में ‘भावे’ इस सूत्र से ‘घञ्’ प्रत्यय हुआ है; यहाँ पर ‘शाप’ शब्द से हेतु में तृतीया विभक्ति ‘हेतौ’ इस सूत्र से हुई है, क्योंकि यक्ष की महिमा शाप के कारण ही अस्तंगत हुई थी। अस्तङ्गमितमहिमा—‘अस्तम्’ यह मान्त अव्यय है। गमित = गत्यर्थक ‘गम्’ धातु से ‘हेतुमत्ति च’ इस सूत्र से ‘णिच्’ प्रत्यय होकर

४ | मेघदूतम्

‘गमि’ धातु बना, उससे कृदन्तीय ‘क्त’ प्रत्यय होकर ‘गमितः’ ऐसा रूप बनता है (गम् + णिच् + क्त = गमितः) महिमा = महतो भावः इस विग्रह में ‘महत्’ शब्द मे ‘पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा’ इस सूत्र से ‘इमनिच्’ प्रत्यय होकर ‘महिमा’ यह शब्द बना है। कवि ने ‘अस्तङ्गमित-महिमा’ यह विशेषण जो यक्ष के साथ लगाया है वह साभिप्राय है, क्योंकि स्वामी के शाप के द्वारा यदि उसकी महिमा असमर्थ न बना दी गयी होती तो वह अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों के मध्य पाँचवीं सिद्धि ‘प्राप्तिः’ के द्वारा अथवा अदृश्यरूप होकर स्वयं प्रिया से मिल सकता था; अतः कवि ने मेघदूतत्त्व के निर्वाह के लिए यह विशेषण दिया है। रामगिर्याश्रमेषु—यहां पर बहुवचनान्त प्रयोग को देख कर यह प्रतीत होता है कि यक्ष अपनी प्रिया के विरह से इतना खिन्न किंवा अव्यवस्थितचित्त हो गया था कि वह स्थिर रूप से किसी एक आश्रम में नहीं रह पाता था, अतः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में अपना डेरा बदलता रहता था। वल्लभदेव और मल्लिनाथ के मतानुसार चित्रकूट पर्वत ही रामगिरि है। डा० विल्सन के मतानुसार नागपुर से उत्तर रामटेक पर्वत ही रामगिरि है। परन्तु आधुनिक अन्वेषकों का कहना है कि मध्यप्रदेश में जो ‘रामगढ़’ पर्वत है, जो कि अमरकूट या आम्रकूट के समीप है एवं नर्मदा का उद्गम स्थान है ‘रामगिरि’ है। यह मत युक्ति युक्त भी प्रतीत होता है, क्योंकि महाकवि ने भी आगे चलकर इन दोनों वस्तुओं की चर्चा की है। वसति-निवास अर्थ में स्थित ‘वस्’ धातु से ‘वहिवस्यतिभ्यश्च’ इस औणादिक सूत्र से ‘अति’ प्रत्यय होने पर ‘वसति’ रूप बनता है। चक्रे-(डुकृञ् = करणे) करण अर्थ में वर्तमान एवं जिसके अन्त में अकार की इत्संज्ञा की गयी है ऐसे ‘कृ’ धातु से परोक्षभूत ‘लिट्’ लकार आने पर ‘चक्रे’ यह रूप बनता है। यहाँ पर क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त होने के कारण एवं धातु के ‘ञित्’ होने के कारण ‘स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले’ से आत्मनेपद हुआ है। मेघदूत कौन-सा काव्य माना जाय इस प्रकार का प्रश्न उपस्थित होने पर कुछ विद्वानों का कहना है कि ‘प्रस्तुत काव्य खण्डकाव्य है,’ इस उक्ति की पुष्टि में उनका प्रमाण साहित्यदर्पण की ‘खण्डकाव्यं भवेत् काव्यस्यैकदेशानुसारि यत्’

पूर्वमेघः

यह पङ्क्ति है। महाकवि ने “वर्णन के सौष्ठव” को महाकाव्य का प्रयोजक माना है। अतः उनके मतानुयायी विद्वज्जन मेघदूत को महाकाव्य की गणना में रखते हैं। उक्त ग्रन्थ गीतिप्रधान होने के कारण पाश्चात्य विद्वान् मैकडोनल्ड ने इसे “गीति काव्य” माना है। मेघदूतः—"‘मेघ एव दूतः=मेघदूतः’ इस तरह रूपक समास की यदि विवक्षा की जाय तो यह पद पुँल्लिङ्ग एवं अभेद लक्षणया ग्रन्थवाचक बन जायगा। यदि मेघ एव दूतो यस्मिंस्तत् मेघदूतम् अर्थात् मेघ ही हो दूत जिसमें इस प्रकार अन्यपद प्रधान बहुव्रीहि समास की विवक्षा की जाय तो यह पद नपुंसक हो जाता है। निर्विघ्नतापूर्वक ग्रन्थ की समाप्ति के लिए ग्रन्थ के आरम्भ में, ग्रन्थ के मध्य में एवं ग्रन्थ के अन्त में “मङ्गल” किया जाता है, ऐसा शिष्टों का अर्थात् आप्त पुरुषों का आचार है। वह मङ्गल तीन प्रकार का होता है, जैसे कि “आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशोऽपि तन्मुखम्”। अर्थात् (१) आशीर्वादात्मक (२) नमस्क्रियात्मक और (३) वस्तु-निर्देशात्मक, इस प्रकार तीन तरह के मंगल होते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ ‘क’ अक्षर से प्रारम्भ होता है जो कोश के अनुसार वायु, ब्रह्मा और सूर्य का वाचक है (मरुते वेधसि ब्रध्ने) अतः यहाँ भी मंगल किया गया है ऐसा समझना चाहिए। यहाँ वस्तु-निर्देशात्मक मंगल किया गया है। रस—प्रस्तुत ग्रन्थ में शृङ्गार रस है। शृंगार रस के दो भेद होते हैं—(१) संयोग और (२) विप्रलम्भ। विप्रलम्भ के भी चार भेद हैं—(१) पूर्वराग (२) मान (३) प्रवास और (४) करुण। यहाँ पर यक्षाधिप के शाप से इस अज्ञात नामा यक्ष को 'प्रवास' मिला है, अतः इस काव्य में प्रवास रूप विप्रलम्भ शृङ्गार है। कश्चित् -- जिस कविचक्रचूडामणि कालिदास के लिए वागधिष्ठात्री देवता वाणी ने स्वयं ‘त्वमेवाहं’ का सुस्पष्ट उद्घोष किया था, क्या वे अपने ग्रन्थ में उस यक्ष का नाम नहीं लिख सकते थे? पर उन्होंने नहीं लिखा, इसका क्या कारण? इस पर विचार करने से यही कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्र ने अभिशप्त व्यक्ति का नाम लेने का निषेध किया है। ‘भर्तुराज्ञां न कुर्वन्ति ये च विश्वासघातकाः। तेषां नामापि न ग्राह्यं शास्त्रादौ तु विशेषतः।।' इत्यादि। आधुनिक टीकाकार तो इसका हेतु यह प्रस्तुत करते हैं कि काल्पनिक वृत्त वाले काव्यों में नाम बतलाने की जरूरत नहीं थी!

६ मेघदूतम्

अलंकार—(क)—यहाँ पर शाप के प्रति ‘स्वाधिकारात्प्रमत्तः’ को हेतु बताया गया है एवञ्च ‘अस्तङ्गमितमहिमा’ के प्रति शाप को हेतुक बताया गया है अतः यहाँ पदार्थहेतुक काव्यलिङ्ग अलङ्कार है।

(ख) विशेषण यदि साभिप्राय हो तो ‘परिकरांकुर’ अलंकार होता है ऐसा आलंकारिकों का सिद्धान्त है। यहाँ ‘अस्तङ्गमितमहिमा’ रूप विशेषण साभिप्राय है अतः यहाँ पर भी परिकरांकुर अलङ्कार है।

छन्द—‘मन्दाक्रान्ता जलधिशडगैम्भौ नतौ ताद्गुरू चेत्’। इस लक्षण के अनुसार मेघदूत में मगण ( SSS ), भगण ( SII ), नगण ( III ), तगण ( SSI ), तगण ( SSI ) और दो गुरु ( SS ) होने से मन्दाक्रान्ता छन्द है। यह छन्द समवृत्त है; इसमें चौथे, छठे एवं सातवें अक्षरों पर यति (विश्राम) होता है। जैसा कि—

कश्चित्का न्ताविर हगुरु णास्वाधि कारात्प्र मत्तः । । १ ।। S S S S I I I I I S S I S S I S S

तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबला-विप्रयुक्तः स कामी नीत्वा मासान् कनकवलय-भ्रंशरिक्त-प्रकोष्ठः । आषाढस्य प्रथम-दिवसे मेघमाश्लिष्ट-सानुं वप्रक्रीडा-परिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श ॥ २ ॥

अन्वयः—तस्मिन् अद्रौ अबला-विप्रयुक्तः कनकवलयभ्रंश-रिक्त-प्रकोष्ठः कामी सः कतिचित् मासान् नीत्वा, आषाढस्य प्रथमदिवसे आश्लिष्टसानुम् वप्रक्रीडा-परिणतगजप्रेक्षणीयम् मेघम् ददर्श।

व्याख्या—तस्मिन् = पूर्वोक्ते, अद्रौ = पर्वते, रामगिरौ इति यावत्, अबलाविप्रयुक्तः = प्रियाविरहितः, कनकवलयभ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः = स्वर्णकटक-पातशून्य-कक्षान्तरः, कामी = कामुकः, कतिचित् = कतिपयान्, मासान् = त्रिंशद्दिवससमूहात्मक-मासाभिधेयान्, अष्टौमासानित्यर्थः, ‘शेषान् मासान् गमय चतुरः’ इति सप्तचत्वारिंशत्तमे (४७) श्लोके कथयिष्यति, अतः। नीत्वा = व्यतीत्य, आषाढस्य =

पूर्वमेघः |

एतन्नामकस्य मासस्य, प्रथमदिवसे = आद्याह्नो, आश्लिष्टसानुम् = समालिङ्गित-शृङ्गम्, वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम् = उत्खातकेलि-संलग्न-तिर्यग्दन्त-प्रहार-हस्तिवलोकनीयम् । मेघम् = वारिदम्, ददर्श = अवलोकयामास ।

शब्दार्थः—तस्मिन् = उस ( पहले कहे गये ) में, अद्रौ = पर्वत में, अर्थात् रामगिरि में, अबलाविप्रयुक्तः = अपनी प्रिया से बिछुड़ा हुआ, कनकवलय-भ्रंशरिक्तप्रकोष्ठः = सोने के कङ्कण गिरजाने से सूनी हो गयी है कलाई जिसकी, कामी = विषयविलासी, सः = वह यक्ष, कतिचित् = कुछ ( आठ ), मासान् = महीनों को, नीत्वा = बिताकर, आषाढस्य = आषाढ़ महीने के, प्रथमदिवसे = पहले दिन, आश्लिष्ट-सानुम् = पहाड़ की चोटी को जकड़े हुए, वप्रक्रीडा-परिणत-गजप्रेक्षणीयम् = टेढ़े होकर खेल में टीले पर दांतों से प्रहार करने वाले हाथी के समान देखने योग्य, मेघम् = बादल को, ददर्श = देखा ।

भावार्थः—वल्लभावियुक्तः सः कामुको यक्षः, अत्यन्तकार्श्यात् यस्य मणिबन्धतः कनक-कटकोऽपि भ्रष्टः सः पूर्वोक्त-रामगिरौ अष्टौ मासान् व्यतीत्य आषाढस्य प्रारम्भ एव दिने पर्वतशृङ्गसंलग्नं, यस्यां क्रीडायां हस्तिनः तिर्यग्भूय दन्तैः उच्चस्थानेषु प्रहारं कुर्वन्ति ( मृत्तिकादिकमुत्खनन्ति ) तस्यां क्रीडायां संलग्नं दर्शनीयं हस्तिनमिव मेघं ददर्श ।

हिन्दी—अपनी प्राणप्रिया से वियुक्त, ( अत एव ) दुबले होने के कारण स्वर्णकङ्कण के गिर जाने से शून्य मणिबन्ध वाले कामी उस यक्ष ने, आषाढ़ महीने के पहले ही दिन, पर्वत की चोटी से सटे हुए एवं टीले पर तिरछे होकर दांतों से प्रहार करने वाली क्रीडा में लगे हुए हाथी की तरह देखने योग्य मेघ को देखा ।

समासः—अबलाविप्रयुक्तः = अबलया विप्रयुक्तः अबलाविप्रयुक्तः ( तृ० तत्० ), कनकस्य वलयः कनकवलयः ( ष० तत्० ) तस्य भ्रंशेन रिक्त-प्रकोष्ठो यस्य स कनकवलयभ्रंश-रिक्तप्रकोष्ठः ( बहुव्रीहि ), वप्रक्रीडासु परिणतः = वप्रक्रीडापरिणतः ( स० त० ), स चासौ गजश्च इति वप्रक्रीडा-परिणतगजः ( कर्मधारय ) तद्वत् प्रेक्षणीयम् वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम् ( उपमान कर्मधारय ) ।

मेघदूतम्

कोशः— स्त्री योषिदबला इत्यमरः । कटकं वलयोऽस्त्रियाम् इत्यमरः । कक्षान्तरं प्रकोष्ठः स्यात् इति शाश्वतः । तिर्यग्दन्तप्रहारस्तु गजः परिणतो मतः इति हलायुधः । उत्खातकेलिः शृङ्गाद्यैर्वप्रक्रीडा निगद्यते इति शब्दार्णवः । अद्रिगोत्र-गिरि-ग्रावा-चल-शैल-शिलोच्चयाः इत्यमरः । अभ्रं मेघो वारिवाहः इत्यमरः ।

टिप्पणी— अबला=अविद्यमानं बलं यस्याः सा अबला, यहाँ पर “नञोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वाचोत्तरलोपः” इस वार्तिक से नञ् बहुव्रीहि समास हुआ है । यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि अबला में अपुत्रः की तरह समास न होकर 'अनुदरा कन्या' की तरह समास हुआ है, क्योंकि नञ् का केवल अभाव मात्र ही अर्थ नहीं है अपितु ६ अर्थ हैं—

“तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता ।
अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ॥

इसका अभिप्राय यह है कि नञ् के सादृश्य, अभाव, भिन्नता, अल्पता, अप्रशस्तता और विरोध ये ६ अर्थ हैं । यहाँ अल्प अर्थ में “नञ्” है ।

विप्रयुक्तः— ( विप्र + युज् + क्त ) यद्यपि यहाँ पर योग ( सम्बन्ध ) अर्थ में विद्यमान “युज्” धातु से “क्त” प्रत्यय होकर उक्त रूप निष्पन्न हुआ है, परन्तु “वि” और “प्र” ये दो उपसर्ग लग जाने से अर्थ बिल्कुल विपरीत हो गया । कहा भी गया है—

“उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते ।
प्रहाराहारसंहार-विहार-परिहारवत् ॥

कामी— उक्त पद की निष्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है—

१—'कामयते तच्छीलः अस्यास्तीति' इस विग्रह में इच्छार्थक 'कम्' धातु से “सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये” इस सूत्र से “णिनि” प्रत्यय करके “कामिन्” शब्द बनाके—“कामी” की निष्पत्ति हो गयी । २—कमनं कामः इस विग्रह में “कम्” धातु से भाव में “भावे” इस सूत्र से “घञ्” प्रत्यय करके “कामः” बना लेंगे पश्चात् “कामः अस्ति” इस विग्रह में “अत इनिठनौ” इस सूत्र से इनि प्रत्यय करके “कामिन्” शब्द बनायेंगे । यक्ष का यह विशेषण

पूर्वमेघः

देकर कवि ने यक्ष के लिए प्रिया-वियोग की असहायता बताई है। कतिचित्— “किम्” शब्द से “किमः संख्या परिमाणे डति च” इस सूत्र से “डति” प्रत्यय करके (किम् + डति) “कति” शब्द बनाके उससे “चित्” अव्यय जोड़कर “कतिचित्” शब्द बनाते हैं। कतिशब्द हमेशा बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है। आषाढः— “आषाढा इति नामकेन नक्षत्रेण युक्ता पौर्णमासी” ऐसे विग्रह में, आषाढा इस प्रातिपदिक से “नक्षत्रेण युक्तः कालः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् णित् होने के कारण स्त्रीत्व की विवक्षा में “टिड्ढाणञ्द्वयस-ज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्-ठञ्कञ्क्वरपः” इस सूत्र से “ङीप्” करके “आषाढी” ऐसा पद बनाते हैं (आषाढा + अण् + ङीप् = आषाढी)। आषाढ्यस्ति अस्मिन् मासे इस विग्रह में “आषाढी” इस पदसे “साऽस्मिन् पौर्णमासी” इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके “आषाढ” ऐसा मास वाचक पद निष्पन्न होता है। प्रथमदिवसे— कुछ लोग “प्रत्यासन्ने नभसि” अर्थात् श्रावण महीने के समीप आने पर इस पद के सामञ्जस्य के लिए प्रथमदिवसे के स्थान पर ‘प्रशम-दिवसे’ अर्थात् आषाढ़ के बीत जाने पर ऐसा पाठ मानते हैं। परन्तु मल्लिनाथ जी ने इसका विरोध किया है और उन्होंने लिखा है कि यहाँ पर श्रावण का सामीप्य विवक्षित है अतः उल्लिखित पाठ ही युक्त है। वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम्— उत्खात-केलिः शृङ्गोचैः वप्रक्रीडा निगद्यते। इति शब्दार्णवः। अर्थात् जिस खेल में पशु सींग या दाँत इत्यादि से प्रहार कर मिट्टी आदि कुरेदें उसे ‘वप्रक्रीडा’ कहते हैं। ‘तिर्यग्दन्तप्रहारस्तु गजः परिणतो मतः’ हलायुध कोश के इस वाक्य के द्वारा तिरछे होकर जो प्रहार करे उस हाथी को ‘परिणत’ कहते हैं, तब तो ‘परिणत’ शब्द से ही ‘गज’ शब्द का बोध हो जाता है पुनः गज पद देना पुनरुक्त दोष है। अतः उसके निवारण के लिए परिणत का अर्थ उक्त हाथी नहीं अपितु सामान्य ‘संलग्न’ माना जाय और उसका गज के साथ कर्मधारय समास किया जाय तो काम बन जायेगा। वप्रक्रीडायां परिणतः = वप्रक्रीडापरिणतः, स चासो गजश्च इति वप्रक्रीडापरिणतगजः इति। इस तरह पुनरुक्त दोष का वारण हो जायेगा।

१०मेघदूतम्

**अलंकार—**यहाँ पर मेघ की उपमा हाथी से दी गयी है, ‘इव’ आदि उपमावाचक शब्द का लोप होने से ‘लुप्तोपमा’ अलंकार है ॥ २ ॥

तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो-
रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ ।
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथा-वृत्ति चेतः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूर-संस्थे ॥ ३ ॥

**अन्वयः—**राजराजस्य अनुचरः अन्तर्बाष्पः (सन्) कौतुकाधानहेतोः तस्य पुरः कथमपि स्थित्वा चिरं दध्यौ मेघालोके सुखिनः अपि चेतः अन्यथावृत्ति भवति कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने दूरसंस्थे ( सति ) किं पुनः ।

**व्याख्या—**राजराजस्य = कुबेरस्य, अनुचरः = सेवकः स यक्ष इत्यर्थः, अन्तर्बाष्पः = अवरुद्धाक्षिजलः ( सन् ); कौतुकाधानहेतोः = उत्कण्ठोत्पत्तिकारणस्य, तस्य = मेघस्य, पुरः = सम्मुखे, कथमपि = येन केनाऽपि प्रकारेण, बहुप्रयासानन्तरमिति भावः । स्थित्वा = आत्मानं स्थिरीकृत्य, चिरं = बहुसमयपर्यन्तम्, दध्यौ = ध्यानं कृतवान्, निजवल्लभां चिन्तयामासेति भावः । स कथं चिरकालं प्रियां दध्यौ इति प्रश्नं कविः स्वयं समाधत्ते मेघालोके = जलदविलोकिने, सुखिनः अपि = प्रियापार्श्वस्थस्यापि, चेतः = चित्तम्, अन्यथावृत्ति = विचलितप्राय इव ( झङ्कृत इव ) भवति = जायते । कण्ठाश्लेषप्रणयिनि = गलाऽऽलिङ्गनाभिलाषिणि, जने = प्रियारूपे जने, दूरसंस्थे = असमीपस्थे ( सति ), किं पुनः = का वार्ता ( विरहिणो जनस्य ) ।

**शब्दार्थ—**राजराजस्य = कुबेर के, अनुचरः = सेवक ने, अन्तर्बाष्पः = आँखों के अन्दर ही अश्रु को रोके हुए, कौतुकाधानहेतोः = उत्कण्ठा होने के कारणीभूत, मेघस्य = मेघके, पुरः = सामने, कथमपि = किसी तरह (बहुत प्रयास करने के बाद), स्थित्वा = बैठकर, चिरम् = बहुत देर तक, दध्यौ = ध्यान किया, अर्थात् अपनी प्रिया का स्मरण किया । उसने प्रिया का स्मरण क्यों किया, उसमें कारण बताते हैं—मेघालोके = बादल के दीख जाने पर, सुखिनः

पूर्वमेघ: १५

अपि=सुखी (व्यक्ति) का भी, अर्थात् जो लोग अपनी प्रिया के पास हैं उनका भी, चेतः=चित्त, अन्यथा-वृत्ति और ही तरह का अर्थात् विकृत, भवति=हो जाता है (तो फिर), कण्ठाश्लेषप्रणयिनि=गले लगाने की अभिलाषा वाले व्यक्ति के, या गले लगाने की अभिलाषा वाली प्रिया के, दूरसंस्थे=दूर रहने (पर), किं पुनः=तो फिर क्या कहना ।

**भावार्थः—**धनाधिपस्य सोऽनुचरः निजोत्कण्ठोत्पादकस्य जलदस्य सम्मुखं बहुप्रयासेन स्थित्वा निजवल्लभां बहुकालपर्यन्तं चिन्तयामास । यतो हि मेघसमालोकनेन प्रियासमीपस्थस्यापि जनस्य चित्तं विकृतं भवति, तस्य जनस्य पुनः का कथा यः खलु प्रिया-गलाश्लेषाभिलाषी वर्तते अथच दूरस्थोऽपीति ।

**हिन्दी—**कुबेर का वह सेवक (यक्ष), अन्दर ही अन्दर आँसुओं को थामे हुए, उत्कण्ठा पैदा करने वाले उस मेघ के सामने किसी तरह (बहुत प्रयास के बाद) रुककर बहुत देर तक (प्रिया के विषय में) सोचता रहा । क्योंकि बादल के दीखने पर सुखी (प्रिया युक्त) व्यक्ति का भी चित्त विकृत हो जाता है; तो फिर गले मिलने वाली प्रिया के, अथवा गले मिलने वाले व्यक्ति के दूर रहने पर कहना ही क्या ?

**समासः—**राज्ञां राजा=राजराजः (ष० तत्०) तस्य=राजराजस्य, अन्तःस्तम्भितं बाष्पं यस्य स अंतर्बाष्पः (मध्यमपदलोपी बहुव्रीहि), कौतुकस्य आधानम्=कौतुकाधानम् (ष० तत्०) कौतुकाधानस्य हेतुः तस्य कौतुकाधानहेतोः, मेघस्य आलोकः=मेघालोकः (ष० तत्०), अन्यथा वृत्तिर्यस्य सः अन्यथावृत्तिः (बहुव्रीहि), दूरे संस्था यस्य (बहुव्रीहि) सः दूरसंस्थः तस्मिन् दूरसंस्थे । कण्ठस्य आश्लेषः=कण्ठाश्लेषः (ष० तत्०) तस्य प्रणयी कण्ठाश्लेषप्रणयी (ष० तत्०) तस्मिन् कण्ठाश्लेषप्रणयिनि ।

**कोशः—**राजराजो धनाधिपः इत्यमरः । अस्रु-नेत्राम्बुरोदनञ्चास्रमश्रु चेत्यमरः । कौतुकं चाभिलाषे स्यादुत्सवे नर्महर्षयोः इति विश्वः । कथमादि तथाप्यन्तं यत्न-गौरव-बाढयोः इत्युज्ज्वलः । चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः इत्यमरः । आलोको दर्शनोद्योतो इत्यमरः ।

१२मेघदूतम्

टिप्पणी— राज्ञां राजा = राजराजः ( ष० तत्० ) यहाँ पर समासप्रयुक्त सुप्लोपादि कार्य हो जाने पर ‘‘राजाऽहःसखिभ्यष्टच्’’ इस सूत्र से समासान्तटच् प्रत्यय होकर ‘‘राजराज’’ यह प्रातिपदिक बना पश्चात् षष्ठी विभक्ति के आने पर ‘राजराजस्य’ यह रूप निष्पन्न होगा।

अनुचरः— अनु = पश्चात् चरति ( गच्छति ) इति अनुचरः, यहाँ पर अनु उपसर्ग पूर्वक गत्यर्थक एवं भक्षणार्थक ‘‘चर’’ धातु से गति अर्थ की विवक्षा में ‘‘नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः’’ इस सूत्र से अच् प्रत्यय हुआ है।

कौतुकम्— कुतुकमेव कौतुकम् = यहाँ स्वार्थ में ‘प्रज्ञादिभ्यश्च’ इस सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ पश्चात् णित्वात् वृद्धि करके ‘कौतुकम्’ रूप बनता है। कुतुक + अण् = कौतुकम्। आधानम् = आङ् उपसर्ग पूर्वक ‘धा’ ‘धातु’ से अधिकरण में ल्युट् प्रत्यय होकर आधानम्, यह बनता है। ( आ + धा + अन )

पुरः = यह अव्यय है। ‘पूर्वा’ शब्द के स्थान पर ‘पूर्वाऽधरावराणामसि पुरधवश्चैषाम्’ इस सूत्र से ‘पुर्’ आदेश होकर ‘असि’ प्रत्यय होकर ‘पुरः’ यह निष्पन्न होता है। स्थित्वा = गतिनिवृत्यथंक ‘स्था’ धातुसे ‘क्त्वा’ प्रत्यय होकर स्थित्वा यह रूप बनता है। दध्यौ = यह चिन्तार्थक ‘ध्यै’ धातुके लिट् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। आलोकः = आङ् उपसर्ग पूर्वक दर्शन अर्थ में (कृ) धातु से स्वार्थ में घञ् प्रत्यय हुआ है। ( आ + लोक + घञ् )

आश्लेषः = आश्लेषणम् आश्लेषः = आङ् उपसर्गपूर्वक श्लिषधातु से भाव में ‘घञ्’ प्रत्यय हुआ है। प्रणयी = ‘प्रणयमस्यास्तीति’ विग्रह में ‘अत इनिठनौ’ इस सूत्र से इनि प्रत्यय होकर ‘प्रणयी’ बना है। दूरसंस्थे = संस्थानं संस्था ‘सम्’ उपसर्गपूर्वक ‘स्था’ धातु से भाव में ‘आतश्चोपसर्गे’ इस सूत्र से ‘अङ्’ प्रत्यय होकर ‘संस्था’ यह रूप बनता है।

अलंकार— यहाँ पर बाद के दो चरणों के द्वारा, पहले के चरण में कही गयी ‘चिन्ता’ का समर्थन किया गया है अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। एवञ्च उत्तरार्ध में ‘किं पुनर्दूरसंस्थे’ इस पद के द्वारा ‘कैमुतिकन्यायेन अर्थापत्ति अलंकार है। इस तरह साहित्य-दर्पण के ‘मिथोऽनपेक्षयैतेषां स्थितिः संसृष्टि-रुच्यते।’ इस लक्षण के अनुसार यहाँ ‘संसृष्टि’ अलङ्कार है।

पूर्वमेघः १३

प्रत्यासन्ने नभसि दयिता-जीविता-लम्बनार्थी
जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन् प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥ ४ ॥

**अन्वयः—**सः नभसि प्रत्यासन्ने दयिताजीवितालम्बनार्थी जीमूतेन स्वकुशलमयीं प्रवृत्तिं हारयिष्यन् प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै प्रीतप्रमुख-वचनं स्वागतम् व्याजहार ।

व्याख्या — ध्यानानन्तरं, सः = यक्षः (प्रियाचिन्तकः) नभसि = श्रावणे मासि, प्रत्यासन्ने = बहुनिकटवर्तिनि (सति), दयिताजीवितालम्बनार्थी = प्रियाप्राणधारणाभिलाषी, (सन्) जीमूतेन = मेघेन, स्वकुशलमयीं = निजक्षेम-मुख्याम्; प्रवृत्तिं = वार्ताम्; हारयिष्यन् = वाहयिष्यन्, प्रत्यग्रैः = नवीनैः, कुटजकुसुमैः, वासकुसुमैः, कल्पितार्घाय = विहितानुष्ठानविध्ये, तस्मै = दूतत्वेन सम्प्रेष्यमानाय जीमूतायेत्यर्थः । प्रीतः = प्रहृष्टः (सन्) प्रीतिप्रमुखवचनम् = स्नेहप्रधानोक्तिम्, यथास्यात्तथा, स्वागतम् = शुभागमनम्, व्याजहार = उवाच, मेघस्य स्वागतञ्चकारेत्यर्थः ।

**शब्दार्थः—**ध्यान के बाद, सः = उस यक्ष ने, नभसि = श्रावण मास के, प्रत्यासन्ने = अत्यन्त नजदीक आ जाने पर दयिताजीवितालम्बनार्थी = प्रिया के जीवन का अभिलाषी, जीमूतेन = मेघ के द्वारा, स्वकुशलमयीम् = अपने कुशल प्रवृत्तिम् = समाचार को, हारयिष्यन् = भेजने की इच्छा करता हुआ, प्रत्यग्रैः = नवीन, कुटजकुसुमैः = पर्वतीय पुष्पविशेष के द्वारा, कल्पितार्घाय = जिसके लिए अर्घ (पूजा की विधि) तैयार की गयी है (ऐसे) मेघाय = मेघ के लिए, प्रीतः = प्रसन्न होकर, प्रीतिप्रमुखवचनं = प्रेमपूर्ण शब्दों में, स्वागतम् = शुभागमन, व्याजहार = कहा ।

**भावार्थः—**ध्यानं विधाय सः यक्षः श्रावणे मासे समीपे आगते सति प्रियाया प्राणधारणाभिलाषया मेघेन निजकुशलपूर्णां वार्तां प्रेषणकामः सन् नूतन-गिरि-मल्लिकापुष्पैः तमर्चयित्वा प्रसन्नः सन् प्रेमपूर्णवाणिभिः तस्य स्वागतं चकार ।

१४ मेघदूतम्

**हिन्दी—**श्रावण महीने के समीप आ जाने पर प्रिया के जीवन धारण को चाहने वाले उस यक्ष ने मेघ के माध्यम से अपना कुशल समाचार भेजने की इच्छा से कुटजपुष्पों के द्वारा मेघ की पूजा करके प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण वाक्यों द्वारा उसका स्वागत किया।

**समासः—**दयितायाः जीवितं=दयिताजीवितं (ष० तत्०) तस्य आलम्बनं (ष० तत्०)—तस्य अर्थी (ष० तत्०) दयिताजीवितालम्बनार्थी, कुटजस्य कुसुमम् = कुटजकुसुमम् (ष० तत्०) तैः; कल्पितः अर्घो यस्मै स कल्पितार्घः (बहुव्रीहि) तस्मै कल्पितार्घाय; प्रीतिप्रमुखानि वचनानि यस्मिन् यथा स्यात्तथा इति प्रीतिप्रमुखवचनम् (बहुव्रीहिः)।

**कोशः—**नभाः श्रावणिकश्च सः, नभः खं श्रवणे नभा इत्यमरः। भावुकं भविकं भव्यं कुशल इत्यमरः। कुटजः शक्रो वासको गिरिमल्लिका इति हलायुधः। मूल्ये पूजाविधावर्घः इत्यमरः। मुत् प्रीतिः प्रमदो हर्षः इत्यमरः।

टिप्पणी—प्रत्यासन्ने—'प्रति' और 'आङ्' उपसर्ग पूर्वक, 'सद्' धातु से कर्ता में क्त प्रत्यय होकर 'प्रत्यासन्न' (प्रति + आ + सद् + क्त) बनता है और 'भाव' में सप्तमी विभक्ति आयी है। **दयिताजीवितालम्बनार्थी—**जीवितम् = प्राणधारण अर्थ में विद्यमान 'जीव' धातु से 'नपुंसके भावे क्तः' इस सूत्र से क्त प्रत्यय लाकर 'जीवितम्' यह रूप बनाया जाता है। आलम्बनम्—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'लंबि' धातु से करण में ल्युट् प्रत्यय लाकर 'आलम्बनम्' यह रूप बनता है (आङ् + लबि + अन्)। दयिताजीवितालम्बनमर्थयते तच्छीलः इस विग्रह में 'दयिता-जीवितालम्बन्' उपपदवाले याच्ञा अर्थ में विद्यमान 'अर्थ' धातु से 'सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' इस सूत्र से णिनि प्रत्यय हुआ है एवं 'उपपदमतिङ्' इस सूत्र से उपपद समास हुआ है। **जीमूतः—**जीवनस्य मूतः=जीमूतः; यहाँ पर "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" इस सूत्र से समास एवं "जीवन" इस पदवर्ती "वन" का लोप करके जीमूत शब्द बना है। जीमूतेन यह प्रयोज्य कर्ता है एवं मेघ प्रयोजक कर्ता है। स्वकुशलमयीम् = यहाँ 'स्वकुशल' शब्द से "तत्प्रकृतवचने मयट्" इस सूत्र से 'मयट्' प्रत्यय हुआ है।

पूर्वमेघः १५

पश्चात् स्त्रीत्व की विवक्षा में 'टिड्ढाणञ्' इत्यादि सूत्र से ङीप् प्रत्यय करके 'स्वकुशलमयी' यह शब्द बना है। हारयिष्यन् = हरणार्थक 'हृ' धातु से 'हेतुमति च' से णिच् प्रत्यय करके 'हारि' धातु बना करके पश्चात् 'लृट् शेषे च' इस सूत्र से लृट् लकार लाकर पश्चात् उसके स्थान में 'लृटः सद्वा' इस सूत्र से शतृ प्रत्यय आदेश करके 'हारयिष्यन्' यह रूप साधु होता है। कुटजकुसुमैः = यहाँ 'अर्घ' क्रिया के अत्यन्त उपकारक होने के कारण 'साधकतमं करणम्' इस सूत्र से 'कुटजकुसुम' शब्द की करण संज्ञा हुई और 'कर्तृकरणयोस्तृतीया' से तृतीया विभक्ति आयी है। प्रीतिः = 'प्रीञ्' धातु से 'स्त्रियां क्तिन्' इस सूत्र से क्तिन् प्रत्यय होकर 'प्रीतिः' शब्द बनता है। प्रस्तुत पद्य में कवि यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि यक्षप्रिया अपने प्रिय से वियुक्त है और वर्षा ऋतु आ गयी है, ऐसी अवस्था में अपने प्रिय का कुशल-क्षेम न जानकर कहीं प्राण त्याग न कर ले इसलिए 'यक्ष' अपना कुशल-क्षेम मेघ के द्वारा भेजना चाहता है ॥ ४ ॥

धूमज्योतिःसलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः ? सन्देशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ? इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाऽचेतनेषु ॥ ५ ॥

अन्वयः — धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः मेघः क्व ? पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः सन्देशार्थाः क्व ? इति औत्सुक्यात् अपरिगणयन् गुह्यकः तं ययाचे हि कामार्त्ताः चेतनाऽचेतनेषु प्रकृतिकृपणाः ।

व्याख्या — धूमज्योतिःसलिलमरुतां = धूमतेजोवारिवायूनाम्, सन्निपातः = समवायः, मेघः = वारिदः, क्व = कुत्र, पटुकरणैः = कार्योपयुक्तेन्द्रियवद्भिः, प्राणिभिः = चेतनैः; प्रापणीयाः = वासनीयाः, सन्देशार्थाः = वाचिकाभिधेयाः, क्व = कुत्र, इति उभयोर्महदन्तरम्, इति = एवमन्तरम्, औत्सुक्यात् = इष्टार्थोद्युक्तत्वात्, अपरिगणयन् = अविवेचयन्, गुह्यकः = यक्षः, तं मेघम्, ययाचे = याचयामास, पूर्वो- २ मे० दू०

१६मेघदूतम्

क्तार्थमर्थान्तरन्यासेन प्रदर्शयति कामार्त्तेति । हि = यतः, कामार्त्ताः = मारा-ऽऽकुलाः, चेतनऽचेतनेषु = सजीव-निर्जीवेषु, प्रकृतिकृपणाः = औत्सर्गिककदर्याः ( भवन्ति ) । मदनेन व्याकुलीकृतानां कर्तव्याऽकर्तव्यविषयकविवेकशून्यत्वेन अचेतनमपि मेघं प्रति याचना नाऽनुपयुक्ता इति भावः ।

शब्दार्थः— धूमज्योतिःसलिलमरुतां = धुआँ, तेजः, जल और वायु का सन्निपातः = मिश्रित समूह, मेघः = बादल, क्व = कहाँ, पटुकरणैः = कार्य में समर्थ इन्द्रिय वाले, प्राणिभिः = प्राणियों के द्वारा, प्रापणीयः = भेजे जाने योग्य, सन्देशार्थाः = सन्देश की बात, क्व = कहाँ, दोनों में महान् अन्तर है, इति = इस अन्तर को, औत्सुक्यात् = उत्सुकता के कारण, अपरिगणयन् = बिना विचार किये गुह्यकः = यक्ष ने, तं = उस मेघ से, ययाचे = याचना की, हि = क्योंकि, कामार्त्ताः = कामान्ध, चेतनाचेतनेषु = सजीव और निर्जीव वस्तुओं के विषय में, प्रकृति-कृपणाः = स्वाभाविक रूप से दीन, अर्थात् विवेकशून्य हो जाते हैं ।

भावार्थः— धूमाग्निजलमरुतां समवायरूपोऽयमचेतनः जलदः कुत्र ? कार्यसमर्थेन्द्रिययुक्तैश्चेतनैः वाहनीयाः सन्देशवचनाः कुत्र ? इत्युभयोर्मध्ये महदन्तरं वर्तते, तथापि औत्सुक्यादेवमन्तरं यक्षः अविचारयन् 'मत्संदेशं मत्प्रियापार्श्वं नय' इति ययाचे, अर्थान्तरन्यासेन तं द्रढयति यतो हि कामपीडिताः जनाः 'अयं चेतनः अयमचेतनः' इति विवेकशून्याः स्वभावेनैव भवन्ति ।

हिन्दी— धुआँ, अग्नि, जल और वायु के संमिश्रण से बना कहाँ यह अचेतन मेघ ? और अच्छी इन्द्रियों से युक्त प्राणियों के द्वारा पहुँचाये जाने योग्य सन्देश की बातें कहाँ ? दोनों में कितना अन्तर है, फिर भी उत्कण्ठावश यक्ष ने इस अन्तर को बिना विचारे मेघ से सन्देश ले जाने की याचना की, क्योंकि काम से पीडित जन यह चेतन है यह अचेतन है इस प्रकार के विवेक से शून्य स्वाभाविक रूप से हो जाते हैं ।

समासः— धूमश्च ज्योतिश्च सलिलञ्च मरुच्च = धूमज्योतिः-सलिलमरुतः, तेषाम् ( द्वन्द्व ) । पटूनि करणानि येषां तैः = पटुकरणैः ( बहुव्रीहि ) । सन्देशा एव अर्थाः = सन्देशार्थाः ( कर्मधारय ) । कामेन आर्ताः = कामार्ताः ( तृ० तत्० ) । चेतनाश्च अचेतनाश्च, चेतनाऽचेतनाः ( द्वन्द्व ) तेषु ।

पूर्वमेघः १७

कोशः— प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यशरीरिणः इत्यमरः, करणं साधकतमं क्षेत्रगात्रेन्द्रियेष्वपि इत्यमरः, इष्टार्थोद्युक्त इत्यमरः, सलिलं कमलं जलम् इत्यमरः, यक्षराड्गुह्यकेश्वर इत्यमरः, कामः पञ्चशरः इत्यमरः ।

टिप्पणी— सन्निपातः—सम् + नि + पत् + अ = सन्निपातः यहाँ 'सम्' और 'नि' इन उपसर्ग पूर्व गिरने के अर्थ में विद्यमान पत् ( लृ ) धातु से भाव में 'घञ्' प्रत्यय होकर सन्निपातः यह रूप बना है । पटुकरणैः— क्रियन्त एभिरिति करणानि करण अर्थ में विद्यमान ( डु ) कृञ् धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर करण यह शब्द बना है । पटु विशेषण है । ( कृ + अन = करण ) । प्राणी— प्राणमस्यास्तीति, इस विग्रह में "प्राण" शब्द से "इनि" प्रत्यय हुआ है । प्रापणीयाः— प्रापयितुं योग्याः इस विग्रह में 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप्' धातु से 'अनीयर्' प्रत्यय करके प्रापणीयाः बनाया जाता है । संदेशाः— सम् + दिश् + अ = 'सम्' उपसर्गपूर्वक दिश् धातु से भाव में घञ् प्रत्यय होकर सन्देश यह रूप निष्पन्न होता है । अपरिगणयन्— परि + गण् + शतृ = परिगणयन् 'परि' उपसर्गपूर्वक गिनने के अर्थ में विद्यमान 'गण' ( संस्थाने ) धातु के प्रथमा के समानाधिकरण में भी 'लटः शतृशानचावप्रथमा समानाधिकरणे' इस सूत्र से शतृ प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यहाँ लट् की अनुवृत्ति पहले से ही आती ही थी पुनः 'लट्' का विधान किया जाने के कारण । परिगणयन् यहाँ 'नञ्' सूत्र से समास हुआ है एवं 'नलोपो 'नञ्' से नकार का लोप हो गया और तदन्तर्वर्ति अकार बच गया है । गुह्यकः— संवरण अर्थ में विद्यमान 'गुह' धातु से 'ण्वुल्तृचौ' इस सूत्र से ण्वुल् प्रत्यय होकर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इस सूत्र से 'यक्' का आगम करके 'गुह्यक' यह रूप बनता है । गूहति धनं रक्षति इति गुह्यकः ( गुह + य + अक = गुह्यकः ) । यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमरकोषकार ने प्रथमकाण्ड के स्वर्गवर्ग में ही गुह्यक एवं यक्ष को अलग-अलग देवयोनि विशेष माना है । जैसे—

'विद्याधरोऽप्सरो' 'यक्ष' रक्षोगन्धर्व-किन्नराः ।
'पिशाचो' गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमीदेवयोनयः ॥

१८मेघदूतम्

परन्तु कालिदास ने इन दोनों शब्दों को पर्यायवाची माना है; क्योंकि प्रथम श्लोक में उन्होंने 'यक्ष' शब्द का प्रयोग करके पुनः पञ्चम श्लोक में उसी अभिप्राय से 'गुह्यक' शब्द का प्रयोग किया है। इस तरह इन दोनों में मतभेद प्रतीत होता है परन्तु उसका परिहार 'गोबलीवर्द' न्याय से किया जा सकता है। यहाँ कोशकार ने दोनों को अलग-अलग 'गोबलीवर्द न्याय' से माना है। जैसे 'गो' इस शब्द का अर्थ 'गाय' भी है और बलीवर्द ( बैल ) भी है। बलीवर्द में बलीवर्द रूप 'गो' का अभेद है एवं 'गाय' रूप गो का भेद है। इस प्रकार कोशकार व्याडि ने 'गुह्यक' शब्द का अर्थ 'धनरक्षक यक्ष' माना है। इस प्रकार एक पक्ष सामान्य हुआ और दूसरा गुह्यक धनरक्षक रूप विशेष। इस तरह दोनों के विरोध का परिहार—हो जाता है। धनं रक्षति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः इति व्याडिः। ययाचे=याचना अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'याच्' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का यह रूप है। प्रकृति-कृपणाः = प्रकृत्या कृपणाः यहाँ 'प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्' इस सूत्र से तृतीया होकर तृ० तत्पुरुष समास हुआ है।

**अलंकार:—**इस श्लोक में विषमाऽलङ्कार एवं अर्थान्तरन्यासालङ्कार का अङ्गाङ्गिभाव होने के कारण 'सङ्कर' अलंकार है। क्योंकि श्लोक के पूर्वार्ध के प्रथम चरण में 'मेघ' एवं द्वितीय चरण में 'सन्देश' इन दो विरूप पदार्थों के संघटन होने के कारण साहित्यदर्पण के 'विरूपयोः संघटना या च तद्विषमं स्मृतम्' इस लक्षण के अनुसार यहाँ विषमाऽलङ्कार है। एवञ्च 'कामार्ताः हि प्रकृत' इत्यादि सामान्य से ऊपर के कहे गये विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यासाऽलङ्कार है॥ ५॥

जातं वंशे भुवन-विदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः।
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥ ६॥

पूर्वमेघः १९

अन्वयः—त्वां भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां वंशे जातं कामरूपं मघोनः प्रकृतिपुरुषं जानामि तेन विधिवशात् दूरबन्धुः अहं त्वयि अर्थित्वं गतः अधिगुणे मोघा याच्ञा वरम् अधमे लब्धकामा अपि न ( वरम् )।

व्याख्या—( हे मेघ ! ) त्वाम् = भवन्तम्, भुवनविदिते = लोक-विख्याते, पुष्करावर्तकानां = पुष्करावर्तकाऽख्यानां मेघानां, वंशे = अन्वये, जातम् = उत्पन्नम्, कामरूपं = यथेच्छविग्रहम्, मघोनः = इन्द्रस्य, प्रकृतिपुरुषम् = प्रधानपुरुषम्, जानामि = वेद्मि परिचिनोमीतियावत् । तेन = उच्चकुलोत्पन्नो भवानतः, विधिवशात् = दैवदुर्विपाकात्, दूरबन्धुः = वियुक्तप्रियः, अहं = यक्षः, त्वयि = भवति, भवत्समीपे इत्यर्थः, अर्थित्वम् = याचकत्वम्, गतः = प्राप्तः । अधिगुणे = गुणशालिनि पुरुषे, याच्ञा = याचना, मोघा अपि = व्यर्था अपि, वरम् = श्रेष्ठा, अधमे = गुणरहिते पुरुषे, लब्धकामा अपि = पूर्णमनोरथा अपि ( याच्ञा ) न ( वरम् ) इति ।

शब्दार्थः—(हे मेघ !) त्वाम् = तुमको, भुवन—विदिते = लोकविख्यात, पुष्करावर्तकानाम् = पुष्करावर्तक नाम वाले मेघों के ( श्रेष्ठ ), वंशे = कुल में, जातम् = उत्पन्न हुए को, कामरूपम् = अपना इच्छानुसार शरीर धारण करने वाले को, मघोनः = इन्द्र के, प्रकृतिपुरुषम् = प्रधान पुरुष को, जानामि = (मैं) जानता हूँ । तेन = चूंकि तुम अच्छे कुल में उत्पन्न हुए हो, इसलिये, विधिवशात् = दुर्भाग्यवश, दूरबन्धुः = प्रियजन से वियुक्त, अहम् = मैं, त्वयि = तुम्हारे पास, अर्थित्वम् = याचक रूप में, गतः = आया । अधिगुणे = गुणी व्यक्ति के पास, याच्ञा = याचना, मोघा अपि = निष्फला भी, वरम् = अच्छी है; परन्तु अधमे = गुणरहित व्यक्ति के पास, लब्धकामा अपि = पूर्ण अभिलाषा होने पर भी, न वरम् = श्रेष्ठ नहीं है ।

भावार्थः—हे जलद ! भुवनविख्याते, पुष्करावर्तकाभिधेयानां मेघानां वंशे उत्पन्नं यथेच्छ-विग्रहधारिणमिन्द्रस्य प्रधानपुरुषं भवन्तमहं जानामि, अत एव दैवदुर्विपाकात् प्रियायाः दूरस्थोऽहं भवत्सकाशं याचकत्वेनागतः । भवादृशे गुणशालिपुरुषे निष्फला अपि याचना श्रेष्ठा भवति, अधमे पुरुषे पूर्णाभिलाषा अपि न श्रेष्ठा भवति ।