मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
( ११ )
इसी प्रकार विक्रमोर्वशीय त्रोटक के मङ्गलाचरण में उन्होंने शङ्कर की प्रार्थना की है। जैसे—
वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाऽक्षरः।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते
स स्थाणुः स्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायाऽस्तु वः॥
इसी प्रकार विश्वविश्रुत ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ के मङ्गलाचरण में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर को ही प्रणाम किया है। जैसे—
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥
इस प्रकार हम यह निश्चय कर सकते हैं कि ये भगवान् शिव के उपासक थे और इनका सम्प्रदाय ‘शैव’ था। परन्तु यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के सर्वश्रेष्ट महाकवि कालिदास स्वयं शैव होते हुए भी साम्प्रदायिक संङ्कीर्णता से बहुत ही दूर थे। यह बात मैं नहीं, उनका काव्य स्वयं कह रहा है। कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्माजी की स्तुति एवं रघुवंश के दशम सर्ग में की गयी ‘विष्णु’ की स्तुति इसका प्रमाण है। इतना ही नहीं, ये एक ही परब्रह्म के तीनों रूप (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) मानते हैं-जैसा कि कुमार संभव के सप्तम सर्ग में उन्होंने प्रतिपादित किया है। जैसे—
एकैव मूर्तिर्बिभिदे त्रिधा सा सामान्यमेषां प्रथमाऽवरत्वम्।
विष्णोर्हरस्तस्य हरेः कदाचिद्-वेधास्तयोस्तावपि धातुराद्यौ। (७।४४।)
कालिदास का स्थितिकाल— कालिदास का स्थितिकाल संस्कृत साहित्य के इतिहास में विभिन्न इतिहासज्ञों के अन्तःसाक्ष्य प्रमाणों के आधार पर ईसा के पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक के सात सौ वर्षों के लम्बे समय में झूल रहा है। यहाँ पर संक्षेप में प्रधान मतों का उल्लेख किया जायगा। उनमें सामान्यतः चार मत प्रधान हैं। जिसमें प्रथम है—
( १ ) धारा नगरी के राजा भोज का समय (१००५-१०५४) खृष्ट की ग्यारहवीं शताब्दी। वल्लालसेन नामक किसी विद्वान् ने कालिदास को
( १२ )
राजा भोज का सभा-पण्डित माना है। वल्लालसेन ने यह बात सुनी-सुनायी बातों के आधार पर लिखी है क्योंकि वे स्वयं भोज के समकालिक नहीं थे। यह बात उन्हीं के कथनों से पुष्ट होती है। क्योंकि जहाँ पर कालिदास को भोज का सभा-पण्डित उन्होंने कहा वहीं भारवि, दण्डी, माघ आदि कवियों को भी (जो विभिन्न समय के थे) भोज के सभा-पण्डित कहा है। अतः यह मत बिल्कुल नगण्य है। क्योंकि राजा भोज ग्यारहवीं शताब्दी के थे और कादम्बरी तथा हर्षचरित के रचयिता बाणभट्ट छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुए थे। एवञ्च बाणभट्ट ने अपने 'हर्षचरित' में कालिदास की प्रशंसा में लिखा है—
'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु ।
प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥'
यदि कालिदास भोज के सभापण्डित होते तो उनकी प्रशंसा ५०० वर्ष पूर्व कैसे होती ? हो सकता है वल्लालसेन ने भोज के समय हुए परिमल कालिदास या कालिदास उपाधिवाले किसी और कवि को ही भ्रमवश दीप-शिखा 'कालिदास' मान लिया हो ।
( २ ) दूसरा मत है चौथी शताब्दी के अन्त से पाँचवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अर्थात् चन्द्रगुप्तविक्रमादित्य और समुद्रगुप्त का राज्यकाल। प्रो० लासेन, कर्नल विल्फोर्ड, जेम्स प्रिन्सेप, प्रो० मैकडानल, प्रो० कीथ और विन्सेण्ट स्मिथ आदि विदेशी विद्वानों का कहना है कि गुप्तवंश के राजाओं के राज्यकाल में भारत का साहित्यसूर्य मध्याह्न के आकाश में स्थित होकर सारे संसार को अपने प्रखर किरणों से प्रभावित कर रहा था। कालिदास की रचना में जो तृप्ति और आनन्द की अजस्र धारा प्रवाहित हुई वह उसी सुख एवं समृद्धि के सौभाग्य समय में संभव हो सकी है। प्रो० विन्सेण्ट स्मिथ कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल में आये 'चीनांशुकमिव केतोः' इस उक्ति के आधार पर यह मानते हैं कि जिस बौद्ध धर्म के प्रभाव से भारत और चीन की पारस्परिक मैत्री होकर दोनों देशों की सभ्यता के संमिश्रण से एक तीसरी सभ्यता उत्पन्न हुई उसका पूर्ण विकास गुप्त वंश के राज्यकाल में ही हुआ।
कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् ।
नक्षत्रताराग्रहसंकुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥ (रघुवंश, ६-२२)
( १३ )
रघुवंश के इन्दुमती स्वयंवर में सुनन्दा सर्वप्रथम मगध के राजा की प्रशंसा करती है। गुप्तवंश के राजा मगध पर शासन करते थे, यह बात तो निर्विवाद है ही। प्रो० कीथ सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा किये जाने को यह मानते हैं कि कालिदास ने इस तरह प्रच्छन्नभाव से अपने आश्रयदाता का संकेत एवं कृतज्ञता घोषित करने के लिए प्रशंसा अपने काव्यों में की है। उनका कहना है कि कालिदास ने इसी तरह रघुवंश में ‘आसमुद्रक्षितीशानाम्’ इस वाक्य के द्वारा समुद्रगुप्त के राज्यविस्तार का संकेत किया है, इसी तरह ‘ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रि:’ इस श्लोकांश में आये ‘चन्द्र’ शब्द के द्वारा अपने आश्रयदाता चन्द्रगुप्त का एवं ‘कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम्’ इस श्लोक में आये ‘कुमार’ शब्द के द्वारा उसके पुत्र कुमारगुप्त का संकेत किया है। उनका कहना है कि ‘कुमारसम्भव’ नामक महाकाव्य की रचना कालिदास ने चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म के उपलक्ष्य में की है।
उन्होंने कालिदास को गुप्त काल में मानने के लिए कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। उनका कहना है कि अश्वघोष कनिष्क के शासनकाल में विद्यमान थे। अश्वघोष एवं कालिदास की रचनाओं में अनेक स्थल पर भाव-साम्य है। भावसाम्य के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं—
महाकवि अश्वघोष का अपने बुद्धचरित में सिद्धार्थ के जन्म का वर्णन—
वाता ववुः स्पर्शसुखा मनोज्ञा दिव्यानि वासांस्यवपातयन्तः।
सूर्यः स एवाऽभ्यधिकं चकासे जज्वल सौम्यार्चिरनीरिरतोऽग्निः ॥
( बुद्धचरित, १–२२ )
यदि इस तरह करते हैं तो महाकवि कालिदास भी अपने कुमारसंभव में कार्तिकेय के जन्म का भी वर्णन उसी प्रकार करते हैं—
वाता ववुः सौख्यकराः प्रसेदुः आशाविधूमो हुतभुग् दिदीपे।
जलान्यभूवन् विमलानि तत्रोत्सवेऽन्तरिक्षं प्रसाद सद्यः ॥ ( ११–३७ )
यदि अश्वघोष राजकुमार सिद्धार्थ जिस समय वनविहार के लिए राजमार्ग पर निकले उस समय उनको देखने के लिए उत्कण्ठित नगर-नारियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परम्परायासितकुण्डलानि।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥
( बुद्धचरित, ३–१९ )
( १४ )
तो कालिदास भी स्वयंवर में आते हुए अज को देखने के लिए उत्कण्ठित नगरस्त्रियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं—
तासां मुखैरासवगन्धगर्भैर्व्याप्तान्तराः सान्द्रकुतूहलानाम्।
विलोचनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः सहस्रपत्र·भरणा इवाऽऽसन् ॥ (रघुवंश, ७-११)
बुद्धचरित में तपस्या में लीन बुद्ध को तपस्या से विरत करने के लिए प्रयत्नशील काम को आकाशस्थ विशिष्टभूत इस प्रकार फटकारता है—
मोघं श्रमं नार्हसि मार ! कर्तुं हिंसात्मतामुत्सृज गच्छ शर्म।
नैष त्वया कम्पयितुं हि शक्यो महागिरिर्मेरुरिवाऽनिलेन ॥
( बुद्धचरित, १३-५७ )
रघुवंश में नन्दिनी सेवा में तत्पर दिलीप की परीक्षा के लिए माया-निर्मित सिंह भी राजा को उसी प्रकार कहता है—
'अलं महीपाल! तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ (रघुवंश, २-३४)
इसी तरह सौन्दरनन्द में नन्द को बुद्ध के गौरव से एवं सुन्दरी प्रिया के अनुराग से हुई दुविधा का वर्णन अश्वघोष इस प्रकार करते हैं—
तं गौरवं बुद्धगतं चकर्ष, भार्यानुरागः पुनराचकर्ष ।
सोऽनिश्चयान्नाऽपि ययौ न तस्थौ तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः ॥ ( ४-४२ )
कुमारसंभव में तपश्चर्यरत पार्वती की परीक्षा के लिए आये हुए ब्रह्मचारी वेशधारी शिव ने शिव की निन्दा सुनाने के कारण जाती हुई पार्वती को अपना स्वरूप दिखला कर जैसी दुविधा में डाला—कालिदास के द्वारा उसका वर्णन देखिए—
तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टि-निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती ।
मार्गाऽचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराज-तनया न ययौ न तस्थौ ॥
( ५-८५ )
इस प्रकार दोनों महाकवियों की रचनाओं में बहुत-से स्थलों पर समानता पायी जाती है जो इस बात को प्रमाणित करती है कि एक ने दूसरे का अनुकरण किया है। किसने अनुकरण किया और किसकी रचना अनुकार्य है इसका विवेचन यदि किया जाय तो समय की कुछ जानकारी हो सकती है । प्रो० साहेव का कहना है कि महाकवि भास ने अपने नाटकों में जैसी प्राकृत भाषा का प्रयोग किया है वह अश्वघोष के द्वारा प्रयुक्त प्राकृत से परिष्कृत और अर्वाचीन है, इससे सिद्ध होता है कि महाकवि भास अश्वघोष से अर्वाचीन हैं। महाकवि
( १५ )
कालिदास भास से अर्वाचीन हैं यह बात तो निबिवाद ही है क्योंकि कालिदास स्वयं मालविकाग्निमित्र नाटक के प्रारम्भ में भास को प्राचीन यशस्वी कवि मान चुके हैं। जैसे—प्रथितयशसां भाससौमिल्लकविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानः ? अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया है। हम पहले ही लिख चुके हैं कि अश्वघोष कनिष्क के समय में विद्यमान थे। कनिष्क सम्भवतः खृष्ट की प्रथम या द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में पञ्जाब का शासन करते थे। इस स्थिति में भास यदि तृतीय शताब्दी के कवि माने जाएँ तो कालिदास उनसे परवर्ती कवि माने जाएँगे।
दूसरी बात बाणभट्ट की रचनाओं से पता चलता है कि वे हर्षवर्द्धन के सभा-पण्डित थे। हर्षवर्द्धन सातवीं शताब्दी के मध्यभाग में राज्य करते थे एवञ्च बाणभट्ट ने कालिदास की प्रशंसा में 'निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु' ऐसा लिखा है जिससे सिद्ध होता है कि कालिदास सातवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे।
“सविजयतां रविकीर्तिः कविताऽऽश्रितकालिदासभारविकीर्तिः” द्वितीय पुलकेशी के इस प्रस्तरलेख से सिद्ध होता है कि कालिदास द्वितीय पुलकेशी जो ६३४ खृष्टाब्द का माना जाता है, के पूर्व विद्यमान थे। इस तरह कालिदास ६३४ खृष्टाब्द से पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं।
वत्सभट्टि नाम के कवि ने प्राचीन दशपुर आधुनिक मन्दसोर नाम के स्थान के सूर्यमन्दिर के प्रशस्ति की रचना की है। जिस प्रशस्ति पर मालव संवत् ५२९ का उल्लेख है। पूर्वोक्त लेख की भाषा और शैली में कालिदास की भाषा और शैली की समानता पायी जाती है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास मालव सं० ५२९ से पूर्व विद्यमान थे।
प्रो० साहेब ने पूर्वोक्त प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहा है कि कालिदास तृतीय शताब्दी से पीछे एवं पाँचवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे। एवञ्च यह सिद्ध होता है कि कालिदास गुप्त वंश के राजाओं के राज्यकाल में विद्यमान थे। इनकी आनन्दपूर्ण शान्तिप्रदायिनी काव्यधारा उसी सौभाग्य समय में प्रवाहित हुई थी। एवञ्च पूर्वोक्त पद्य में 'चन्द्र' शब्द के आधार पर इनके आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय को मान लिया जाता है, जिसका राज्यकाल ४१४
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तक था। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि महाकवि कालिदास द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय में उत्पन्न हुए थे।
परन्तु पाश्चात्य विद्वानों के इस मत का यदि ठीक से विवेचन किया जाए तो उनका कथन मात्र काल्पनिक सिद्ध होगा, सत्य नहीं। जिसका विचार हम आगे करेंगे।
तीसरा मत है छठी शताब्दी अर्थात् विश्वविख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर का समय। इस मत को मानने वाले प्रमुख पाश्चात्य विद्वान् हैं-प्रो० मैक्स-मूलर, डॉ० भण्डारकर, प्रो. कर्न एवं डॉ. भाऊदा जी। इन लोगों का आधार भारतीय जनश्रुति है।
कालिदास के ग्रन्थों के टीकाकार मल्लिनाथजी ने मेघदूत की टीका में कालिदास को महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक माना है-पूर्वोक्त विद्वान् ने इसी पर निर्भर होकर इनको छठी शताब्दी का मान लिया है। क्योंकि कालिदास जिन नवरत्नों में एक थे उन्हीं में ज्योतिष के उद्भट् विद्वान् वराहमिहिर भी एक रत्न थे। ब्रह्मगुप्त के खण्डनखाद्य की टीका में अमरराज लिखते हैं-
‘नवाधिक-पञ्चशतसंख्याके वराहमिहिराचार्यो दिवं गतः’।
नवाधिक पञ्चाशत का अर्थ ५०९ होगा।
इस उक्ति के आधार पर वराहमिहिर की मृत्यु ५८७ खृष्टाब्द मानी जा सकती है। इस तरह कालिदास भी छठीं शताब्दी के सिद्ध होते हैं। आचार्य दिङ्नाग और धर्मकीर्ति असङ्ग के छात्रथे। असङ्ग ५४१ खृष्टाब्द में विद्यमान थे।
स्थानादस्मात्सरसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं
दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान्।
इस श्लोक की टीका में मल्लिनाथ ने दिङ्नाग एवं निचुल शब्द को श्लिष्ट माना है। दिङ्नागाचार्य वसबन्धु के भी छात्र थे। उसी समय उज्जयिनी में ‘विक्रमादित्य’ नामक राजा राज्य करते थे। कालिदास उन्हीं के सभा-रत्न थे, यह बात प्रमाणित होती है परन्तु यह मत भी निःसार ही प्रतीत होता है।
अब हम कालिदास को प्रथम शताब्दी का सिद्ध करने से पहले पूर्वकथित मतों का संक्षेप में विवेचन कर वास्तविकता की ओर बढ़ें।
गुप्तकाल में ही संस्कृतविद्या का पुनर्जागरण हुआ यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह सर्वसम्मत मत नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत
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विद्या का चरमोत्कर्ष विक्रमादित्य और राजा भोज के समय में हुआ और उसे ही संस्कृत का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। जिन विद्वानों ने 'चीनांशुकमिव-' यहाँ प्रयुक्त 'चीन' शब्द को देशपरक मानकर तात्कालिक सभ्यता का आदान-प्रदान आदि की कल्पना की है वह भ्रम मात्र है सत्य नहीं। क्योंकि 'चीन' शब्द का मेदिनी कोश के 'चीनो देशांशुकव्रीहिभेदे तन्तौ मृगान्तरे' इस पंक्ति के अनुसार 'रेशमी' वस्त्र भी अर्थ है। और यही अर्थ शाकुन्तल के उक्त स्थल के उपयुक्त भी है। 'चीनांशुक' में चीन (देश) का अंशुक (कपड़ा) ऐसा षष्ठी तत्पुरुष समास न मानकर 'चीनं च तदंशुकम्' ऐसा कर्मधारय मानने से उपर्युक्त रेशमीवस्त्र वाला मत पुष्ट हो जाता है। एवञ्च इन्दुमती स्वयंवर में सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा करवाने के कारण कालिदास यदि मगध के राजाओं के आश्रित मान लिये जायें तो, उनकी जन्मभूमि के विषय में अनेक तरह के प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे मेघदूत में अलकापुरी की अत्यधिक प्रशंसा करने से वे अलकापुरी के कोई यक्ष मान लिये जायें एवञ्च कुमारसंभव में हिमालय की पर्याप्त प्रशंसा करने के कारण वे कोई हिमालयवासी किन्नर मान लिये जाएँ, रघुवंश में रघु और अज की अत्यधिक प्रशंसा करवाने के कारण उन्हें अयोध्यावासी मान लिया जाए, शाकुन्तल में शकुन्तला प्रस्थान के समय आचार को देखकर उन्हें मिथिलावासी ही न क्यों मान लिया जाए इस प्रकार बहुतेरे प्रश्न हो सकते हैं। अतः विद्वानों का उक्त आधार भी बालू की भीति ही है।
इसी तरह 'ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः' इस श्लोकांश एवं 'गुप्तमूल प्रयत्नतः' इत्यादि स्थलों को आधार मान कर यह कहना कि कालिदास ने अपने आश्रयदाता गुप्त वंशज राजाओं का एवं 'चन्द्र' पद से 'द्वितीय चन्द्रगुप्त' का निर्देश किया है तो यह कहना भी युक्तिमूलक नहीं प्रतीत होता क्योंकि जब कवि सर्वतन्त्रस्वतन्त्र होता है एवं उन्हें यदि अपने आश्रयदाता का संकेत ही करना था तो स्पष्ट रूप से कह सकते थे। कुमारसंभव की रचना चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्मोत्सव पर की गयी यह भी कोरी कल्पना है, इसमें सत्यता नहीं क्योंकि इसमें कोई प्रबल प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया इस लिए वे अश्वघोष के परवर्ती हैं, यह भी नहीं कह सकते।
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महाकवि कालिदास की रचना कवित्वप्रदर्शन मात्र के लिए अर्थात् 'कला कला के लिए' थी, जब कि अश्वघोष की रचना अध्यात्ममार्ग से अन्यमनस्क लोगों का ध्यान काव्य के माध्यम से अध्यात्म की ओर आकृष्ट करना था। जैसा कि उन्होंने सौन्दरनन्द में स्पष्ट रूप से लिख भी दिया है।
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भा कृतिः श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात्कृता । इत्यादि
अतः रचना की समता को लेकर किसी महाकवि की रचना को मौलिक और किसी की रचना को अनुकृतिमूलक कहना साहसमात्र है। वैसे यदि कहा जाय कि अश्वघोष ने ही कालिदास का अनुकरण किया तो युक्तियुक्त भी हो सकता है। जैसे—
अपने नगर में अपने पिता द्वारा अवरुद्ध सिद्धार्थ का वन-विहार के लिए निकलने पर नगर-स्त्रियों की उत्सुकता उतनी नहीं रही होगी जितनी कि कुमारसंभव में ओषधिप्रस्थ में वरयात्रा के प्रसङ्ग में शिवजी या इन्दुमती स्वयंवर के अनन्तर अज की यात्रा में उसे देखने के लिए स्त्रियों की उत्सुकता अपूर्व रही होगी, अतः महाकवि ने जो स्त्रियों के औत्सुक्य का वर्णन किया है वह स्वाभाविक है अतः मौलिक एवं मनोरम है। अश्वघोष को तो अनुकृतिमूलक है।
कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण नहीं किया इसमें एक युक्ति यह भी है कि अनुकरण आदर्श का; उत्तम का किया जाता है जो स्वयं अपूर्ण है उसका कोई भला क्या अनुकरण करेगा? अश्वघोष की भाषा-शैली अपरिमार्जित है च्युति-संस्कृति दोषग्रस्त और साथ ही उतना हृदयावर्जक भी नहीं जितनी कि महाकवि कालिदास की। कालिदास की शैली परिमार्जित, सरस एवं मनोरम है।
साथ ही महाकवि कालिदास कितने निरभिमानी थे इस बात को मैंने प्रारम्भ में ही लिख दिया है। ये अपने से प्राचीन प्रतिष्ठित कवियों का यशो-गान करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते और न अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग ही मानते थे। अतः उन्होंने मालविकाग्निमित्र में लिखा है कि—
'भास-सौमिल्लककविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ कथं बहुमानं' इत्यादि ।
यदि कालिदास महाकवि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो उपर्युक्त पंक्ति में क्या उनका नामोल्लेख नहीं करते ? अवश्य
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करते । और भी ‘चोरी’ चोरी की तरह की जाती है। महाकवि कालिदास यदि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो वे यह साहस कभी नहीं कर सकते थे कि एक ही भाव को अपने दो महाकाव्यों (कुमारसंभव और रघुवंश) में उल्लेख करते। अतः इस आधार पर उन्हें चौथी शताब्दी के शेष भाग से पाँचवीं शताब्दी के पूर्वार्ध का मानना कल्पनामात्र है।
प्रो० मैक्समूलर का यह कहना कि संस्कृत विद्या का चरमोत्कर्ष छठी शताब्दी से हुआ और उस समय कालिदास विद्यमान थे, फर्गुसन के कथन पर आधारित है। फर्गुसन का कहना है कि "खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नाम का कोई राजा था ही नहीं, अतः कालिदास प्रथम शताब्दी के नहीं माने जा सकते। अपितु, उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य ने ५४४ ई० सन् में भारत से शकों को भगाकर उस विजयोपलक्ष्य में ६०० वर्ष पूर्व अपना संवत्सर स्थापित किया और उसी समय कालिदास उत्पन्न हुए।"
परन्तु फर्गुसन के इस मत का खण्डन प्रो० फ्लीट और हर्नैल ने महाकवि कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रन्थ के इस श्लोक—
धन्वन्तरिक्षपणकाऽमरसिंहशङ्कु-वेतालभट्टघटखर्पर-कालिदासाः। ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥
को आधार मानकर किया है। कुछ यूरोपीय विद्वान् ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ को महाकवि कालिदास की कृति नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ में वर्णित ग्रहादि की दशा से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि पन्द्रहवीं शताब्दी के पश्चात् किसी नवीन विद्वान् ने इसका निर्माण किया है और कालिदास के नाम से प्रचरित कर दिया है। 'अस्तु' ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ भले ही कालिदास विरचित न हो परन्तु यह तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि कालिदास विक्रम के नवरत्नों में एक थे। अब रही बात खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नामक राजा के रहने और न रहने की, तो इस पर यदि विचार किया जाय तो यह भी सिद्ध हो जाता है कि खृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रम थे।
डॉ० राजबली पाण्डेय ने अपने "विक्रमादित्य" नामक ग्रन्थ में पर्याप्त प्रमाणों से सिद्ध कर दिया है कि खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व विक्रम नामक राजा थे। यूरोपीय विद्वान् ने जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को ही उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य मानकर यह लिखा है कि 'उसी ने ५४४ ई० सन् में शकों को भारत
( २० )
से भगाया और ६०० साल पहले का संवत्सर चलाया' बिलकुल निराधार एवं बेतुका लगता है। यदि उसे अपने नाम से ही संवत्सर चलाना था तो ६०० साल पहले से क्यों चलाता ? साथ ही यूरोपीय विद्वानों ने अपने उक्त कथन में कोई प्रमाण भी नहीं दिया है। अतः यह भी मत अनादरणीय ही है।
अब हम भारतीय विद्वानों के सम्मत प्रथम शताब्दी वाले मत का उल्लेख करने जा रहे हैं।
भारत की बहुप्रचलित जनश्रुति के आधार पर मालवनरेश विक्रम संवत्सर के प्रवर्तक जो खृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व हुए थे उन "विक्रमादित्य" की सभा के नवरत्नों में कालिदास भी एक रत्न थे ।
महाकविकालिदास गुप्तवंश के राजाओं के आश्रित नहीं थे अपितु खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी के विक्रमादित्य के आश्रित थे, निम्नलिखित प्रमाणों से सिद्ध हो जाता है ।
जे० के० सुब्रह्मण्यम् ने कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक से जो सूक्ष्म प्रमाण प्रस्तुत किये हैं वह महत्त्वपूर्ण हैं। उनका कथन है कि—महाकवि ने अपनी नवीन रचना के विषय में यह लिखा है कि—
"पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।"
इत्यादि । यहां प्रयुक्त "पुराण" पद श्लिष्ट है । महाकवि ने पुराण शब्द के द्वारा "पुराणख्यातवृत्त" का संकेत किया है। अर्थात् प्राचीन कवियों ने जो प्राचीन ( रामायण, महाभारत आदि ) ख्यातवृत्तों का आश्रयण लेकर अपने काव्यों की रचना की है उसका मैंने ( कालिदास ने ) उल्लंघन किया है, इसलिए वह उपेक्ष्य नहीं है, काव्य-मर्मज्ञजन उसकी परीक्षा करके इस बात का निर्णय कर सकते हैं। वस्तुतः महाकवि ने उक्त नियम का उल्लङ्घन किया है। मालविकाग्निमित्र के भरतवाक्य—
"आशास्यमीतिविगमप्रभृतिप्रजानां
संपत्स्यते न खलु गोप्तरि नाऽग्निमित्रे ॥"
में प्रयुक्त "गोप्तरि, अग्निमित्रे" पद की सप्तमी को भावलक्षणा मानकर उस समय "अग्निमित्र" जीवित थे यह सिद्ध होता है। अग्निमित्र पुष्यमित्रशुङ्ग के पुत्र थे। इनका समय खृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी माना गया है।
महाकवि की रचनाओं के अवलोकन से यह बात (प्रथम शताब्दी की) और भी प्रमाणित हो जाती है। शुङ्गवंश के राजाओं के समय चोरी जैसे अपराधों
( २१ )
में मनु, वशिष्ठ और आपस्तम्ब ऋषियों की स्मृतियों के आधार पर मृत्युदण्ड का विधान था। जैसा कि 'अँगूठी की चोरी में पकड़े गये मल्लाह को प्राण-दण्ड दिया जाता है।' अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में कालिदास ने ऐसा अभिनीत करवाया है। परन्तु गुप्तकाल में वैसा कठोर दण्ड–चोरी जैसे अपराध के लिए नहीं था। उस समय याज्ञवल्क्य-स्मृति की मान्यता थी। और भी, कालिदास ने अपने नाटकों में मृतपति के धन का दायभाग विधवा को नहीं दिया जाता है वह राज-कोष की चीज है, ऐसा वर्णित किया है जो कि मनु, वशिष्ठ, बौधायन और आपस्तम्ब स्मृतिसम्मत है। परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार विधवा को उसके मृतपति के धन का दायभाग मिलता है—ऐसी व्यवस्था गुप्तकाल में थी। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास शुङ्गवंश के राजाओं के समय में थे न कि गुप्तवंश के राजाओं के समय।
कालिदास अपने आश्रयदाता का स्पष्ट संकेत अपनी रचना में ही करते हैं। जैसे कि शाकुन्तल के प्रारम्भ में सूत्रधार नटी से कहता है 'आर्ये ! रस-भावदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्याऽभिरूपभूयिष्ठा परिषत्। अस्यां च कालिदास-ग्रथितवस्तुना नवेनाऽभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः।' पूर्वकाल में आजकल के समान उपाधि के तौर पर नाम का प्रयोग नहीं किया जाता था अतः उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'विक्रमादित्य' का अर्थ—
मालवनरेश खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में विद्यमान संवत्सर-प्रवर्तक विक्रमादित्य' ही है, न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' उपाधिधारी।
महाकवि को प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध करने में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द भी प्रमाण है। उन्होंने कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में एक श्लोक में लिखा है—'त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श'
यहाँ पाणिनि व्याकरण के नियम से लोक में 'त्र्यम्बक' प्रयोग ही साधु है और उसी का प्रयोग होना चाहिए था। परन्तु उक्त प्रयोग होने के कारण यह सिद्ध होता है कि कालिदास के समय पाणिनि व्याकरण पूर्ण रूप से लोक में प्रचलित नहीं हो पाया था। इसी तरह उन्होंने 'पातयामास' का जहाँ प्रयोग उचित था वहाँ 'पातयाम्' का पृथक् और 'आस' का पृथक् प्रयोग किया है, जैसे—'तं पातयां प्रथममास पपात पश्चात्'। (रघुवंश, ९ ६१) इत्यादि।
३ मे० भू०
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इसी प्रकार जहाँ-जहाँ महाकवि ने प्राकृत का प्रयोग किया वहाँ-वहाँ मागधी प्राकृत का ही—जिसका उल्लेख ईसा के पूर्व में प्राप्त होता है।
इस तरह हम निश्चयपूर्वक यह कह सकते हैं कि 'महाकवि कालिदास खृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में हुए थे न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय।'
महाकवि की जन्मभूमि
जन्मसमय की तरह इनकी जन्मभूमि भी विवादास्पद ही है। भिन्न-भिन्न प्रदेश के विद्वान् इन्हें अपने-अपने यहाँ का सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। कश्मीर प्रदेश के विद्वानों का कहना है कि कालिदास ने अपनी रचनाओं में कई बार 'प्रत्यभिज्ञान' शब्द का प्रयोग कर कश्मीर के 'प्रत्यभिज्ञान-शैव सम्प्रदाय' की ओर संकेत किया है; एवं इन्होंने हिमालय का तथा उसमें होने वाले पदार्थों का बहुत ही बारीकी से वर्णन किया है एवं केशर-पुष्प का भी वर्णन किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि कालिदास कश्मीर के रहने वाले थे। बंगाल के विद्वान् इन्हें बंगाल का सिद्ध करते हैं। उनका तर्क कालिदास के नाम पर आधारित है। काली की उपासना बंग देश में अधिक है और कालिदास काली (देवी) के उपासक थे जैसा कि उनके नाम से ही प्रतीत होता है, अतः वे बंगकवि थे ऐसा उनका कहना है। मैथिलों का कहना है कि महाकवि मिथिला के थे। वे लोग महाकवि के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' के चतुर्थ अंक में दर्शायी गई परिपाटी को आधार मानकर उन्हें मैथिल कहते हैं। साथ ही मिथिला के प्रत्येक परिवार में काली-देवी का एक विशेष घर बनाया जाता है जो काली की प्रबल उपासना का द्योतक है, अतः काली के उपासक कालिदास मिथिला के थे, ऐसा सिद्ध करते हैं। वे लोग वर्तमान 'उच्चैठ' गाँव में वर्तमान काली की मूर्ति को ही कालिदास की उपास्या मानते हैं। कई लोग इन्हें मालवा का भी मानते हैं। 'अस्तु'—भारत की भिन्न-भिन्न भूमि इसे अपना पुत्र कहने को उत्सुक हैं; कहती है, परन्तु यह निराला-बच्चा कभी नहीं कहता कि मेरी मां (जन्मभूमि) कौन है। केवल वह अपने धात्री (पालन-पोषण करने वाली) का निर्देश करता है। उज्जयिनीनरेश महाराज विक्रमादित्य की सभा में इनका जीवन निर्वाह हुआ और इनकी रचना में उज्जयिनी के प्रति इनका विशेष अनुराग देखकर (मेघदूत में) हम यह निश्चय करते हैं कि महाकवि की जन्मभूमि भी उज्जयिनी ही रही होगी।
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कालिदास की काव्यकला
कालिदास की रचनाएँ साहित्य जगत् में अपनी शानी नहीं रखतीं। भाव; कल्पना, आदर्श और भाषा की आधार-शिला पर साहित्यकला की जो सुन्दर अट्टालिका का निर्माण महाकवि ने किया है वह दूसरी जगह देखने को नहीं मिलती। कला की आलोचनात्मक अग्नि-परीक्षा में भी इनकी रचनाएँ इतनी खरी, ज्योत्स्नामयी और उत्कृष्ट निकलती हैं कि विश्व की आँखें चकाचौंध में पड़ जाती हैं। इनकी रचनाओं में वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यङ्ग्य अर्थ की प्रधानता पायी जाती है जिसके कारण इनके काव्यों को ध्वनिप्रधान माना गया है—उत्तम माना गया है। काव्यप्रकाशकार मम्मट उत्तमकाव्य का लक्षण लिखते हैं—"इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद् ध्वनिबुंधैः ।" ( काव्यप्रकाश, १-४ )
इनकी रचनाओं का भाव-तत्त्व जिसे साहित्य में रस या काव्य की आत्मा कहा जाता है, कल्पना के विविध उड़ान एवं उदात्त आदर्शों से समन्वित होकर इतना परिपक्व हो जाता है कि सर्वश्रेष्ठ कहलाने लगता है। कालिदास प्रकृति के पक्के पुजारी हैं। परन्तु इनकी प्रकृति जड़ नहीं, अपितु संवेदनशील है, सजीव है। इनकी रचनाओं में क्या तो बड़ा-से-बड़ा पर्वत और क्या तो छोटा-से-छोटा पुष्प सभी अपना-अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व रखते हैं और संवेदनशील हैं। यदि ऐसा न होता तो रघुवंश में दिलीप का जयकार पेड़-पौधे भला किस तरह कर सकते ? शकुन्तला की विदाई पर लताएँ पाण्डुपत्र छोड़कर अपने आँसू कैसे गिराने लगतीं ? कालिदास ने यद्यपि बाह्य-प्रकृति के भी वर्णन में मानव प्रकृति की तरह अन्तरतम स्तर तक घुसकर निश्चित दृष्टि रखी हैं, पर उन्होंने प्रकृति के कोमल, कान्त एवं मधुर पहलू का ही वर्णन किया है—भीषण या भद्दे का नहीं।
कालिदास की शैली साहित्यजगत् में अपना अनुपम स्थान रखती है। इनकी शैली के कारण ही इन्हें विश्व-वन्द्य कवि माना गया है। भद्दा-से-भद्दा या नीरस-से-नीरस कथानक क्यों न हो ये अपनी कल्पना के द्वारा उसका ऐसा मार्मिक एवं चमत्कृति-पूर्ण वर्णन करेंगे कि हृदय आनन्द-सागर में डूबने-सा लगता है। इनकी शैली वैदर्भी है, जिसका लक्षण विश्वनाथ ने लिखा है—
माधुर्य-व्यञ्जकैर्वर्णै रचना ललितात्मिका ।
अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदर्भी रीतिरिष्यते ॥ ( साहित्यदर्पण )
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उपयुक्त सभी बातें कालिदास की रचनाओं में दृष्टिगत होती हैं। ऐसी ललित, परिष्कृत एवं प्रसादगुण-सम्पन्न रचना अन्यत्र दुर्लभ है।
कालिदास की रचना में अलङ्कार का भी दर्शन होता है। ये अलङ्कार आनुषङ्गिक हैं, कालिदास ने इन्हें जबरदस्ती लादने का प्रयास नहीं किया है। उनका तो कहना है— "किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाऽकृतीनाम्”। इन्हें तो उपमा का आचार्य ही माना गया है। कहा भी है 'उपमा कालि-दासस्य' इति। परन्तु उपमा के अतिरिक्त उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, रूपक, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास, स्वभावोक्ति अलङ्कारों की भी कमी इनकी कविता-कामिनी को नहीं है।
संक्षेप में उनकी काव्य-कला की छटा देखें। क्या ही स्वाभाविक एवं मनोरम युक्ति है उनकी—
अवचितबलिपुष्पवेदिसम्मागंर्दक्षा ।
नियमविधिजलानां बर्हिषाञ्चोपनेत्री ॥
वे सौन्दर्य के कवि तो हैं ही, साथ ही साथ उनमें सत्यम् शिवम् की भी गरिमा भरी पड़ी है। सौन्दर्य को सत्यता की कसौटी में परख कर उससे शिवत्व का सन्देश देना कवि के लिए बाएँ हाथ का खेल लगता है। वे कहते हैं—
त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति भ्रूविलासानभिज्ञैः।
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः ॥
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ता।
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसन्त्यः ॥
स्वभाव-चित्रण में भी वे उतने ही सिद्धहस्त हैं। उनका प्रत्येक पात्र अपने स्वाभाविक क्षेत्र से ही गुजरता है और कल्पना में भी वह अयथार्थता को नहीं छूता। इतना होने पर भी वे शिष्टता को कभी नहीं छोड़ते। पार्वती के सौन्दर्य-वर्णन में वे कहते हैं।
असम्भृतं मण्डनमङ्गयष्टेर्नासवासवं करणं मदस्य।
कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्रं बाल्यात्परं साऽथ वयः प्रपेदे ॥
वे मर्यादा का कुछ-कुछ उल्लङ्घन भी करते हैं तो इतनी चतुराई के साथ कि पाठक को उसका गन्ध तक नहीं आता। पार्वती के विवाह के प्रसङ्ग में उनकी सखी के द्वारा किया गया परिहास इसका उदाहरण है—
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पत्युः शिरश्चन्द्रकलाम्नेन स्पृशेति सख्याः परिहासपूर्वम् ।
सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशीर्माल्येन तां निर्वचनं जघान ॥
यहाँ कितना गूढ़ एवं शिष्ट परिहास है । यह देखने लायक है । इसी तरह अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का चरम समन्वय महाकवि की रचनाओं में पाया जाता है । शब्दों को सजाना उनको बहुत रुचिकर है । वे उपमा के एकमात्र सिद्ध कवि माने जाते हैं । उनकी उपमाछटा सहृदयों को मोह लेती है ।
प्रभामहत्या शिखयेव दीपस्त्रिमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्गः ।
संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स पूतश्च पवित्रितश्च ॥
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥
उपमा के साथ यमक भी उनका प्रिय अलङ्कार है । रघुवंश में वसन्त वर्णन में इसकी छटा देखने को मिलती है ।
अनुभवन्नवदोलमृतोत्सवं पटुरपि प्रियकण्ठजिघृक्षया ।
अनयदासनरज्जुपरिग्रहे भुजलता जलनामवलाजनः ॥
कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनुषट्पदकोकिलकूजितम् ।
इति यथाक्रममाविरभून्मधुर्द्रुमवतीमवतीर्य वनस्थलीम् ॥
वस्तुस्थिति का वर्णन तो उनका कहना ही क्या ? वे जो भी वस्तु छूते हैं उसमें स्वाभाविकता एवं सौन्दर्य का समावेश करते हैं । देखिए —
त्यजत मानमलं वत विग्रहाः न पुनरेति गतं चतुरं वयः ।
परभृताभिरितीव निवेदिते स्मरमते रमते स्म वधूजनः ॥
मृगया के सम्बन्ध में उन्होंने इस तरह कहा है—
परिचयचललक्ष्यनिपातने भयरुषोश्च तदिङ्गितवेदनम् ।
श्रमजयात्प्रगुणाञ्च करोत्यसौ तनुमतोऽनुमतः सचिवैर्ययौ ॥
कालिदास वैदर्भीरीति के कवि हैं यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रीतियों का भी अच्छा खासा प्रयोग है ।
तथा समक्षं दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती ।
निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता ॥
उनकी रचनाओं में प्रसाद गुण सर्वत्र व्याप्त है । जैसे—
सा हंसमाला शरदिव गङ्गां महोषधि रत्न इवात्मभासः ।
स्थिरोपदेशामुपदेशकाले प्रपेदिरे प्राक्तनजन्मविद्याः ॥
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कवि को शृङ्गार एवं वीर रस बहुत प्रिय है यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रसों का भी समावेश कम नहीं है। शृङ्गार रस जैसे शाकुन्तल में—
स्निग्धं वीक्षितमन्यतोऽपि नयने यत्प्रेरयन्त्या तया।
यातं यच्च नितम्बयोर्गुरुतया मन्दं विलासादिव ॥
वैसे तो कालिदास की सभी रचनाओं में उदात्त शृङ्गार है ही।
कालिदास की रचनाओं में अर्थान्तरन्यास, स्वभावोक्ति, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कारों का प्रशस्त प्रयोग पाया जाता है। स्वभावोक्ति की छटा देखिए—
शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादिताद्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिस्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ॥
एक वनवासी के द्वारा यह कहना कितना सुहावना लगता है।
कालिदास अभिधा के कवि तो कहे जाते हैं लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उनकी रचनाओं में ध्वनि तत्त्व है ही नहीं। इनमें पर्याप्त ध्वनि है अतः इनका काव्य उत्तम काव्य में आता है।
इनकी रचनाओं में भावपक्ष और कलापक्ष का बहुत अच्छा समन्वय दिखाई पड़ता है। वे आर्य्य-संस्कृति के एक सफल उद्घोषक थे परन्तु उनकी रचनाओं में यही नहीं, अपितु विश्वजनीनता ही अधिकतर झलकती है। यही उनकी उच्चता का परिचय है कि वे विश्वजनीन कवि थे और हरेक दृष्टिकोण उनकी आँखों से ओझल नहीं था। दर्शन, संस्कृति, आध्यात्मिकता, सौन्दर्य आदि विविध विषयों पर उनका उदात्त विचार उनकी रचनाओं में मिलता है। इतना सब-कुछ होने पर भी आत्मश्लाघा इनमें जरा-सी भी नहीं थी। वे कहते हैं—
मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवाऽस्ति मे गतिः ।
इसका अर्थ यह नहीं कि वे प्राचीनता के अन्धभक्त थे। वे तो सही अर्थ में सुधारक भी थे। उनका कहना था—
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूखं परप्रत्ययनेव बुद्धिः ॥
कुछ आलोचक कालिदास के कवित्व में यह आरोप लगाते हैं कि वे समस्या तो उभारते हैं लेकिन समाधान प्रस्तुत नहीं करते। यह उन आलोचकों
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की अल्पदृष्टिता से और कुछ नहीं। कालिदास की रचनाओं में सर्वत्र समस्या के साथ समाधान भी दिये हुए हैं। जरूरत है उनको समझ पाने की दृष्टि का। मानव के मन में उठ सकने वाले भावों की चिरन्तनता एवं ऊहापोह को वे इस प्रकार वर्णन करते हैं—
क्व कार्यं शशलक्षणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्।
किं वक्ष्यन्त्यकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि का खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ॥
यह श्रेय कालिदास को ही जाता है कि संस्कृत-साहित्य विश्वसाहित्य में उच्चतम स्थान पाया हुआ है।
कालिदास की कृतियाँ
वैसे तो कालिदास की रचनाएँ बहुत-सी हैं। जैसे—ऋतुसंहार, कुमारसंभव, रघुवंश, मेघदूत, श्रुतबोध (छन्दोग्रन्थ) शृङ्गारतिलक, नलोदय, नवरत्नमाला, घटकर्परकाव्य, पुष्पबाणविलास, चिद्गमनचन्द्रिका, ज्योतिर्विदाभरण (ज्योतिषग्रन्थ), कुन्तेश्वरदौत्य, अम्बास्तव, कल्याणस्तव, कालीस्तोत्र, काव्यनाटकालंङ्कार; गङ्गाष्टक, चण्डिकादण्डक स्तोत्र, चर्चास्तव, दुर्घटकाव्य, मकरन्दस्तव, मङ्गलाष्टक, महापद्माष्टक, रत्नकोश, राक्षसकाव्य, लक्ष्मीस्तव, लघुस्तव, विद्वद्विनोदकाव्य, वृन्दावनकाव्य, वैद्यमनोरमा, शुद्धचन्द्रिका, शृङ्गाररसाष्टक, शृङ्गारसार काव्य, श्यामलादण्डक, सेतुबन्ध, मालविकाऽग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय एवं अभिज्ञानशाकुन्तल आदि। परन्तु रचनाशैली की विभिन्नता के कारण आलोचकों ने इनमें से कुछ को ही सर्वसम्मत से कालिदास की कृति माना है। सर्वसम्मत से जो रचनाएँ कालिदास की मानी जा चुकी हैं वे हैं—
( १ ) ऋतुसंहार, ( २ ) कुमारसंभव, ( ३ ) रघुवंश, ( ४ ) मालविकाऽग्निमित्र, ( ५ ) विक्रमोर्वशीय, ( ६ ) अभिज्ञानशाकुन्तल तथा मेघदूत।
अब हम इन प्रसिद्ध कृतियों के सम्बन्ध में संक्षिप्त परिचय देते हैं—
( १ ) ऋतुसंहार :— प्रस्तुत रचना कालिदास की प्राथमिक मानी जाती है क्योंकि इसमें वैसी प्रौढि नहीं पायी जाती जैसी कवि की अन्य कृतियों में
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दृष्टिगोचर होती है। इसमें आये पद्य अन्यत्र कहीं लक्षणादिग्रन्थों में उदाहरण के तौर पर नहीं पाये जाते और मल्लिनाथ ने इस पर टीका भी नहीं लिखी है इसीलिए पहले कुछ विद्वान् इसको महाकवि की रचना नहीं मानते थे, परन्तु कतिपय सूक्ष्म प्रमाणों के मिलने पर पुनः इसे उनकी कृति मान लिया गया है। इसमें ग्रीष्म से लेकर वसन्त तक के षट् ऋतुओं का बड़ा ही मनोरम चित्रण छः सर्गों में किया गया है। इसमें १४४ पद्य हैं।
( २ ) कुमारसंभव :—१७ सर्गों का यह महाकाव्य महाकवि की दूसरी रचना मानी जाती है। इसमें कार्तिकेय का जन्म एवं उनके चरित्र का वर्णन ही प्रधान विषय है। इसमें प्रथम सर्ग से लेकर सप्तम सर्ग तक क्रमशः हिमालय पर्वत का वर्णन एवं पार्वती का जन्म, तारकासुर की उच्छृङ्खलता, उसके वध के लिए शिवजी के औरस पुत्र हेतु तपस्या में लीन शिवजी के तपोभङ्ग के लिए देवताओं के द्वारा कामदेव को शिवजी के पास भेजना, उनके तृतीय नेत्र से उत्पन्न अग्नि के द्वारा कामदाह, काम की पत्नी रति का विलाप, रति को सान्त्वना देना, पार्वती की तपश्चर्या और उनका शिवजी से विवाह वर्णित है। अष्टम सर्ग में शिव और पार्वती के काम-केलि का वर्णन है। महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी की टीका यहीं तक उपलब्ध है, अर्वाचीन विद्वान् इसीलिए नवम सर्ग से लेकर अन्त तक के सर्गों की शैली में कालिदास की शैली से भिन्नता होने के कारण भी 'अष्टम' सर्ग तक को ही कालिदास की रचना मानते हैं। परन्तु यह महाकाव्य है और उसका लक्षण है कि 'सर्गाऽष्टाधिका इह' अर्थात् महाकाव्यों को आठ सर्गों से अधिक होना चाहिए। साथ ही आठ सर्ग तक केवल कामकेलि का वर्णन है जो कार्तिकेय के जन्म की भूमिका मात्र है। यदि इसे आठ सर्गों का ही माना जाये तो 'कुमारसंभव' यह नाम भी युक्ति-संगत नहीं हो पायेगा। अतः इसे कालिदास की ही रचना मान लीजिए, या आठ सर्गों तक की रचना महाकवि ने की और नवम से सत्रहवें सर्ग तक की किसी परवर्ती कवि ने की होगी, ऐसा मानना चाहिए।
( ३ ) रघुवंश :—१९ सर्गों का यह महाकाव्य है। इसमें दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक के सूर्यवंश के राजाओं के चरित्र का वर्णन बड़े ही प्रौढ़ एवं मनोरम ढंग से किया गया है। भारतीय संस्कृति का लोकोत्तर चित्रण इसमें
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है। किंवदन्ती है कि इसके पञ्चम सर्ग में सरस्वती का बीजमन्त्र है एवं इस सर्ग के अन्तिम १३ श्लोकों की रचना स्वयं सरस्वती ने की है। कान्तासम्मित उपदेश का यह अनूठा उदाहरण है।
( ४ ) मालविकाग्निमित्र :-पाँच अङ्क का यह रूपक, रूपकरचना में महाकवि की प्रथम कृति है। इसमें तात्कालिक विदिशाधिप राजा अग्निमित्र एवं मालविका के उत्कृष्ट प्रेम का वर्णन बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से किया गया है।
( ५ ) विक्रमोर्वशीय :-यह पाँच अङ्कों का त्रोटक है। इसमें महाभारत की कथा के आधार पर पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम का वर्णन है। इसमें विप्र-लम्भ शृङ्गार का मनोरम ढंग से वर्णन कर ‘न विना विप्रलम्भेन संभोगः पुष्टिमश्नुते’ वाले सिद्धान्त को महाकवि ने और भी पुष्ट किया है। महाकवि ने अपने आश्रयदाता का संकेत इसके नामकरण से किया है।
( ६ ) अभिज्ञानशाकुन्तल :-यह संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु विश्वसाहित्य में अद्वितीय नाटक है। इसमें सात अङ्क हैं। इसमें महाभारत के कथानक के आधारपर चन्द्रवंशी महाराज दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम का वर्णन है। कहा जाता है कि विश्वसाहित्य में कालिदास अद्वितीय हैं और उनकी रचनाओं में शाकुन्तल उत्कृष्ट है और इसमें भी चौथा अङ्क उत्कृष्ट है और उस अङ्क में निम्नलिखित चौथा श्लोक हृदयस्पर्शी है, जो वास्तविक हैं और सहृदय-संवेद्य है। जैसे—
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संश्लिष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भित-बाष्प-वृत्ति-कलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनया विश्लेषदुःखैर्नवैः॥
अर्थात् (कण्व कह रहे हैं) आज शकुन्तला (अपने पति-गृह) चली जायगी यह सोचकर ही उत्कण्ठा के कारण मेरा हृदय भरा-सा जा रहा है, गला रुँधा-सा जा रहा है और आँसुओं से परिप्लुत आँखों से देखा नहीं जाता। स्नेह के कारण (धर्मपुत्री के लिए) यदि मुझ जैसे वनवासी को भी इतनी विकलता है तो फिर भला जो गृहस्थ अपनी औरस पुत्री को विदा करता होगा उसे कितना कष्ट होता होगा। सम्भवतः कालिदास की ऐसी ही रचना को देखकर पाश्चात्य कवि गेटे ने कहा था—
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वासन्तं कुसुमं फलं च युगपद्ग्रीष्मस्य सर्वं च यद् ।
यच्चान्यन्मनसो रसायनमतः सन्तर्पणं मोहनम् ॥
एकीभूतमभूतपूर्वमथवा स्वर्लोकभूलोकयो-
रैश्वर्यं यदि वाञ्छसि प्रियसखे ! शाकुन्तलं सेव्यताम् ॥
इसमें कालिदास ने आर्यनारी के पातिव्रत्य को विरहाग्नि में तपाकर कुन्दन-सा चमकाकर उसकी महत्ता का चूडान्त निदर्शन किया है।
मेघदूत
काव्य दो प्रकार का होता है—( १ ) महाकाव्य, ( २ ) खण्डकाव्य । महाकाव्य एक विस्तृत-प्रबंधकाव्य होता है, जैसे रघुवंश, कुमारसंभव आदि । खण्डकाव्य, इसमें पूर्ण जीवन वृत्तान्त नहीं होता अपितु जीवन के एक भाग का वर्णन होता है । प्रकृति में मेघदूत वैसा ही एक खण्डकाव्य है इसे लोग 'गीतिकाव्य' भी कहते हैं ।
यह संस्कृत साहित्य के गीतिकाव्यों में सर्वप्रथम गिना जाने वाला है । कला का चरमपरिपाक, कल्पना की ऊँची उड़ान, परिष्कृत मधुरिमामयी सरस भाषा, विषय की अक्षुण्णगति एवं छन्द की एकतानता का जो समन्वय कालिदास की इस कृति में पाया जाता है वैसा संसार में अन्यत्र मिलना दुर्लभ क्या असंभव ही है । इसका वर्ण्य विषय अत्यन्त मर्मस्पर्शी है । इसमें दो भाग हैं, पूर्व एवं उत्तर ।
कोई यक्ष अपनी नवोढा प्रिया के प्रणयपाश में उलझकर अपने कर्त्तव्य में प्रमाद कर जाता है, अतः स्वामी कुबेर के कोप का भाजन ही नहीं शाप का पात्र भी बन जाता है । इस तरह वह यक्ष प्रभु कुबेर के शाप से अपनी भूमि अलकापुरी से निर्वासित होकर एक वर्ष के लिए रामगिरि-पर्वत पर रहता है । पूर्वमेघ में इसी यक्ष की करुण कहानी है ।
पूर्वमेघ :—अपनी प्राणेश्वरी के विरह में कृश, कामुक वह यक्ष आषाढ़ मास के प्रारम्भ में मेघ को देखकर जड़-चेतन के विवेक से शून्य-सा होकर उससे अपनी प्रिया के पास संदेश ले जाने के लिए कहता है । पहले मेघ की प्रशंसा करता है, अलकापुरी जाने के लिए उसे रास्ते में कहाँ-कहाँ जाना होगा, इन सबका वर्णन पूर्वमेघ में जिस ढंग से किया है वैसा तो कोई भी कवि