भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः | ६१

**कोशः—**समीपे निकटासन्नसन्निकृष्टसनीडवत्, इत्यमरः। केतकी मुकुलाग्रे- षुसूचिः, इति शब्दार्णवः। हरितः पाण्डुरः, इत्यमरः। प्रकारो वरणः सालः प्राचीरं प्रान्ततो वृतिः इत्यमरः। ध्वाङ्क्षात्मपरभृद्वलिभुग्वायसा अपि, इत्यमरः। चैत्यमायतने बुद्धवन्द्ये चोदद्देशपादपे, इति विश्वः।

**टिप्पणी—दशार्णाः—**यहशब्द अलग-अलग व्युत्पत्ति से अलग-अलग अर्थ को कहता है। जैसे—दश ऋर्णानि (दुर्गभूमयः) येषां ते (बहुव्री०) दशार्णाः = दश + ऋणः, यहाँ “प्रवत्सरकम्बलवसनदशानामृणे” इस सूत्र से “आ” वृद्धि होकर “उरण् रपरः” से रपर हो गया है। प्रस्तुत व्युत्पत्ति के अनुसार “दशार्णाः” शब्द पुरुषवाची है, जिनके दश दुर्ग हों उन राजाओं को “दशार्ण” कहा जाता है। तेषां निवासः ऐसा विग्रह करके “तस्य निवासः” से अण् प्रत्यय होता है। उसका “जनपदे लुप्” से लुप् तो हो जाता है परन्तु “लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने” इस सूत्र से लिङ्ग और वचन के प्रकृतिभाव हो जाने से “दशार्णा” यह बहुवचनान्त रूप निष्पन्न होता है। **दूसरी व्युत्पत्तिः—**ऋण शब्द का दूसरा अर्थ जल भी है तो दश ऋणानि (जलस्रोतसः) यस्यां सा “दशार्णा” यहाँ “दशार्णा” नदी अर्थ का बोधक शब्द है। **चैत्याः—**यहाँ “चैत्य” शब्द अग्निवाचक “चित्य” शब्द से “चित्यस्य इमानि” इस विग्रह में “तस्येदम्” इस सूत्र से “अण्” प्रत्यय करके आदि वृद्धि करने पर निष्पन्न होता है न कि “चिता” या “चित्या” शब्द से ॥ २३ ॥

तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं

गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।

तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि ॥ २४ ॥

**अन्वयः—**दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणाम् तेषां राजधानीम् गत्वा सद्यः कामुकत्वस्य अविकलफलं लब्धा यस्मात् स्वादु चलोर्मि वेत्रवत्याः पयः सभ्रू- भङ्गं मुखम् इव तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि।

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