मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ८३
भावार्थः—हे मेघ ! उदयन उज्जयिन्यामेव वासवदत्तमपहृतवान् । अत्रैव प्रद्योतस्य राज्ञः सौवर्णतालवृक्षकाननमासीत्, अस्मिन्नेव प्रदेशे नलगिरिनामा उज्जयिनीनरेशगजः मदात् स्थूणमुत्पाट्य बभ्राम, एतादृशीः कथाः श्रावयित्वा कथाज्ञाता जनः देशान्तरादागतानां बान्धवानां मनांसि रमयति ।
हिन्दी—हे मेघ ! इसी उज्जयिनी में उदयन ने वासवदत्ता का अपहरण किया था । यहीं प्रद्योत का सोने का बना तालवृक्षों का वन था । इसी उज्जयिनी में, नलगिरि नाम के राजा का हाथी मदमत्त होकर खम्भों को उखाड़कर घूमा करता था, इस प्रकार की कथाओं को कहकर जानकार लोग दूसरे देश से आये हुए बन्धुओं का मनोविनोद किया करते हैं।
समासः—वत्सानां राजा = वत्सराजः ( ष० तत्० ) । प्रिया चासौ दुहिता च ताम् = प्रियदुहितरम् ( कर्म० धा० ) । तालानां द्रुमाः = तालद्रुमाः ( ष० तत्० ) तेषां वनम् तम् तालद्रुमवनम् ( ष० तत्० ) ।
कोशः—दर्पोऽवलेपोऽहङ्कारः, इत्यमरः । वार्तासंभाव्ययोः किल, इत्यमरः । प्रवीणे निपुणाभिज्ञनिष्णातशिक्षिताः, इत्यमरः । स्युरावैशिक आगन्तुर-तिथिनां गृहागते, इत्यमरः ।
टिप्पणी—वत्सराजः—यहाँ वत्स पद का राजा के साथ समास हो जाने पर ‘‘राजाऽहःसखिभ्यष्टच्’’ इस सूत्र से ‘‘टच्’’ प्रत्यय हुआ है ।
अभिज्ञः—‘‘अभि जानातीति’’ इस विग्रह में ‘‘अभि’’ पूर्वक ज्ञानार्थक ‘‘ज्ञा’’ धातु से ‘‘आतश्चोपसर्गे कः’’ इस सूत्र से ‘‘क’’ प्रत्यय लाकर ‘‘अभिज्ञ’’ ऐसा रूप बना है ।
अलंकार—जयदेव के ‘‘भाविकं भूतभाव्यर्थसाक्षाद्दर्शनवर्णनम् । अलं विलोकयाऽद्यापि युध्यन्तेऽत्र सुराऽसुराः ॥’’
इस लक्षण के अनुसार यहाँ ‘‘भाविक’’ नामक अलङ्कार है, क्योंकि यहाँ वत्सराजादि के बीते हुए वृत्तान्त का साक्षात् दर्शन के समान कथन है ॥