मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ९४
हिन्दी—हे मेघ ! सन्ध्या के अतिरिक्त दूसरे समय में भी महाकाल के पवित्र स्थान में जाकर जबतक सूर्य डूब नहीं जाते तब तक ठहरना। (क्योंकि) महाकालेश्वर की सायंकाल की पूजा ( आरती ) में नगाड़े के काम को करते हुए तुम थोड़े गम्भीर गर्जन का सम्पूर्ण फल प्राप्त करोगे।
समासः—धरतीति धरः जलानां धरः=जलधरः (ष० तत्०)। नयनयोः विषयः = नयनविषयः ( ष० तत् ० ) तम् । सन्ध्यायाः बलिः = सन्ध्याबलिः ( ष० तत् ० ) तस्य पटहः=सन्ध्याबलिपटहः ( ष० तत् ० ) तस्य भावस्तम्=सन्ध्याबलिपटहताम् । विगताः कलाः यस्मात् तत् विकलम् (बहु०) न विकलम् =अविकलम् ( नञ् ) ।
कोशः—यावत्तावच्च साकल्येऽवधौ मानेऽवधारणे, इत्यमरः । शिवः शूली महेश्वरः, इत्यमरः । बलिः पूजापहारे च, इति वैजयन्ती । कलो मन्द्रस्तु गम्भीरे, इत्यमरः । आनकः पटहोऽस्त्री स्यात्, इत्यमरः । स्तनितं गर्जितं मेघनिर्घोषे-रसितादि च, इत्यमरः ।
टिप्पणी—धरतीति धरः = यहाँ धारण अर्थ में विद्यमान ‘धृञ्’ धातु से ‘‘नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः’’ इस सूत्र से पचादित्वात् ‘अच्’ प्रत्यय किया गया है। आसाद्य—‘आङ्’ उपसर्गपूर्वक ( ष ) ‘‘सद्’’ धातु से क्त्वा प्रत्यय करके एवं उसके स्थान पर ल्यबादेश करके ‘‘आसाद्य’’ ऐसा रूप बनता है। अत्येति—‘‘अति’’ उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक ‘इण्’ धातु के लट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का ‘अत्येति’ यह रूप है। स्थातव्यं ते—तव्यत् प्रत्यय के कृत्य होने के कारण ‘स्थातव्यम्’ के योग में ‘कृत्यानां कर्तरि वा’ इस सूत्र से विकल्प से षष्ठी यहाँ हुई है, जिसका अर्थ ‘त्वया’ है । यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि युष्मद् अस्मद् शब्द को ते, मे, आदेश वाक्य के आदि में नहीं होता है, जैसा कि ‘गन्तव्या ते वसतिः’ यहाँ पर भी ‘ते’ प्रयोग वाक्य के आदि में नहीं किया गया है। सन्ध्या—‘सम्’ उपसर्गपूर्वक चिन्ता अर्थ में विद्यमान् ‘ध्यै’ धातु से आत्व करके ‘आतश्चोपसर्गे’ इस सूत्र से ‘अङ्’ प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके ‘संध्या’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है।