मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ९५
शब्दार्थः—पश्चात् = सायंकाल की पूजा के बाद, नृत्यारम्भे = ताण्डव के प्रारम्भ में, प्रतिनवजपापुष्परक्तम् = नवीन जपा (अड़हुल) पुष्प के समान लाल, सान्ध्यम् = सायंकालिक, तेजः = प्रकाश को, दधानः = धारण करते हुए, उच्चैर्भुजतरुवनम् = ऊँचे बाहुरूपी वृक्षों के वन पर, मण्डलेन = वृत्ताकारतया, अभिलोनः = व्याप्त होकर, भवान्या = पार्वती के द्वारा, शान्तोद्वेगस्तिमितनयनम् = निर्भय होकर निश्चल आँखों से, दृष्टभक्तिः = देखी गयी है भक्ति जिनकी (ऐसे तुम) पशुपतेः = शिवजी की, आर्द्रनागाजिनेच्छाम् = (शोणित से) गीले हाथी के चमड़े की इच्छा को, हर = दूर करना।
भावार्थः—सायङ्कालिक-पूजावसाने ताण्डवारम्भे नवीन-जपापुष्पाऽऽरुण्यमिव सायङ्कालिकं प्रकाशं धारयन् उच्छ्रितबाहुरूपे वृक्षवने मण्डलाकारेणाच्छन्नः सन् पार्वत्या विगतभयस्थिरलोचनेनावलोक्यमानः, अवलोकितपूज्यानुरागस्त्वं शिवस्य आर्द्रगजचर्माऽऽभिलापमपनय।
हिन्दी—सायं समय की पूजा के बाद ताण्डव (नृत्य) के प्रारम्भ में नवीन जपाकुसुम के समान सायङ्कालिक तेज को धारण करते हुए, ऊँचे बाहुरूपी वृक्षों के वनों पर वृत्ताकार रूप से व्याप्त होकर, पार्वती के द्वारा निर्भयपूर्वक निश्चल आँखों से देखे जाते हुए तुम शिवजी के ताजे हाथी के चमड़े की (ओढ़ने की) इच्छा को दूर करना।
समासः—पशूनां पतिः=पशुपतिः (ष० तत्०) तस्य। नृत्यस्य, आरम्भे=नृत्यारम्भे (ष० तत्०), नवं प्रतिगतं = प्रतिनवं च तत् जपापुष्पम् = प्रतिनवजपापुष्पम् (कर्म० धा०) तद्वत् रक्तम्=(उपमानकर्म०)। उच्चैर्भुजा एव तरवः (रूपक०) भुजतरूणां वनम् = उच्चैर्भुजतरुवनम् (ष० तत्०)। शान्त उद्वेगो ययोस्ते शान्तोद्वेगे (बहुव्री०) अतएव स्तिमिते नयने यस्मिंस्तत् यथा तथा (बहुव्री०) क्रियाविशेषणम्। (दृष्टं वस्तु) भक्तिरेव यस्य सः दृष्टभक्तिः (बहुव्री०)।
कोशः—नाट्यं नृत्यञ्च नर्तने, इत्यमरः। प्रत्यग्रोऽभिनवो नव्यः, इत्यमरः उद्वेगरत्तवदिते क्लेशे भये मन्थरगामिनि, इति शब्दार्णवः। मण्डलं परिधौ कोष्ठे
७ मे० दू०