मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९६ | मेघदूतम् |
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देशे द्वादशराशिषु, इति मेदिनी। स्तिमितोऽञ्च्चलाद्रेयः, इति मेदिनी। आर्द्रं क्लिन्नं निमित्तं स्तिमितं सम्मुन्नतं मुक्तञ्च, इत्यमरः। अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्री, इत्यमरः।
टिप्पणी— पश्चात् यह अव्यय है। "अपरस्मिन्" ऐसा विग्रह करके "अपर" के स्थान में "पश्चात्" इस सूत्र से "पश्चात्" आदेश किया गया है। दधानः— धारणार्थक "धा" धातु से लट्लकार में तिप् के स्थान पर "लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे" इस सूत्र से "शानच्" आदेश किया गया है। उच्चैः— यह अव्यय है; इस शब्द से आयी विभक्ति का "अव्ययादाप्सुपः' इस सूत्र से 'लुक्' हो गया है।
इसका सभी वचनों एवं सभी विभक्तियों में और तीनों लिङ्गों में एक-सा ही रूप रहता है। क्योंकि अव्यय का सामान्य लक्षण है—
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम्॥
सान्ध्यम्— सन्ध्यायां भवः = सान्ध्यम् यहाँ सन्ध्या शब्द से "तत्र भव" इस सूत्र से अण् प्रत्यय लाकर "सान्ध्यम्" ऐसा रूप बनता है।
भवानी— भवस्य स्त्री इस विग्रह में "भव" शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में ‘इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमाऽरण्ययवयवनमातुलाऽऽचार्याणामानुक्’ इस सूत्र से "ङीप्" प्रत्यय एवं "आनुक्" का आगम हुआ है।
दृष्टभक्तिः— महाकवि का यह प्रयोग पाणिनीय व्याकरण के विरुद्ध प्रयोगों में अन्यतम है। "दृष्टा भक्तिर्यस्य" इस विग्रह में समास हो जाने के पश्चात् "स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु" इस सूत्र से "दृष्टा" इस पद को पुंवद्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त सूत्र "प्रियादि" गणपठित शब्द से भिन्न शब्दों के परे रहते ही पुंवद्भाव करता है, जब कि "भक्ति" शब्द का पाठ "प्रियादि" गण में आता है। अतः पाणिनीय व्याकरण-सम्मत तो "दृष्टा भक्तिः' ऐसा ही प्रयोग होगा। कुछ विद्वानों ने इसको व्याकरण-सम्मत बनाने का परिश्रम किया है। उनका विग्रह "दृष्टं"