मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ९७
( वस्तु ) भक्तिः यस्य" इस प्रकार है। उनका अभिप्राय है "दृष्ट" शब्द "भक्ति" का विशेषण न होकर स्वतन्त्र विशेष्य है और "प्रमाणम्—वेदः" की तरह शुद्ध है। परन्तु यह केवल खींचा-तानी ही प्रतीत होता है क्योंकि महाकवि का अभिप्राय वही है जो "दृष्टा भक्ति" से ध्वनित हो रहा है।
अलङ्कार—इस श्लोक में "भुजतरुवनम्" यहाँ भुजाओं में रूपक का आरोप होने से "रूपक" अलंकार है। "प्रतिनवजपापुष्परक्तम्" यहाँ उपमानवाची सामान्य शब्द इवादि के लोप होने से लुप्तोपमा है, एवं सान्ध्यतेज को मेघ के धारण करने से असंभव वस्तु सम्बन्ध बिम्बप्रतिबिम्बभाव व्यक्त हो रहे हैं। अतः यहाँ "निदर्शना" नामक अलंकार है। इस प्रकार तीनों की संसृष्टि होने से "संकर" नामक अलंकार है ॥ ३६ ॥
गच्छन्तीनां रमणवसतिं योषितां तत्र नक्तं
रुद्धालोके नरपतिपथे सूचिभेद्यैस्तमोभिः ।
सौदामन्या कनकनिकषस्निग्धया दर्शयोर्वी
तोयोत्सर्गस्तनितमुखरो मास्मभूर्विक्लवास्ताः ॥३७॥
अन्वयः—तत्र नक्तं रमणवसतिं गच्छन्तीनां योषितां सूचिभेद्यैः तमोभिः रुद्धालोके नरपतिपथे कनकनिकषस्निग्धया सौदामन्या उर्वीम् दर्शय तोयोत्सर्गस्तनितमुखरः मास्मभूः ताः विक्लवाः ।
व्याख्या—तत्र =उज्जयिन्याम्, नक्तम् =निशायाम्, रमणवसतिम् =प्रेमीसदनम्, गच्छन्तीनाम् =यान्तीनाम्, योषिताम् =स्त्रीणाम्, अभिसारिकाणामित्यभिप्रायः । सूचिभेद्यैः =निविडैः (कविप्रसिद्धोऽयं शब्दः), तमोभिः =अन्धकारैः, रुद्धालोके =आवृत्तप्रकाशे, नरपतिपथे =राजमार्गे, कनकनिकषस्निग्धया =हैमशाणरेखातेजसा, सौदामन्या =तडिता, उर्वीम् =पृथ्वीम् मार्गमितिभावः, दर्शय =आलोकय, तोयोत्सर्गस्तनितमुखरः =वृष्टिगर्जनवाचालः, मास्मभूः =नो भव, ( यतो हि ) ताः =प्रियसदनगन्तुमुत्सुकाः अभिसारिकाः, विक्लवाः =भीरुका भवन्ति अतः ताः त्वया न भेतव्याः ।