मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ९९
टिप्पणी—नक्तम्=यह अव्यय है। रमणः—रमायतीति विग्रह में क्रीडार्थक "रम्" धातु से णिच् प्रत्यय करके कर्ता में "नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः" इस सूत्र से ल्यु प्रत्यय करके ह्रस्वादि करके "रमण" ऐसा रूप बनता है। सूचिभेद्यैः—सूई से छेदने योग्य, यह इस शब्द का अर्थ है। परन्तु यह गाढ़े अन्धकार के लिए प्रयुक्त होता है, ऐसी कविप्रसिद्धि है। नरपतिपथेः—यहाँ नरपति शब्द का "पथिन्" शब्द के साथ समास हो जाने पर 'ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे' इस सूत्र से समासान्त "अ" प्रत्यय करके उपधालोपादि करके "नरपतिपथ" ऐसा रूप बनता है ! उक्तरूप उसी शब्द के सप्तमी विभक्ति का है। मुखरः—मुखमस्यास्ती विग्रह में मुख शब्द से "रप्रकरणे खमुखकुञ्जेभ्यः रः" इससे रप्रत्यय करके "मुखर" ऐसा रूप बनाया जाता है।
अलङ्कारः—यहाँ "कनक-निकषस्निग्धया" इसमें लुप्तोपमा नामक अलङ्कार है। एवं "तोयोत्सर्गस्तनितमुखरः" इसका हेतु "विक्लवास्ताः" यह पद है इसलिए वाक्यार्थहेतुक-"काव्यलिङ्ग" नामक अलङ्कार है। अतः यहाँ दोनों का "संसृष्टि" नामक अलङ्कार है ॥ ३७ ॥
तां कस्यांचिद्भवन-वलभौ सुप्तपारावतायां नीत्वा रात्रिं चिर-विलसनात्खिन्नविद्युत्कलत्रः। दृष्टे सूर्ये पुनरपि भवान् वाहयेदध्वशेषं मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥ ३८ ॥
अन्वयः—चिरविलसनात् खिन्न-विद्युत्कलत्रः भवान् सुप्तपारावतायाम् कस्यांचित् भवनवलभौ ताम् रात्रिम् नीत्वा सूर्ये दृष्टे पुनरपि अध्वशेषम् वाहयेत्, सुहृदाम् अभ्युपेताऽर्थकृत्याः न मन्दायन्ते खलु।
व्याख्या—(हे मेघ) चिरविलसनात्=बहुकालं यावत्-स्फुरणात्, खिन्नविद्युत्कलत्रः=श्रान्तचञ्चलभार्यः, भवान्=मेघः, सुप्तपारावतायाम्=निद्रितकपोतानाम्, कस्यांचिद्=अन्यतमायाम्, भवन-वलभौ=हर्म्याच्छादनोपरि-भागे, तां रात्रिम्=तां रजनीम्, नीत्वा=व्यतीत्य सूर्ये=भानौ, दृष्टे=उदिते, पुनरपि=भूयोऽपि, अध्व-