मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२ | मेघदूतम् |
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रमणं कृत्वा स्वकीयां खण्डितां नायिकामनुनयेन प्रार्थयन्ति, अतः भानोः=दिनकरस्य, वर्त्म = पन्थानम्, आशु=शीघ्रम्, त्यज = मुञ्च । सः = सूर्यः अपि, नलिन्याः = पद्मिन्याः, कमलवदनात् = पद्म-मुखात्, प्रालेयास्रम् = नीहारविन्दुम् हर्तुम् = दूरीकर्तुम्, प्रत्यावृत्तः, ( सन् ) त्वयि = मेघे, कररुधि = किरणावरोधे सति, अनल्पाभ्यसूयः = प्रकामेर्ष्युः, स्यात् = भवेत् ।
शब्दार्थः—तस्मिन् = पहले कहे गये, काले=समय में (सूर्योदय काल में) प्रणयिभिः=प्रेमियों के द्वारा, खण्डितानाम् = जिनके पति दूसरी स्त्री के साथ रमण करते हैं ऐसी, योषिताम् = स्त्रियों के, नयनसलिलम् = आँसुओं को, शान्तिम्=शान्त, नेयम् = करना ( होता है ), रात्रि के बीत जाने पर, जो पुरुष दूसरी स्त्रियों के साथ संभोग करते हैं वे अपनी खण्डिता पत्नी को मनाने के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं, अतः भानोः=सूर्य के, वर्त्म=मार्ग को, आशु=शीघ्रता से, त्यज = छोड़ देना, क्योंकि, सः = सूर्य, अपि = भी, नलिन्याः = कमलिनी के, कमल-वदनात् = कमलरूपी मुँह से, प्रालेयास्रम्=ओस-कणरूपी आँसुओं को, हर्तुम् = दूर करने के लिए, प्रत्यावृत्तः = लौटा हुआ रहता है, त्वयि = तुम्हारे ( द्वारा ), कररुधि=किरण के रोके जाने पर, अनल्पाभ्यसूयः=अत्यधिक द्वेष वाले, स्यात् = हो जायेंगे ।
भावार्थः—हे मेघ ! सूर्योदय-काले, वल्लभैः खण्डितानां कामिनीनां नेत्राश्रु शमनीयं भवत्यतः भानुपथं त्वरितं मुञ्च । यतो हि सूर्योऽपि नलिन्याः पद्मरूपान्मुखान्मिहिकारूपमश्रु निवारयितुं प्रत्यागतः ( भवति ) तस्मिन् काले त्वयि तदीयकरावरोधके सति सः त्वां प्रत्यधिकेष्र्यं भवेत् ।
हिन्दी—हे मेघ ! सूर्योदय-काल में प्रेमियों को अपनी खण्डिता पत्नियों के आँसुओं को दूर करना रहता है अर्थात् तुम सूर्य के मार्ग को शीघ्र छोड़ देना । क्योंकि वे भी अपनी प्रिया कमलिनी के कमलरूपी मुख से ओसरूपी आँसू को हटाने के लिए, वापस आते हैं, उस समय यदि तुम (उनके) हाथों (किरणों) के बाधक बनोगे तो वे (तुम्हारे प्रति) अधिक क्रुद्ध हो जायेंगे ।
समासः—नयनयोः सलिलं=नयनसलिलम् ( ष० तत्० )। कमलमेक