मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः | १०३
वदनम् = कमलवदनम् ( रूपककर्मधा० ) तस्मात् । न अल्पा = अनल्पा (नञ्) अनल्पा अभ्यसूया यस्य स = अनल्पाभ्यसूयः ( बहुव्री० ) ।
कोषः—अयनं वर्त्म मार्गाऽध्व, इत्यमरः । सलिलं कमलं जलम्, इत्यमरः, तृणेऽम्बुजे नलं वा तु राज्ञि नाले तु न स्त्रियाम्, इति शब्दार्णवः । प्रालेयं मिहिकाचार्था, इत्यमरः । अस्रकोणे कचे पुंसि क्लीबमश्रुणि शोणिते, इति मेदिनी । बलिहस्तांशवः, कराः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—खण्डितानाम्—वैसे तो नायिका के बहुत भेदोपभेद हैं पर मुख्य आठ भेदों में “खण्डिता” भी एक नायिका का विशेष भेद होता है । “खण्डिता नायिका” उसे कहते हैं जिनके पति रात्रि में किसी दूसरी स्त्री के साथ विहार करते हैं और वह यह जान जाती है कि मेरे पति अमुक स्त्री के साथ रात्रि व्यतीत करते हैं । यहाँ सूर्य अस्ताचल पर जाकर उधर की कमलिनियों के साथ विहार करते हैं अतः इधर की कमलिनियाँ खण्डिता हुईं । मैंने हिन्दी एवं संस्कृत दोनों व्याख्याओं में इस बात का संकेत किया है ।
शान्ति नेयम्—‘‘नी’’ धातु द्विकर्मक है, अतः “नयनसलिलम्” यह पद यहाँ मुख्य कर्म है एवं “सलिलम्” यह गौणकर्मवाची पद है । प्रत्यावृत्तः—प्रति उपसर्गपूर्वक ‘वृत्’ धातु से “क्त” प्रत्यय करके “प्रत्यावृत्तः” ऐसा रूप बनता है । कररुधि—‘कर’ उपपदपूर्वक “रुध्” धातु से क्विप् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप करके “कररुध्” ऐसा शब्द बनता है । यह रूप उसी शब्द के सप्तमी विभक्ति का है ।
अलङ्कारः—यहाँ “भानोः वर्त्म त्यज” इस पूर्वार्द्धकथित वाक्य का उत्तरार्द्ध का वाक्यार्थ हेतु है, अतः “काव्यलिङ्ग” अलङ्कार है । और लिङ्ग-समानता से नलिनी में नायिका और सूर्य में नायक का आरोप होने से “समासोक्ति” अलङ्कार है, एवं “कररुधि” इस शब्द के “कर” में “श्लेष” अलङ्कार है । एवं तीनों का अङ्गाङ्गिभाव होने से “संकर” नामक अलङ्कार है ॥३९॥
गम्भीरायाः पयसि सरितश्चेतसीव प्रसन्ने छायात्मापि प्रकृतिसुभगो लप्स्यते ते प्रवेशम् ।