मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः १०७
कः = कौन पुरुष, विवृत-जघनाम् = उघड़ी जंघाओं वाली (कामिनी) को, विहातुम्-छोड़ने के लिए, समर्थः = (होगा) अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थः—हे मेघ ! वेतसशाखाप्राप्ता ईषद्वस्तगृहीतमिव त्यक्त-तटरूप-नितम्ब कृष्णवर्णं जलरूपवस्त्रमपनीय तव गम्भीरायाः नद्याः प्रस्थानं कष्टेन भविष्यति ! यतो हि अनुभूतकामिनी-संभोग-सुखः कः पुरुष एवं स्यात् यः प्रदर्शितजघनां नारीं त्यक्तुम् (अनुपभोक्तुम्) समर्थो भवेत्।
हिन्दी—हे मेघ ! समीप तक बेंत की शाखाओं के पहुँचने के कारण कुछ-कुछ हाथों से पकड़े हुए की तरह, छोड़ दिया है तटरूपी नितम्ब को जिसने काले रंग के जलरूपी वस्त्र को हटाकर गम्भीरा नदी के पास से तेरा जाना बहुत कठिन होगा। क्योंकि जिसने कामिनीसंभोग के सुख का अनुभव कर लिया है ऐसा कौन पुरुष होगा जो उघड़ी जंघाओं वाली स्त्री को छोड़ सकता है ?'
समासः—प्राप्ता वानीर-शाखा येन तत् प्राप्त-वानीर-शाखम् (बहुव्री०)। करेण धृतम् = करधृतम् (तृ० तत्०)। रोध एवं नितम्बः रोधोनितम्बः (रूपक) मुक्तः रोधोनितम्बो येन तत् = मुक्तिरोधोनितम्बम् (बहुव्री०)। सलिलमेव वसनं तत् = सलिलवसनम् (रूपक० कर्म०) ज्ञातः स्वादो येन सः ज्ञातस्वादः (बहु०)। विवृतं जघनं यस्याः ताम विवृत-जघनाम् । (बहुव्री०)।
कोशः—कूलं रोधश्च तीरश्च प्रतीरञ्च तटं त्रिषु, इत्यमरः। नितम्बः पश्चिमे भागेऽद्रि कटके कटौ, इति यादवः। जघनं स्यात् कटौ पूर्वंश्रोणिभागा-परांशयोः, इति यादवः।
टिप्पणी—विवृतम्—"वि" उपसर्गपूर्वक "वृ" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "विवृत" शब्द बनता है। विहातुम्—"वि" उपसर्गपूर्वक (ओ) हा धातु से जिसका "त्याग" अर्थ है "तुमुन्" प्रत्यय करके "विहातुम्" ऐसा रूप बनता है। कुछ टीकाकार "विवृतजघनाम्" के स्थान पर "विपुल-जघ-नाम्" ऐसा पाठ मानते हैं।
अलंकारः—यहाँ "करधृतमिव" इस पद में "उत्प्रेक्षा" रोध में नितम्ब एवं सलिल में वसन का आरोप शब्दरूपक तथा गम्भीरा में नायिका का