भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः १४७

पार्वतीजी ने भी भयातुर होकर शिवजी का आलिङ्गन किया। इधर सभी को भयभीत देख शिवजी ने रावण के अभिमान को चूर्ण करने के लिए कैलास पर्वत को अपने अँगूठे से नीचे की ओर दबाया। परिणामस्वरूप कैलास तो बैठ ही गया साथ ही रावण भी उसी में कुचला जाने लगा। तब रावण के बहुत प्रार्थना करने पर शिवजी ने उसे बचा लिया। कैलासः—केलीनां समूहः = कैलम् “तस्य समूहः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ और कैलेन आस्यते अस्मिन्निति “कैलासः” ‘कैल’ उपपदक “आस” धातु से “हलश्च” इस सूत्र से अधिकरण में “घञ्” प्रत्यय करके “कैलास” यह रूप निष्पन्न होता है। अतिथिः—अविद्यमाना तिथिर्यस्य स अतिथिः—जहाँ “नञोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वाचोत्तरपदलोपः” इस वार्तिक से नञ् बहुव्रीहि समास हुआ है तब “अतिथि” ऐसा रूप बनता है। राशीभूतः—अराशिः राशिः यथा सम्पद्यते इति राशीभूतः “अभूततद्भाव” अर्थ में ‘च्वि’ प्रत्यय हुआ है। श्रायाः—श्रयणानि श्रायाः सेवा अर्थ में विद्यमान ‘श्रि’ धातु से ‘श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे’ इस सूत्र से ‘घञ्’ प्रत्यय करके ‘श्राय’ ऐसा रूप बनता है। एवं उद्गताः श्रायाः = उच्छ्रायाः ‘कुगतिप्रादयः’ इस सूत्र से समास हुआ है।

अलंकारः—प्रस्तुत पद्य में ‘कुमुदविशदैः’ यहाँ उपमा एवं ‘अट्टहास इव’ यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। और दोनों अङ्गाङ्गिभाव रूप से विद्यमान हैं। अतः ‘संकर’ अलंकार है॥ ५८॥

उत्पश्यामि त्वयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे
सद्यः कृत्तद्विरददशनच्छेद—गौरस्य तस्य।
शोभामद्रेः स्तिमितनयन-प्रेक्षणीयां भवित्री-
मसंस्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव ॥५९॥

अन्वयः—स्निग्धभिन्नाऽञ्जनाऽऽभे त्वयि तटगते सद्यःकृत्तद्विरददशनच्छेद-गौरस्य तस्य अद्रेः मेचके वाससि असंस्यस्ते सति हलभृत इव स्तिमितनयन-प्रेक्षणीयाम् शोभाम् भवित्रीम् उत्पश्यामि।

व्याख्या—स्निग्धभिन्नाऽञ्जनाऽऽभे = चिक्कणमर्दित — कज्जलकान्तौ, त्वयि = मेघे, तटगते = सानुगते, (सति) सद्यः = तत्क्षणम्, कृत्तद्विरददशनच्छेद-