मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ | मेघदूतम्
हुए, ऐरावतस्य=ऐरावत नामक इन्द्र के हाथी को, क्षणमुखपटप्रीतिम्=कुछ समय के लिए मुँह ढकने वाले वस्त्र का आनन्द, कुर्वन्=देते हुए, अंशुकानीव=महीन (चिकने) वस्त्र की तरह, कल्पद्रुमकिसलयानि=कल्पवृक्ष के पल्लवों को, वातैः=वायु से, धुन्वन्=कँपाते हुए, नाना-चेष्टैः=अनेक प्रकार की चेष्टाओं से युक्त, ललितैः=विलासों से, तम्=उस, नगेन्द्रम्=पर्वतराज कैलास का, निर्विशेः=आनन्द लेना।
भावार्थः—हे मेघ ! स्वर्णपद्मोत्पत्तिस्थानभूतं मानससरोवरजलं पिबन्, किञ्चिन्ममुहूर्तं यावत् इन्द्रहस्तिनः ऐरावतस्यानानवागुण्ठनानन्दं प्रयच्छन् मसृण-वस्त्राणीव कल्पद्रुमपल्लवानि पवनैः कम्पयन् अनेक-प्रकारैः क्रीडितैः कैलासं यथेष्टमुपभुङ्क्ष्व ।
हिन्दी—हे मेघ ! स्वर्ण-कमलों को उत्पन्न करने वाले मानसरोवर के जल को पीते हुए, ऐरावत हाथी को मुँह के घूंघट का आनन्द देते हुए, पतले वस्त्रों के समान कल्पवृक्ष के पत्तों को हवा से हिलाते हुए तुम अनेक प्रकार की चेष्टाओं से युक्त क्रीड़ाओं से उस कैलास पर्वत का पर्याप्त उपभोग करना ॥ ६२ ॥
समासः—हेम्नः अम्भोजानि (ष० तत्०) हेमाम्भोजानां प्रसवित् यत् तत्=हेमाम्भोजप्रसवि (ष० तत्०)। कल्पद्रुमाणां किसलयानि=कल्पद्रुम-किसलयानि (ष० तत्०)। नाना चेष्टा येषां येषु वा तैः, नानाचेष्टैः (बहु०)।
कोशः—अंशुके वस्त्रमात्रे स्यात्परिधानोत्तरीययोः, इति शब्दार्णवः । ना भावभेदे स्त्रीनृत्ये ललितं त्रिषु सुन्दरे, अस्त्रियां प्रमदागारे क्रीडिते जातिपल्लवे, इति शब्दार्णवः । निर्वेशो भृतिभोगयोः, इत्यमरः । निर्वेश उपभोगः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—जलदः—जलं ददाति इस विग्रह में “जल” उपपदपूर्वक दानार्थ “दा” धातु से “आतोऽनुपसर्गे कः” इस सूत्र से क प्रत्यय करके “जलद” ऐसा रूप निष्पन्न होता है । हेमाम्भोजः—अम्भसि जातानीति अम्भोजानि, यहाँ “अम्भस्” उपपदपूर्वक प्रादुर्भावार्थक ‘जन्’ धातु से “सप्तम्यां जनेर्डः” इस सूत्र से ‘ड’ प्रत्यय करके “डित्त्वसामर्थ्यादमस्यापि टेलोपः” इस वचन के