भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 335 में से

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उत्तरमेघः १६१

त्वदुपगमजम् = मेघागमनजन्यम्, वर्षर्तुभवमिति भावः, नीपम् = कदम्बम् अस्तीति शेषः ॥ २ ॥

शब्दार्थः—हे मेघ ! यत्र = जिस अलका में, वधूनाम् = स्त्रियों के, करे = हाथ में, लीला-कमलम् = क्रीडाकमल ( है ), अलके = घुँघराले बालों में, बाल-कुन्दानुविद्धम् = नवीनकुन्द के फूलों का गुम्फन ( है ), आनने = मुँह में, लोध्र-प्रसवरजसा = लोध्रपुष्प के पराग से, पाण्डुतां = गौरवर्णता को, नीताः = प्राप्त, श्रीः = शोभा (है), चूडापाशे = वेणियों में, नव-कुरबकम् = कुरबक के फूल हैं, कर्णे = कान में, चारु = सुन्दर, शिरीषम् = शिरीष (मोलश्री) फूल हैं, सीमन्ते = माँग में, त्वदुपगमजम् = तुम्हारे आने पर अर्थात् वर्षाऋतु आने पर उत्पन्न, नीपम् = कदम्ब पुष्प है ।

भावार्थः—हे मेघ ! यत्रालकायां स्त्रीणामङ्गेषु सर्वेषु ऋतुषु जायमानानि पुष्पाणि सर्वदेव विराजन्ते । यथा करे शरदर्तुभवं पद्मम्, चूर्णकुन्तले हेमन्तर्तुभवं नवकुन्दानुविद्धम्, आनने शिशिर-सूचिका-लोध्रपुष्पपरागेण श्वेततां नीता शोभा, चूडापाशे वसन्तर्तुभवं नवकुरबकपुष्पम्, कर्णे सुन्दरं ग्रैष्मं शिरीष-पुष्पं, सीमन्ते च वर्षर्तुभवं कदम्बपुष्पं विराजते ॥ २ ॥

हिन्दी—हे मेघ ! जिस अलका में छहों ऋतुओं में होने वाले फूल सर्वदा स्त्रियों के अङ्गों में लगे रहते हैं । जैसे स्त्रियों के हाथ में शरदऋतु में होने वाला कमल है, घुंघराले बालों में हेमन्त ऋतु में होने वाले नवीन कुन्दों का गुम्फन है, मुँह पर शिशिरऋतु में होने वाले ‘लोध्र’ पुष्प के पराग से गौरवर्णता को प्राप्त शोभा है, केश की गूंथी चोटी में वसन्तऋतु में होने वाले नये कुरबक के फल हैं, कान में ग्रीष्म ऋतु में होने वाले सुन्दर शिरीष के फूल हैं और माँग में वर्षा ऋतु में होने वाले कदम्ब के पुष्प हैं ॥ २ ॥

समासः—लीलायै कमलम् = लीलाकमलम् ( चतु० तत्० ), बालानि तानि कुन्दानि बालकुन्दानि ( कर्म० ) बालकुन्दानाम् अनुविद्धम् = बालकुन्दानुविद्धम् ( ष० तत्० ) लोध्रस्य प्रसवाः = लोध्र-प्रसवाः ( ष० तत्० ) लोध्रप्रसवानां रजः = लोध्रप्रसवरजः ( ष० तत्० ) तेन । नवञ्च तत् कुरबकम्

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