मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६२ | मेघदूतम् |
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नवकुरबकम् ( कर्म० )। चूडानां पाशः = चूडापाशः ( ष० तत्० ) तस्मिन् । सीम्नः अन्तः सीमन्त, ( ष० तत्० ) तस्मिन् । तव उपगमः = त्वदुपगमः ( ष० तत्० )।
कोशः—वधूर्जायास्नुषास्त्री च, इत्यमरः। सीमान्तम-स्त्रियां मस्तकेश-वीथ्यामुदाहृतम्, इति शब्दार्णवः। वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं लपनं मुखम् इत्यमरः। परागः सुमनोरजः, इत्यमरः।
टिप्पणी—अलकम् = यहाँ सप्तमी विभक्ति के नहीं होने से भग्नप्रक्रम दोष है। शीघ्रप्रसवरजसा पाण्डुता—जिस तरह आजकल की वधुएं मुँह पर शोभा लाने के लिए “पाउडर” आदि का उपयोग करती हैं उसी तरह यक्ष के समय में भी स्त्रियां लोध्र-पुष्प के पराग का उपयोग करती थीं। लोध्र-पुष्प रक्त वर्ण का होता है और उसका पराग गौर वर्ण का होता है, अतः उसका उपयोग किया जाता रहा होगा। यहाँ “श्री” के प्रधान कर्म होने से कर्मवाच्य में “प्रधाने नीहृत्कृष्वहाम्” इस नियम के अनुसार प्रथमा विभक्ति हुई है एवं पाण्डुता के अप्रधान कर्म होने के कारण उससे द्वितीया विभक्ति हुई है। कुरबकम्—कुरबकस्य विकारम् कुरबकम्, उक्त विग्रह में पुष्पवाची “कुरबक” शब्द से “तस्य विकारः” इस सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ तो परन्तु उसका “पुष्पमूलेषु बहुलम्” इस सूत्र से लुक् हो गया “कुरत्रक” अपने प्रकृतिरूप में ही रह गया। सीमन्तः—सीम्नः (केशस्य) अन्तः = सीमन्तः। यहाँ मांग के अर्थ में सीमन् + अन्तः ऐसी स्थिति “शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्” इस सूत्र से पररूप हुआ है, अन्य अर्थ में तु “सीमान्त” ऐसा प्रयोग होता है। त्वदुपगमजः = यहाँ युष्मद् के आगे “उपगम” यह उत्तर पद है अतः “प्रत्ययोत्तरपदयोश्च” इस सूत्र से युष्मद् के स्थान पर “त्वत्” आदेश हो गया है।
अलकापुरी भोगस्थल है अतः उसमें छहों ऋतुओं के उपभोग्य फूल सर्वदा उपलब्ध रहते हैं, इस बात को प्रदर्शित करते हुए कवि ने उसका वर्णन किया है जैसे—शरद में कमल, कुन्द पुष्प हेमन्त में, कुरबक वसन्त में, लोध्रपुष्प शिशिर में, शिरीष पुष्प ग्रीष्म में एवं कदम्ब के फूल वर्षार्ऋतु में होते हैं, परन्तु ये सभी फूल अलका की स्त्रियों के अङ्गों में सर्वदा अलंकृत रहते हैं ॥ २ ॥