मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः १६५
“मुखमस्त्येषामिति” इस विग्रह में “मुख” शब्द से “रप्रकरणे मुखकुञ्जेभ्यः उपसंख्यानम्” इस वार्तिक से रप्रत्यय करके “मुखर” ऐसा रूप निष्पन्न होता है। शिखिनः—शिखा अस्त्येषाम् इस विग्रह में “शिखा” शब्द से इनि प्रत्यय करके “शिखिन्” ऐसा शब्दरूप निष्पन्न होता है, उसी के प्रथमा विभक्ति के बहुवचन का उक्त रूप है। भास्वन्तः—भास धातु से मतुप् प्रत्यय करके उक्त रूप निष्पन्न किया जाता है। प्रदोषाः—यद्यपि “प्रदोष” गोधूलिवेला का नाम है क्योंकि कोश कहता है “प्रदोषो रजनी-मुखम्” परन्तु प्रकृति में यह लक्षणा से रात्रि का वाचक है। प्रतिहताः—“प्रति” उपसर्गपूर्वक हिसार्थक “हन्” धातु से “क्त” प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके “प्रतिहता” शब्द निष्पन्न होता है। वृत्तिः—यहाँ वर्तनाथंक “वृत्” धातु से क्तिन् प्रत्यय किया गया है।
अलङ्कारः—प्रस्तुत श्लोक में कमलिनी में नायिकाभाव गम्य है पर “हंसश्रेणीरचितरशना” यहाँ हंस-श्रेणी में रशनात्व का आरोप किया गया है अतः एकदेशविवर्ति रूपक अलंकार हुआ। एवञ्च अन्य पादपों से प्रस्तुत पद्य में वर्णित “पादप” वैशिष्ट्य का वर्णन है, अतः व्यतिरेक एवं आर्थी परिसंख्या अलङ्कार है एवं इन अलङ्कारों के परस्पर निरपेक्षभाव से रहने के कारण “संसृष्टि” अलङ्कार है।
आनन्दोत्थं नयनसलिलं यत्र नान्यैर्निमित्तै- र्नान्यस्तापः कुसुमशरजादिष्ट-संयोगसाध्यात् । नाप्यन्यस्मात् प्रणयकलहाद्विप्रयोगोपपत्ति- र्वित्तेशानां न च खलु वयो यौवनादन्यदस्ति ॥ २ ॥
अन्वयः—यत्र, वित्तेशानाम्, आनन्दोत्थम्, नयनसलिलम्, अन्यैः निमित्तैः न इष्टसंयोगसाध्यात्, कुसुमशरजात्, अन्यः, तापः न, प्रणयकलहात्, अन्यस्मात् विप्रयोगोपपत्तिः, अपि न यौवनात्, अन्यत्, वयः, अस्ति, खलु।