मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७४ | मेघदूतम् |
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या परन्तु अघर शब्द के बहुत अच्वाला होने के कारण "न क्रोडादिबह्वचः" इस सूत्र से निषेध हो गया—टाप् हो गया है । प्राप्य — "प्र" उपसर्गपूर्वक आप् ( स्वा० ) धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके "प्राप्य" ऐसा रूप बनता है । प्रस्तुत श्लोक में वर्णित बिम्बाधरियाँ "मुग्धा" जान पड़ती हैं क्योंकि पतिद्वारा साड़ी खींचे जाने पर नग्नता के कारण उत्पन्न लज्जा से किंकर्तव्यविमूढ होकर रत्नप्रदीप पर जिसकी किरणें बुझ नहीं सकतीं उस पर चूर्णमुष्टि का प्रक्षेप करती है, जो निष्फल है, क्योंकि उस दीप पर पड़कर भी वह धूलि नीचे गिर जाती हैं, प्रकाश पूर्ववत् रह जाता है, अतः वे मुग्धा हैं ।
अलङ्कारः—प्रस्तुत पद्य में चूर्णमुष्टि-प्रक्षेप रूप कारण के रहने पर रत्न-प्रदीप के बुझने रूप ( फल ) कार्य के न होने से "विशेषोक्ति" अलङ्कार है । "बिम्बाधराणाम्" यहाँ सामान्यवाचक पद के न रहने के कारण "लुप्तोपमा" है । इस तरह दोनों के परस्पर अङ्गाङ्गिभावतया रहने के कारण "संकर" नामक अलंकार है ॥ ५ ॥
नेत्रा नीताः सततमतिना यद्विमानाग्रभूमि-
रालेख्यानां स्वजलकणिका-दोषमुत्पाद्य सद्यः ।
शङ्कास्पृष्टा इव जलमुचस्त्वादृशा जालमार्गै-
र्धूमोद्गारानुकृतिनिपुणा जर्जरा निष्पतन्ति ॥ ६ ॥
अन्वयः—( हे मेघ ! ) नेत्रा, सततगतिना, यद्विमानाग्रभूमीः, नीताः, त्वादृशाः, जलमुचः, आलेख्यानाम्, स्वजलकणिकादोषम्, उत्पाद्य, सद्यः, शङ्कास्पृष्टा, इव, धूमोद्गारानुकृतिनिपुणाः, जर्जराः, जालमार्गैः, निष्पतन्ति ॥
व्याख्या—( हे मेघ ! ) नेत्रा = नायकेन, सततगतिना = अनवरतगतिना पवनेनेत्यर्थः, यद्विमानाग्रभूमीः = यत्र सप्तभूमिकभवनप्रासादोपरिभूमिका , नीताः = प्रापिता , त्वादृशाः = त्वत् समानाः, जललवमुचः = मेघाः, आलेख्यानाम् = चित्राणाम्, स्वजलकणिकादोषम् = निजतोयलवसंस्पर्शदोषम्, उत्पाद्य = सम्पाद्य, सद्यः = तत्क्षणे, शङ्कास्पृष्टा इव = भीतभीता इव, धूमोद्गारानुकृतिनिपुणाः =