मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ मेघदूतम्
कोशः—मातरिश्वा सदागतिः, इत्यमरः । चित्रं लिखितरूपाढ्यं स्यादा- लेख्यं तु यत्नतः, इति शब्दार्णवः । शङ्कावितर्कभययोः, इति शब्दार्णवः । सद्यः सपदि तत्क्षणे, इत्यमरः ।
टिप्पणी—नेत्रा—नयतीति नेता प्रापणार्थक् 'नी' धातु से तृच् प्रत्यय करके “अप्तृन्तृच्” आदि सूत्र से अनङ् आदि करके उपधादीर्घ करके “नेत्रा” शब्द व्युत्पन्न होता है । उक्तरूप तृतीया विभक्ति के एकवचन का है ।
नीताः—“नी” धातु से “क्त” प्रत्यय का विधान होने पर निष्पन्न होता है ।
त्वादृशाः—त्वमिव पश्यन्ति इस विग्रह में “युष्मद्” शब्द से “त्यदादिषु” “दृशोऽनालोचने कञ् च” इस सूत्र से “कञ्” प्रत्यय हुआ “अ” बचा एवं “आसर्वनाम्नः” इस सूत्र से युष्मद् को आकारान्तादेश हुआ तब “त्वादृश” शब्द बना है, बहुवचन में त्वादृशाः ऐसा प्रयोग होता है । उत्पाद्य— “उद्” उपसर्ग- पूर्वक णिजन्त “पादि” धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके “उत्पाद्य” ऐसा बनता है । उद्गारः— “उद्” उपसर्गपूर्वक निगरणार्थक “गॄ” धातु से भाव में “घञ्” प्रत्यय तथा वृद्ध्यादि करके “उद्गार” शब्द निष्पन्न होता है । धूमोद्गारानुकृतिनिपुणः—अनुकृतौ निपुणः यहाँ “साधु- निपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः” इस सूत्र से सप्तमी विभक्ति का विधान हुआ । पश्चात् “सप्तमी शौण्डैः” इस सूत्र से सप्तमी तत् पु० समास हुआ है ।
जालमार्गैः—यहाँ “यन्त्रजालैः” ऐसा पाठ भी कहीं-कहीं मिलता है वहाँ यन्त्रनिर्मितानि जालानि ऐसा मध्यमपदलोपी समास समझना चाहिए । निष्पतन्ति—“निस्” उपसर्गपूर्वक “पत” धातु के लट्लकार के प्रथमपुरुष के बहुवचन का उक्त रूप है ।
अलङ्कार—इस श्लोक में “शङ्कास्पृष्टा इव” इस स्थल में उत्प्रेक्षा अलङ्कार है । महामहोपाध्याय श्री मल्लिनाथजी ने इस श्लोक के द्वारा 'जिस तरह कोई जार पुरुष अन्तःपुर के दूत द्वारा चुराकर अन्तःपुर पहुँचा दिया जाता है और वह जार वहाँ स्त्रियों को दूषित कर पीछे पकड़े जाने के भय से किसी