मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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टिप्पणी-वैदूर्या- "विदूरात्प्रभवन्ति" इस विग्रह में "विदूराञ्ञ्यः" इस सूत्र से "विदूर" शब्द से "ञ्य" प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके "वैदूर्यं" शब्द निष्पन्न होता है । "विदूर" एक पर्वत है । वहाँ पर होने वाले मणियों को वैदूर्यमणि कहते हैं । हैमः- हेम्नो विकारः इस विग्रह में "तस्य विकारः" इस सूत्र से "अण्" प्रत्यय करके "हैमः" शब्द निष्पन्न होता है । छन्ना- णिजन्त 'छदि' धातु से "क्त" प्रत्यय करके "छन्न" रूप बनाया जाता है । प्रेक्ष्यः- "प्र" उपसर्गपूर्वक "क्षि" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर "ल्यप्" करके प्रेक्ष्य रूप निष्पन्न होता है । व्यपगतः- "वि" एवं "अप" उपसर्गपूर्वक "गम्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "व्यपगत" शब्द निष्पन्न होता है । संनिकृष्टम्- "कृष्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "सन्निकृष्ट" रूप निष्पन्न होता है । ऐसी कवि प्रसिद्धि है कि वर्षाऋतु में जल के गन्दा हो जाने के कारण हंस लोग "मानसरोवर" चले जाते हैं, परन्तु यहाँ के घर की वापी का जल ही इतना स्वच्छ है कि हंस लोग मेघ को देखकर अर्थात् वर्षाऋतु जानकर भी मानसरोवर जाने की कौन बात, उसका स्मरण भी नहीं करते हैं ।
अलङ्कारः- यहाँ वर्षाऋतु रूप कारण के होने पर भी मानसरोवर स्मरण रूप कार्य के न होने से "विशेषोक्ति" अलङ्कार है । एवं लोकोत्तर सम्पत्ति का वर्णन होने से "उदात्त" अलङ्कार भी है । इस तरह दोनों के अंगांगि-भावतया स्थित होने से "संकर" अलङ्कार हुआ ॥ १३ ॥
तस्यास्तीरे रचितशिखरः पेशलैरिन्द्रनीलैः क्रीडाशैलः कनककदलीवेष्टन-प्रेक्षणीयः । मद्गेहिन्याः प्रिय इति सखे ! चेतसा कातरेण प्रेक्ष्योपान्तस्फुरिततडितं त्वां तमेव स्मरामि ॥१४॥
अन्वयः- तस्याः, तीरे, पेशलैः, इन्द्रनीलैः, रचित-शिखरः, कनककदलीवेष्टन-