मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९४ मेघदूतम्
क्रीड़ापर्वत है। हे मित्र ! जिसके पास में बिजली चमक रही है ऐसे तुम्हें देखकर यह क्रीड़ापर्वत मेरी प्रिया का प्रिय है, इसलिए उसी का स्मरण कर रहा हूँ ॥ १४ ॥
समासः—रचितानि शिखराणि यस्य सः रचितशिखरः (बहु०) कनकस्य कदल्यः = कनककदल्यः (ष० तत्०) तासां वेष्टनम् = कनककदलीवेष्टनम् ( ष० तत्० ) तेन प्रेक्षणीयः = कनककदलीवेष्टनप्रेक्षणीयः ( तृ० तत्० ) । क्रीडार्थः शैलः = क्रीडाशैलः ( मध्यमपदलोपी० ) । स्फुरिताः तडितः यस्य स स्फुरित-तडित् ( बहु० ) उपान्तेषु स्फुरिततडित् = उपान्तस्फुरिततडित् (स० तत्०) तम् । मम गेहिनी = मद्गेहिनी ( ष० तत्० ) तस्याः ।
कोशः—चारौ दक्षे च पेशलः, इत्यमरः । चित्तन्तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः । कदलीवारणबुसा रम्भामोचांशुमत्फलाः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—प्रेक्षणीयम्—"प्र" उपसर्गपूर्वक "ईक्ष्" धातु से "तव्य-तव्यानीयर" इस सूत्र से "अनीयर्" प्रत्यय होकर प्रेक्षणीयम् ऐसा रूप निष्पन्न होता है । प्रेक्ष्य—यह शब्द भी "प्र" उपसर्गपूर्वक "ईक्ष्" धातु से क्त्वा प्रत्यय लाकर उसके स्थान में ल्यप् करके "प्रेक्ष्य" ऐसा रूप बनता है । गेहिनी—गेहमस्त्यस्याः इस विग्रह में "गेह" शब्द से इनि प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके "गेहिनी" शब्द निष्पन्न होता है । एव—"एव" शब्द का (१) अयोगव्यवच्छेद (२) अन्ययोगव्यवच्छेद (३) अत्यन्ताऽयोगव्यवच्छेद—इस प्रकार तीन व्यवच्छेद अर्थ समझे जाते हैं। प्रकृत में "तमेव स्मरामि" यहाँ अन्ययोगव्यवच्छेद है, अर्थात् उस क्रीड़ापर्वत से अन्य दूसरे पर्वतों का व्यवच्छेद हो रहा है, अभिप्राय यह है कि "उस क्रीड़ापर्वत का स्मरण कर रहा हूँ, किसी दूसरे पर्वत का नहीं ।"
अलङ्कारः—इस श्लोक में "तमेव स्मरामि" इस जगह "स्मरण" अलङ्कार है एवं "इन्द्रनीलैः रचितशिखरः" इत्यादि स्थलों पर "उदात्त" अलङ्कार है । एवं दोनों का अङ्गाङ्गिभाव होने से "संकर" अलङ्कार है ॥१४॥