मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः १९७
(सिद्धि) का उपयोगी है और रक्ताशोक कामवर्द्धक है। कान्तः—कान्त अर्थ में विद्यमान “कम्” धातु से “णिच्” प्रत्यय करके “कामि” धातु बनाकर तब “क्त” प्रत्यय करके “कान्त” रूप निष्पन्न होता है। दोहद—यह एक कवि-प्रसिद्ध क्रियाविशेष है। अर्थात् असमय में पेड़ों में फूल को विकसित करने के लिए जो क्रियाएँ स्त्रियों द्वारा की जाती हैं वह “दोहद” कही जाती हैं। वह भिन्न-भिन्न फूलों के लिए भिन्न-भिन्न तरीके से किया जाता है। अतः अशोक के लिए बाएँ चरण का प्रहार और बकुल के लिए मुखमदिरा का कथन किया गया है। किसी ने लिखा है—
स्त्रीणां स्पर्शात् प्रियङ्गुर्विकसति बकुलः सीधुगण्डूषसेकात् ।
पादाघातादशोकस्तिलककुरबकौ वीक्षणाऽऽलिङ्गनाभ्याम् ।
मन्दारो नर्मवाक्यात् पटुमृदुहसनाच्चम्पको वक्त्रवाता-
च्चूतो गीतान्नमेरुर्विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः ॥
इसका अर्थ है—स्त्रियों के स्पर्श से प्रियङ्गु वृक्ष, गण्डूष-मद्य-सेचन से बकुल वृक्ष, पैर के प्रहार से अशोक वृक्ष, तिलक वृक्ष दृष्टि से; कुरबक आलिङ्गन से, मन्दार वृक्ष नर्मवाक्य से, सुन्दर मधुर हँसी से चम्पक वृक्ष, मुँह से गाये गीत के द्वारा नमेरु वृक्ष और समक्षनृत्य से कर्णिकार विकसित होता है।
यहाँ 'मया सह' इसलिए दिया गया है कि यक्ष भी रतिसमय में प्रिया-पादाघात से रोमाञ्चित हुआ करता था, इस बात को ध्वनित करना था महाकवि को।
अलङ्कारः—यहाँ “मया सह” इस कथन के अनुसार “विशेषोक्ति” अलङ्कार है ॥ १५ ॥
तन्मध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनी वासयष्टि-
र्मूले बद्धा मणिभिरनति-प्रौढ-वंश-प्रकाशैः ।
तालैः शिञ्जावलयसुभगैर्नर्तितः कान्तया मे
यामाध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्वः ॥१६॥