भारतकोश
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मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

उत्तरमेघः १९७

(सिद्धि) का उपयोगी है और रक्ताशोक कामवर्द्धक है। कान्तः—कान्त अर्थ में विद्यमान “कम्” धातु से “णिच्” प्रत्यय करके “कामि” धातु बनाकर तब “क्त” प्रत्यय करके “कान्त” रूप निष्पन्न होता है। दोहद—यह एक कवि-प्रसिद्ध क्रियाविशेष है। अर्थात् असमय में पेड़ों में फूल को विकसित करने के लिए जो क्रियाएँ स्त्रियों द्वारा की जाती हैं वह “दोहद” कही जाती हैं। वह भिन्न-भिन्न फूलों के लिए भिन्न-भिन्न तरीके से किया जाता है। अतः अशोक के लिए बाएँ चरण का प्रहार और बकुल के लिए मुखमदिरा का कथन किया गया है। किसी ने लिखा है—

स्त्रीणां स्पर्शात् प्रियङ्गुर्विकसति बकुलः सीधुगण्डूषसेकात् ।
पादाघातादशोकस्तिलककुरबकौ वीक्षणाऽऽलिङ्गनाभ्याम् ।
मन्दारो नर्मवाक्यात् पटुमृदुहसनाच्चम्पको वक्त्रवाता-
च्चूतो गीतान्नमेरुर्विकसति च पुरो नर्तनात् कर्णिकारः ॥

इसका अर्थ है—स्त्रियों के स्पर्श से प्रियङ्गु वृक्ष, गण्डूष-मद्य-सेचन से बकुल वृक्ष, पैर के प्रहार से अशोक वृक्ष, तिलक वृक्ष दृष्टि से; कुरबक आलिङ्गन से, मन्दार वृक्ष नर्मवाक्य से, सुन्दर मधुर हँसी से चम्पक वृक्ष, मुँह से गाये गीत के द्वारा नमेरु वृक्ष और समक्षनृत्य से कर्णिकार विकसित होता है।

यहाँ 'मया सह' इसलिए दिया गया है कि यक्ष भी रतिसमय में प्रिया-पादाघात से रोमाञ्चित हुआ करता था, इस बात को ध्वनित करना था महाकवि को।

अलङ्कारः—यहाँ “मया सह” इस कथन के अनुसार “विशेषोक्ति” अलङ्कार है ॥ १५ ॥

तन्मध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनी वासयष्टि-
र्मूले बद्धा मणिभिरनति-प्रौढ-वंश-प्रकाशैः ।
तालैः शिञ्जावलयसुभगैर्नर्तितः कान्तया मे
यामाध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्वः ॥१६॥

१९८ मेघदूतम्

अन्वयः—च, तन्मध्ये, अनतिप्रौढवंश-प्रकाशैः, मणिभिः, मूले, बद्धा, स्फटिकफलका, काञ्चनी, वासयष्टिः। शिञ्जावलयसुभगैः, तालैः, मे, कान्तया, नर्तितः, वः, सुहृत्, नीलकण्ठः, दिवसविगमे, याम्, अध्यास्ते।

व्याख्या—च=किंच, तन्मध्ये=रक्ताशोकबकुलमध्ये, अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः=नातिक्लिष्टवेणुकान्तिभिः, मणिभिः=रत्नैः, मूले = पादे, बद्धा=संबद्धा, स्फटिकफलका = स्फटिकमणिमय-पीठिका, काञ्चनी =हैमी, वासयष्टिः = निवासदण्डः, वर्तत इति शेषः। शिञ्जावलयसुभगैः=ध्वनिमत्कङ्कणश्रान्त्यैः, तालैः=करतलध्वनिभिः, मे = मम, कान्तया = प्रियया, नर्तितः = नृत्यङ्कारितः, वः=युष्माकम्, मेघानामित्यर्थः। सुहृत् = मित्रम्, नीलकण्ठः=मयूरः, दिवसविगमे = दिनसमाप्तौ, प्रदोष इति भावः। याम् = वासयष्टिम्, अध्यास्ते = अनुतिष्ठति ॥१६॥

शब्दार्थः—च = और भी, तन्मध्ये = उस अशोक और बकुल वृक्ष के बीच में, अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः = कोमल बाँसों की कान्ति वाले, मणिभिः = मणियों से, मूले = जड़ में, बद्धा = बँधी, स्फटिक-फलका = स्फटिक मणि की वेदिका वाली, काञ्चनी = सोने का, वासयष्टिः = निवासदण्ड (है)। शिञ्जा-वलय-सुभगैः = कङ्कणों की ध्वनियों से, सुन्दर तालैः = हाथ की तालियों से, मे = मेरी, कान्तया = प्रिया द्वारा, नर्तितः = नचाया गया, वः = तुम लोगों का, सुहृत् = मित्र, नीलकण्ठः = मोर, दिवसविगमे = संध्याकाल में, याम् = जिस निवासदण्ड पर, अध्यास्ते = बैठता है ॥ १६ ॥

भावार्थः—हे मेघ ! तयोः रक्ताशोकबकुल-वृक्षयोर्मध्ये मरकतमणिभिः बद्धामूलस्फटिकमणिमयपीठा हाटकमयी वासयष्टिर्विद्यते । सायंकाले मत्प्रियया शिञ्जितकङ्कणसुन्दरैः करतलवादनैः नर्तितो मयूरो यामधिष्ठति ॥ १६ ॥

हिन्दी—हे मेघ ! उन रक्त अशोक और बकुल वृक्ष के बीच में कोमल बाँस की प्रभा से युक्त मणियों की वेदिकावाली और स्फटिकमणिमय पीठ से युक्त सोने की वासयष्टि है। शब्दायमान कङ्कणों से कर्णप्रिय करताल बजाकर मेरी प्रिया के द्वारा नचाया गया तुम लोगों का मित्र मयूर सायङ्काल जिस पर आकर बैठता है ॥ १६ ॥

उत्तरमेघः १९९

**समासः—**तयोर्मध्ये = तन्मध्ये ( ष० तत्० ) न अतिप्रौढाः=अनतिप्रौढाः (नञ्०) अनतिप्रौढाश्च ते वंशाः=अनतिप्रौढवंशाः ( कर्म० ) अनतिप्रौढ-वंशानामिव प्रकाशो येषान्ते=अनतिप्रौढवंश-प्रकाशाः ( व्यधिकरण बहु० ) तैः । स्फटिकं फलकं यस्याः सा स्फटिकफलका (बहु०) । वासस्य यष्टिः=वास-यष्टिः ( ष० तत्० ) । शिञ्जा प्रधानानि वलयानि शिञ्जावलयानि ( मध्यम-पदलोपी० ), शिञ्जावलयैः सुभगाः = शिञ्जावलयसुभगाः ( तृ० तत्० ) तैः । दिवसस्य विगमः दिवसविगमः ( ष० तत्० ) तस्मिन् ।

**कोशः—**भूषणानान्तु शिञ्जितम्, इत्यमरः । मयूरो बर्हिणो बर्ही नीलकण्ठो भुजङ्गभुक्, इत्यमरः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः ।

टिप्पणी—प्रौढाः—"प्र" उपसर्गपूर्वक "वह" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "हो ढः" इस सूत्र से धातु के हकार को ढत्व करके "व" को सम्प्रसारण करके "सम्प्रसारणाच्च" इस सूत्र से पूर्वरूप करके प्र + ऊढ ऐसी स्थिति में "प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु" इस सूत्र से वृद्धि करके बहुवचन में "प्रौढाः" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः—"पन्ना" नामक रत्नविशेष की कान्ति हरी होती है, उसकी हरियाली कच्चे बाँस के समान होती है, क्योंकि पके बाँस की हरियाली मलिन हो जाती है, अतः कवि ने "अनतिप्रौढ" ऐसा विशेषण लगाया वंश में । बद्धा—"बन्ध्" धातु से क्त प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके "बद्धा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **वासः—**वसनं वासः = "वस्" धातु से भाव में कन् प्रत्यय करके वृद्धि करके "वास" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **शिञ्जा—**अव्यक्त अर्थ में विद्यमान "शिजि" धातु से इ की इत्संज्ञा होने के कारण "इदितो नुम्धातोः" इस सूत्र से नुम् करके परसवर्ण आदि करके "भिदिभदादिभ्योऽङ्" इस सूत्र से अङ् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके शिञ्जा ऐसा रूप निष्पन्न होता है । कहीं-कहीं "शिञ्जद्वलयसुभगैः" ऐसा पाठान्तर मिलता है, परन्तु वह पाठ अशुद्ध है । क्योंकि "लटः शतृ-शानचावप्रथमाऽसमानाधिकरणे" इस सूत्र से जो शतृ और शानच् प्रत्यय होता है वह क्रम से परस्मैपदी धातु से शतृ और आत्मनेपदी से "शानच्" प्रत्यय

२००मेघदूतम्

होता है। प्रकृत धातु अनुदात्तेत होने के कारण “अनुदात्तङित आत्मनेपदम्” इस सूत्र से आत्मनेपदसंज्ञक ही है। अतः शानच् ही होगा शतृ नहीं। यामध्यास्ते—यहाँ “अधि” उपसर्गपूर्वक “आस्” धातु के योग में “अधिशीङ्स्थाऽसां कर्म” इस सूत्र से आधार रूप “यत्” शब्द को कर्मसंज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति हुई है।

अलङ्कारः—यहाँ लोकातिशय समृद्धि का वर्णन होने के कारण “उदात्त” एवं “अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः” यहाँ “लुप्तोपमा अलङ्कार” है ।। १६ ।।

एभिः साधो ! हृदयनिहितैर्लक्षणैर्लक्षयेथा
द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शङ्खपद्मौ च दृष्ट्वा ।
क्षामच्छायं भवनमधुना मद्वियोगेन नूनं
सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम् ।।१७।।

अन्वयः—हे साधो ! हृदयनिहितैः, एभिः, लक्षणैः, द्वारोपान्ते, लिखित-वपुषौ, शङ्खपद्मौ, च, दृष्ट्वा, नूनम्, अधुना, मद्वियोगेन, क्षामच्छायम्, भवनम्, लक्षयेथाः, सूर्यापाये, कमलम्, स्वाम्, अभिख्याम्, न, पुष्यति, खलु ।। १७ ।।

व्याख्या—हे साधो ! = हे भद्र !, हृदयनिहितैः = चित्तसञ्चितैः, एभिः=पूर्वोक्तैः, लक्षणैः=चिह्नैः, द्वारोपान्ते=कपाटपार्श्वयोः लिखितवपुषौ=चित्रितशरीरौ, शङ्खपद्मौ=एतन्नामकनिधिविशेषौ, च दृष्ट्वा=अवलोक्य च, नूनम्=अवश्यम्, अधुना=इदानीम्, मद्वियोगेन=मम विरहेण, क्षामच्छायम्=कृशकान्ति, भवनम्=गृहम्, लक्षयेथाः=जानीहि। सूर्यापाये=दिनकरास्ते, कमलम्=पद्मम्, स्वकीयाम्, अभिख्याम्=कान्तिम्, न पुष्यति=न धारयति ।। १७ ।।

शब्दार्थः—हे साधो=हे सज्जन !, हृदयनिहितैः=हृदय में रखे, एभिः = इन पहले कहे गये, लक्षणैः=चिह्नों से, द्वारोपान्ते=दरवाजे के दोनों ओर,

उत्तरमेघः २०१

लिखितवपुषौ = चित्रित आकृति वाले, शङ्खपद्मौ = शङ्ख और पद्म, इन दो विधि-विशेषों को, च दृष्ट्वा = देखकर, नूनम् = अवश्य ही, अधुना = इस समय, मद्वियोगेन = मेरे प्रवास रूप वियोग से, क्षामच्छायम् = मलिन कान्तिवाले, भवनम् = (मेरे) घर को, लक्षयेथाः = जानोगे। सूर्यापाये = सूर्य के न रहने पर अर्थात् सूर्यास्त हो जाने पर, कमलम् = कमल, स्वाम् = अपनी स्वाभाविक, अभिख्याम् = शोभा को, न पुष्यति = धारण नहीं करता ।

**भावार्थः—**हे भद्र ! हृदयस्थैः पूर्वोक्तैस्तोरणादिभिर्च्चिह्नैः द्वार-पार्श्वयोरा-लिखितौ शङ्खपद्माभिधेयौ निधी चावलोक्याधुना मत्प्रवासरूप-विरहेण मलिन-शोभं मे गृहं निश्चिनु । सूर्यास्ते कमलं स्वकीयां स्वाभाविकीं शोभां न धारयति ॥ १७ ॥

**हिन्दी—**हे भद्र ! हृदय में रखे पहले कहे गये तोरण आदि चिह्नों से तथा दरवाजे के दोनों ओर चित्रित शङ्ख और पद्म नामक विधिविशेष को देखकर इस समय मेरे प्रवास रूप विरह के कारण क्षीण कान्ति वाले मेरे घर को जानोगे । सूर्य के न रहने पर कमल भी अपनी शोभा को नहीं धारण करता ॥ १७ ॥

**समासः—**हृदये निहितानि = हृदय-निहितानि ( स० तत्० ) तैः द्वयोः उपान्तः = द्वारोपान्तः (ष० तत्०) तस्मिन् । लिखिते वपुषी ययोस्तौ लिखित-वपुषौ ( बहु० ) । शङ्खश्च पद्मश्च = शङ्ख-पद्मौ ( इतरेतरद्वन्द्वः ) तौ । मम वियोगः मद्वियोगः ( ष० तत्० ) तेन । क्षामा छाया यस्य तत् क्षामच्छायम् ( बहु० ) । सूर्यस्य अपायः सूर्यापायः ( ष० तत्० ) तस्मिन् ।

**कोशः—**साधुः समर्थो निपुणो वा, इति काशिकायाम् । निधिर्ना शेवधि-र्भेदः पद्मशङ्खादयो निधेः, इत्यमरः । अभिख्या नाम शोभयोः, इत्यमरः ।

**टिप्पणी—निहितम्—**नि उपसर्गपूर्वक धारण एवं पोषण अर्थ में विद्यमान "धा" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "दधातेर्हि" इस सूत्र से धातु के स्थान में "हि" आदेश करके "निहितम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **शङ्खपद्मौ—**ये

२०२ मेघदूतम्

कुबेर के नव निधियों में से दो निधियां हैं । कुबेर के नव निधियों के नाम इस प्रकार हैं—

"महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकरकच्छपौ ।
मुकुन्द-कुन्द-नीलाश्च खर्व्वश्च निधयो नव ॥

दृष्ट्वा—दर्शनार्थक "दृश्" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके "दृष्ट्वा" ऐसा निष्पन्न होता है । वियोग:—"वि" उपसर्गपूर्वक "योगार्थक "युज्" धातु से "भाव में घञ्" प्रत्यय करके वियोगशब्द निष्पन्न होता है । क्षाम:—"क्षै" धातु से "क्त" प्रत्यय करके धातु को आत्व करके "क्षायो म:" इस सूत्र से प्रत्यय के तकार को "म" आदेश करके "क्षाम:" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । लक्षयेथा:—णिजन्त 'लक्ष्' धातु के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है ।

अलङ्कार—यहाँ "बिम्ब-प्रतिबिम्ब भावमूलक वैधर्म्य "दृष्टान्त" अलङ्कार है । यहाँ सूर्य के न रहने से कमल की शोभा का ह्रास रूप व्यतिरेक दृष्टान्त को देकर यक्ष ने अपने विरह में अपने भवन की कान्ति की क्षीणता का प्रतिपादन किया है ॥ १७ ॥

गत्वा सद्यः कलभतनुतां शीघ्रसम्पातहेतोः
क्रीडाशैले प्रथमकथिते रम्यसानौ निषण्णः ।
अर्हस्यन्तर्भवनपतितां कर्तुमल्पल्पभासं
खद्योतालीविलसितनिभां विद्युदुन्मेषदृष्टिम् ॥१८॥

अन्वयः—शीघ्र-सम्पातहेतोः, सद्यः, कलभतनुताम्, गत्वा, प्रथमकथिते, रम्यसानौ, क्रीडाशैले, निषण्णः अल्पालपभासम्, खद्यो-ताली-विलसितनिभाम्, विद्युदुन्मेषदृष्टिम्, अन्तर्भवनपतिताम्, कर्तुम्, अर्हसि ॥ १८ ॥

व्याख्या—हे मेघ ! शीघ्रसम्पात-हेतोः=त्वरितप्रवेशार्थम्, सद्यः=तत्क्षणम्, कलभतनुताम्=करिशावक-शरीरताम्, गत्वा=आसाद्य, प्रथमकथिते=पूर्वोक्ते,

उत्तरमेघः २०३

रम्यसानौ = मनोहर-शिखरे, क्रीडाशैले = केलिपर्वते, निषण्णः = उपविष्टः (सन्) अल्पाल्पभासम् = मन्द-मन्द-प्रकाशम्, खद्योताली-विलसितनिभाम् = खद्योतपङ्क्ति-स्फुरित-समाम्, विद्युदुन्मेषदृष्टिम् = तडिज्ज्योति-दृशम्, अन्तर्भवनपतिताम् = गृहमध्य-प्रविष्टाम्, कर्तुम् = सम्पादयितुम्, अर्हसि = समर्थोऽसि ॥ १८ ॥

शब्दार्थः—शीघ्रसम्पातहेतोः = शीघ्र प्रवेश के लिए, सद्यः = तत्काल, कलभतनुताम् = हाथी के बच्चे के शरीर के तरह शरीर को, गत्वा = बनाकर, प्रथमकथिते = पहले कहे गये, रम्यसानौ = सुन्दर शिखर वाले, क्रीडाशैले = क्रीडापर्वत पर, उपविष्टः (सन्) = बैठे हुए (स्थित होकर), अल्पाल्पभासाम् = मन्द-मन्द प्रकाश वाली, खद्योतालीविलसितनिभाम् = जुगुनुओं की पङ्क्ति की चमक के समान, विद्युदुन्मेष-दृष्टिम् = बिजली की चमक रूपी दृष्टि को, अन्त-र्भवनपतिताम् = बीच घर में डालने के लिए, (तुम) अर्हसि = योग्य हो (समर्थ हो) ॥ १८ ॥

भावार्थः—हे मेघ ! शीघ्र-प्रवेशार्थं करिशिशु-शरीर सदृशं स्वशरीरं कृत्वा पूर्ववर्णिते रम्य-शिखरे क्रीडा-पर्वते स्थितः सन् ज्योतिरिङ्गणस्फुरितसमां तडित्प्रकाश-रूपां दृष्टिं गृहमध्ये पातयितुं त्वं समर्थोऽसि ॥ १८ ॥

हिन्दी—हे मेघ ! शीघ्रप्रवेश के लिये, तुरंत हाथी के बच्चे के समान अपने शरीर को बनाकर पहले कहे गये सुन्दर शिखर वाले क्रीड़ापर्वत पर स्थित होकर मन्द-मन्द प्रकाश वाली, जुगुनुओं की पंक्ति की टिमटिमाहट के समान बिजली की चमक रूपी दृष्टि को घर के भीतर डालने में तुम समर्थ हो ॥ १८ ॥

समासः—शीघ्रं सम्पातः = शीघ्रसम्पातः (सुप्सुपा०) शीघ्रसम्पात एव हेतुः = शीघ्रसम्पातहेतुः (रूपक) तस्य । कलभस्येव तनुर्यस्य स कलभतनुः (व्य० बहु०) तस्य भावः कलभतनुता ताम् । प्रथमं कथितः प्रथमकथितः (सुप्सुपा) । रम्यः सानुर्यस्य सः रम्यसानुः (बहु०) तस्मिन् । क्रीडार्थं शैलः क्रीडाशैलः (मध्यमपदलोपी०) तस्मिन् । अल्पाऽल्पा भाः यस्या सा अल्पाल्प-भासा (बहु०) ताम् । खे द्योतन्ते इति खद्योताः (स० तत्०) खद्योतानाम् आली

२०४ मेघदूतम्

खद्योताली (ष० तत्०) तस्याः विलसितम् = खद्योतालीवि०सितम् (ष०तत्०) तेन सदृशी खद्योताली-विलसितनिभा (तृ० तत्०) ताम्। विद्युत् उन्मेषः विद्युदुन्मेषः (ष० तत्०) विद्युदुन्मेष एव दृष्टिः = विद्युदुन्मेषदृष्टिः (रूपक) ताम्। भवनस्य अन्तः अन्तर्भवनम् (ष० तत्०) अन्तर्भवनं पतिता = अन्तर्भवनपतिता (द्वि० तत्०) ताम्।

कोशः—सम्पातः पतने वेगे प्रवेशे वेद संविदे, इति शब्दार्णवः। कलभः करिशावकः, इत्यमरः। भाश्चविद्युत्त्विदीतयः, इत्यमरः। तडित्सौदामिनी विद्युच्चञ्चला चपला अपि, इत्यमरः। निभ-संकाशनीकाशप्रतीकाशोपमादयः, इत्यमरः।

टिप्पणी—संपातः—संपतनं संपातः = "सम्" उपसर्गपूर्वक पतनार्थक "पत्" धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "संपात" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। "सम्पातहेतोः" यहाँ "षष्ठी हेतुप्रयोगे" इस सूत्र से षष्ठी विभक्ति हुई है। गत्वा—"गम्" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके गत्वा रूप बनता है। कलभ—बत्तीस साल की उम्र के हाथी के बच्चे को "कलभ" कहते हैं। निषण्णः—नि उपसर्गपूर्वक "सद्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके नत्व षत्व णत्व आदि करके "निषण्णः" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अल्पाऽल्पभासः—यहाँ "अतिशयेन अल्पा" इस विग्रह में "प्रकारे गुणवचनस्य" इस सूत्र से "अल्प" की द्विरुक्ति हुई है। अन्तर्भवनम्—यहाँ "राजदन्तादिषु परम्" इस सूत्र से "अन्तर" इसका पूर्व निपात हुआ है।

अलङ्कारः—प्रस्तुत पद्य में "कलभतनुताम्" एवं "खद्योतालीविलसितनिभाम्" इन दोनों जगह उपमा एवं "विद्युदुन्मेषदृष्टिम्" यहाँ रूपक अलङ्कार है। तथा दोनों अलङ्कारों का अङ्गाङ्गिभाव होने के कारण "संकर" अलङ्कार है ॥ १८ ॥

तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी
मध्येक्षामा चकितहरिणी-प्रेक्षणा निम्ननाभिः।

उत्तरमेघः २०५

श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां या तत्र स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः ॥१९॥

अन्वयः—तन्वी, श्यामा, शिखरिदशना, पक्वबिम्बाधरोष्ठी, मध्येक्षामा, चकित-हरिणी-प्रेक्षणा, निम्ननाभिः, श्रोणी-भारात्, अलसगमना, स्तनाभ्याम्, स्तोकनम्रा, युवतिविषये, धातुः, आद्या, सृष्टिः, इव, या, तत्र, स्यात् ॥ १९ ॥

व्याख्या—स्वभवन-वर्णनाऽनन्तरं प्रिया स्वरूपपरिचयं ददाति श्लोकद्वयेन-(हे मेघ !) तन्वी=कृशाङ्गी, न तु स्थूला, श्यामा=तप्तकाञ्चनवर्णाभा, युवतिर्वा, शिखरिदशना = सुदती, पक्वबिम्बाधरोष्ठी = परिणतबिम्बफलोष्ठी, मध्येक्षामा=कृशोदरी, चकितहरिणीप्रेक्षणा=भयभीतकुरङ्गी-नयना अनेनाऽस्याः पद्मिनीत्वं व्यज्यते । निम्ननाभिः = गम्भीरनाभिः, श्रोणी-भारात्=नितम्बस्थौल्यात्, अलसगमना = मन्दगामिनी, स्तनाभ्याम् = कुचाभ्याम्, स्तोकनम्रा=ईषदवनता। युवतिविषये=ललितासम्बन्धे, धातुः = स्रष्टुः, ब्रह्मणः इति भावः, आद्या=प्रथमा, सृष्टिरिव=रचनेव "वर्तमानेति शेषः" तादृशी या=पूर्वोक्तगुणसम्पन्ना स्त्री, तत्र=मद्गृहे, भवेत् = स्यात्—॥ १९ ॥

शब्दार्थः—तन्वी = दुबली, श्यामा = तपाये हुए सोने के रंग की, अथवा युवती, शिखरिदशना = तीखे दांतों वाली, पक्वबिम्बाधरोष्ठी = पके हुए बिम्ब के समान अधरोष्ठवाली, मध्येक्षामा = पतली कमरवाली, चकितहरिणी-प्रेक्षणा = डरी हुई मृगी के समान ( चञ्चल ) आंखोंवाली, निम्ननाभिः = गहरी नाभिवाली; श्रोणीभारात् = नितम्ब के भार से, अलसगमना = मन्द-मन्द चलने वाली, स्तनाभ्याम् = स्तनों से, स्तोकनम्रा = कुछ-कुछ झुकी हुई, युवतिविषये = स्त्रियों के विषय में, धातुः = स्रष्टा (ब्रह्मा) की, आद्या = पहली, सृष्टिरिव = रचना की तरह, या = जो स्त्री, तत्र = वहाँ मेरे घर में, स्यात् = हो ।

भावार्थः—हे मेघ ! कृशाङ्गी, युवति, दाडिमबीजवद्दन्तशालिनी, कृशोदरी, पक्वबिम्बाधरोष्ठी, भयभीतमृगीव चपलनयना, गम्भीरनाभिः, नितम्भभारान्मन्दगामिनी, कुचभारेणेषदवनता, युवतिविषये ब्रह्मणः प्राथमिकी रचनेव या स्त्री मद्गेहे भवेत् (तां मत्पत्नीं जानीयाः) इत्यग्रतनेन श्लोकेन सम्बन्धो विद्यते ।१९।

१४ मे० दू०

२०६ मेघदूतम्

हिन्दी–हे मेघ ! दुबली युवती, तीखे दांतों वाली, पके हुए बिम्ब (कुंदरू) के समान निचले होंठ वाली, पतली कमरवाली, भयभीत मृगी के समान चञ्चल आँखों वाली, गहरी नाभि वाली, नितम्बभार से धीरे-धीरे चलने वाली, स्तनभार से (आगे की ओर) कुछ झुकी हुई-सी, स्त्रियों के विषय में ब्रह्मा की पहली रचना की तरह जो स्त्री वहाँ मेरे घर में हो (उसे मेरी पत्नी समझना, यह आगे से सम्बद्ध है)।

समासः—शिखरिणो दन्ताः यस्याः सा शिखरिदशना (बहु०) पक्वं च तद् बिम्बं पक्वबिम्बम् (क० धा०)। अधरञ्चासौ ओष्ठश्च अधरोष्ठः (कर्म०) पक्वबिम्बमिव अधरोष्ठो यस्याः सा पक्वबिम्बाधरोष्ठी (बहु०)। मध्येक्षामः यस्याः सा मध्येक्षामा (व्य० बहु०)। चकिता चासौ हरिणी चकितहरिणी (कृ० धा०) चकितहरिण्या इव प्रेक्षणं यस्याः सा चकितहरिणीप्रेक्षणा (व्यधि० बहु०)। निम्ना नाभिर्यस्याः सा निम्ननाभिः (बहु०)। श्रोण्याः भारः = श्रोणीभारः (ष० तत्०)। अलसं गमनं यस्याः सा अलसगमना (बहु०)। स्तोकं नम्रा = स्तोकनम्रा (सुप्सुपा०)। युवतयः विषयः युवतिविषयः (रूपक०) तस्मिन्।

कोशः—श्लक्ष्णं वध्रं कृशं तनु, इत्यमरः। श्यामा यौवनमध्यस्था, इत्युत्पलमाला। "शीते सुखोष्णा सर्वाङ्गी ग्रीष्मे या सुखशीतला। तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते॥" इत्याहुः भट्टिकाव्यस्य टीकाकृतः। शिखरं शैलवृक्षाग्रकक्षापुलककोटिषु, इति विश्वः।

टिप्पणी—तन्वी "तनु" यह दौर्बल्यरूप गुण का वाचक शब्द है—अतः "वोतो गुणवचनात्" इस सूत्र से ङीष हुआ है। श्यामा—इस स्त्री की विशेषता होती है कि गर्मी के महीनों में इनके शरीर शीतल और ठंडे समय में उष्ण हो जाते हैं। जैसा कि कहा भी गया है—

कूपोदकं वटच्छाया श्यामा नारीष्टिकागृहम्।
शीतकाले भवेदुष्णं उष्णकाले च शीतलम्॥

उत्तरमेघः २०७

अर्थात् कुएँ का जल, वट (बरगद) की छाया, श्यामा स्त्री और ईंटे का घर; ये सब ठंढे समय में गर्म और गर्म समय में ठंढे हो जाते हैं । शिखरिदशनाः- अभिधान-चिन्तामणिकार 'शिखर' शब्द का अर्थ पके हुए दाडिम का बीज करते हैं । वे कहते हैं—'पक्वदाडिमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः' पक्व-बिम्बाधरोष्ठी—यहाँ अधरोष्ठ में अधरश्चासौ ओष्ठश्च इसतरह कर्मधारय समास हो जाने पर प्राप्त वृद्धि को रोककर 'ओत्वोष्ठयोः समासे वा' इस सूत्र से ( अधर + ओष्ठ ) यहाँ विकल्प से पररूप हुआ है । एवं पक्व बिम्ब के साथ पुनः समास होने के पश्चात् 'नासिकोदरोष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च' इस सूत्र से विकल्प से 'ङीष्' हुआ है तब 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' रूप बना है, 'बिम्ब' कुंदरू फल को कहते हैं । यह लाल रंग का होता है, अतः यहाँ उसे उपमानरूप में ग्रहण किया गया है । मध्येक्षामा—यहाँ 'मध्य' शब्द से आयी सप्तमी-विभक्ति का समास होने पर भी 'अमूर्धमस्तकात् स्वाङ्गादकामे' इस सूत्र से अलुक हो गया है । आद्या = आदौ भवा आद्या = 'आदि' शब्द से 'दिगादिभ्यो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् हो गया है ।

अलङ्कारः—यहाँ 'अधर' एवं 'ओष्ठ' इन दो पर्यायवाची शब्दों की आवृत्ति होने से 'पुनरुक्तवदाभास' 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' यहाँ लुप्तोपमा, 'चकित-हरिणी-प्रेक्षणा' यहाँ पर भी लुप्तोपमा और 'सृष्टिराद्येव' इस जगह 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार है । परञ्च इन सब अलङ्कारों की परस्पर निरपेक्षता होने से संसृष्टि अलङ्कार है ।। १९ ।।

तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं मे द्वितीयं ** दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् ।** गाढोत्कण्ठां गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालां ** जातां मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम् ॥२०॥**

अन्वयः—सहचरे, मयि, दूरीभूते, चक्रवाकीम्, इव, परिमितकथाम्, एकाम्, ताम्, मे, द्वितीयम्, जीवितम्, जानीथाः । गाढोत्कण्ठाम्, बालाम्, गुरुषु, एषु, दिवसेषु, गच्छत्सु, शिशिरमथिताम्, पद्मिनीम्, वा, अन्यरूपाम्, जाताम्, मन्ये ।

२०८ मेघदूतम्

व्याख्या—(हे मेघ !) सहचरे=सहगामिनि, मयि=पत्यौ, यक्षे, दूरी- भूते=दूरङ्गते सति, चक्रवाकीमिव = चक्रवाक प्रियामिव, परिमितकथाम् = अत्यल्पभाषिणीम्, एकाम् = एकाकिनीम्, ताम् = पूर्ववर्णितां मत्प्रियाम्, मे = यक्षस्य, द्वितीयम् = अन्यम्, अपरमित्यर्थः, जीवितम् = जीवनम्, जानीथाः = अवगच्छेः । एतेन तस्यां मृतौ मद्जीवननाशोऽवश्यम्भावीति व्यज्यते । गाढो- त्कण्ठाम् = अत्युत्सुक्याम्, बालाम् = नवोढाम् अष्टदशहायनामित्यर्थः । गुरुषु = दीर्घेषु, एषु=वर्तमानेषु, दिवसेषु=शापदिनेषु, गच्छत्सु = यातेषु सत्सु, शिशिर- मथिताम् = तुषारपीडिताम्, पद्मिनीम् = कमलिनीम्, वा = यथा, अन्यरूपाम् = अपराकृतिम्, जाताम् = भूताम्, मन्ये = संभावयामि, हिमविकृतरूपा सा विर- हिणी अन्यरूपा भविष्यति इति तर्कयामि इति भावः ॥ २० ॥

शब्दार्थः—(हे मेघ !) सहचरे = साथी, मयि = मेरे, दूरीभूते = दूर होने पर, चक्रवाकीमिव = चकई के समान, परिमितकथाम् = बहुत कम बोलनेवाली, एकाम् = अकेली, ताम् = उस तन्वी आदि श्लोक से वर्णिता मेरी प्रिया को, मे = मेरा, द्वितीयम् = दूसरा, जीवितम् = जीवन ( प्राण ), जानीथाः = समझना । गाढोत्कण्ठाम् = (मेरे विषय में) अत्यधिक उत्सुक, बालाम् = (अट्ठारह वर्ष की) नवोढा को, गुरुषु = लम्बे दुर्वह, एषु = इन, दिवसेषु = शाप के दिनों में, गच्छत्सु = बीतने पर, शिशिरमथिताम् = हिम से पीडित, पद्मिनीम् = कमलिनी के, वा = समान, अन्यरूपाम् = किसी दूसरे ही रूप को, जाताम् = प्राप्त, अर्थात् कुछ की कुछ बन गयी होगी ऐसा, मन्ये = सोचता हूँ ॥ २० ॥

भावार्थः—हे मेघ ! सहगामिनि मयि दूरस्थिते सति सहवियुक्तां चक्रवा- कीमिव अल्पवाचामेकाकिनीं तां पूर्वप्रकारेण वर्णितां मत्प्रियां मेऽपरं जीवनं जानीथाः । मद्विषये अत्युत्सुकां नवोढामष्टादशवर्षीयां (अहम्) एषु दुर्वहेषु शाप- दिवसेषु गच्छत्सु तुषारपीडितां कमलिनीमिवान्‍यरूपां तर्कयामि ॥ २० ॥

हिन्दी—( हे मेघ ! ) मुझ साथी के दूर हो जाने पर चकई के समान कम बोलने वाली अकेली उस पूर्ववर्णिता स्त्री को मेरा दूसरा जीवन ( प्राण ) समझना अर्थात् मेरी प्रिया समझना । शाप के इन दुर्वह दिनों के बीतने पर

उत्तरमेघः २०९

(मैं तो) उस नवोढा को पाले की मारी कमलिनी की तरह कुछ की कुछ हो गयी होगी, ऐसा अनुमान (सोच रहा) कर रहा हूँ।

समासः— परिमिता कथा यस्याः सा परिमितकथा ताम् (बहु०) गाढा उत्कण्ठा यस्याः सा गाढोत्कण्ठा (बहु०) ताम्। शिशिरेण मथिता शिशिरमथिता (तृ० तत्०) ताम्। अन्यं रूपं यस्याः सा अन्यरूपा (बहु०) ताम्।

कोशः— इव वद् वा यथा शब्दाः, इति दण्डी। उपमायां विकल्पे वा, इत्यमरः। गाढ-वाढ-दृढानि च, इत्यमरः। हेमन्तः शिशिरोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः। उत्कण्ठोत्कलिकेलिके समे, इत्यमरः।

टिप्पणी— सहचरे— सहचरतीति इस विग्रह में 'सह' उपपदपूर्वक चर् धातु से अच् प्रत्यय करके 'सहचर' ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। दूरीभूते— अदूरं दूरं यथा सम्पाद्येत इस विग्रह में 'दूर' उपपदक 'भू' धातु से क्त प्रत्यय करके एवं 'दूर' शब्द से 'च्वि' प्रत्यय करके 'च्वौ च' इस सूत्र से दीर्घ होकर 'दूरीभूत' शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। चक्रवाकी— चक्रवाकत्वजातिविशिष्टा स्त्री इस विग्रह में 'चक्रवाक' शब्द से 'जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्' इस सूत्र से 'ङीष्' प्रत्यय होकर चक्रवाकी बनता है। कविप्रसिद्धि है कि चक्रवाक और चक्रवाकी रात में वियुक्त हो जाते हैं, यहाँ तक कि यदि इन्हें एक पिंजरे में भी बन्द कर दिया जाय तो ये आपस में दोनों दो तरफ मुँह करके रात व्यतीत करते हैं। इस उक्ति में सत्यता कहाँ तक है यह भगवान् ही जाने।

इस वियोग के सम्बन्ध में एक लोककथा भी सुनी जाती है कि 'सीताहरण' के पश्चात् रामचन्द्रजी ने सीताजी की खोज और उनका पता वन-लताओं से पूछते हुए एक चक्रवाक दम्पति से भी पूछा पर उन दोनों ने इनका उपहास करते हुए नकारात्मक उत्तर दिया, इस पर दुःखित होकर रामचन्द्रजी ने शाप दे दिया कि 'तुम चक्रवाक-दम्पतियों का प्रति-रात वियोग हुआ करे' और तभी से ये दोनों रात में नहीं मिलते हैं।

२१० | मेघदूतम्

कथा—कथनं कथा वाक्य-प्रबन्ध अर्थ में विद्यमान 'कथ' धातु से भाव में 'चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च' इस सूत्र से अङ् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में 'टाप्' करके 'कथा' शब्द निष्पन्न होता है। द्वितीयम्—'द्विः' शब्द से पूरण अर्थ में 'द्वेस्तीयः' इस सूत्र से 'तीय' प्रत्यय करके 'द्वितीयः' ऐसा बनाया जाता है। यह नपुंसकलिङ्ग का रूप है। जीवितम्—प्राणधारण अर्थ में 'जीव' धातु से भाव में 'नपुंसके भावे क्तः' 'जीवितम्' रूप निष्पन्न होता है। उत्कण्ठा—यद्यपि 'उत्कण्ठा' का प्रसिद्ध अर्थ 'औत्सुक्य' है, परन्तु महामहो० मल्लिनाथजी ने "रागे त्वलब्धविषये वेदना महती तु या । संशोषणी तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधाः ॥' इस कोश का उद्धरण देकर उसका अर्थ 'विरहवेदना' किया है। बालाम्—यहाँ 'बाला' शब्द का अर्थ अविवाहित कुमारी नहीं समझना चाहिए प्रत्युत १८ वर्ष की 'किशोरी' ऐसा समझना चाहिए।

महाकवि का इस श्लोक का मूल आधार वाल्मीकिरामायण के अशोक-वाटिकास्थित सीता के वर्णन प्रसंग में कहा गया श्लोक ही जान पड़ता है—

हिम-हतनलिनीव नष्टशोभा, व्यसनपरम्परया निपीड्यमाना ।
सहचर-रहितेव चक्रवाकी, जनकसुता-कृपणीं दशां ददर्श ॥
( सुन्दर०, १६।४० )

अलङ्कारः—प्रस्तुतः पद्य में यक्षपत्नी का एवं यक्ष ( जीवित ) का अभेद कथन भेद रहने पर भी किया गया है, अतः भेद में अभेद अध्यवसायमूलक 'अतिशयोक्ति', 'दूरीभूते......चक्रवाकीमिवैकाम्' यहाँ पूर्णोपमा एवं 'पद्मिनी-वान्यरूपाम्' यहाँ भी उपमा है और तीनों निरपेक्ष भाव से हैं अतः 'संसृष्टि' अलङ्कार है ॥ २० ॥

नूनं तस्याः प्रबलरुदितोच्छूननेत्रं प्रियाया
निःश्वासानामशिशिरतया भिन्नवर्णाधरोष्ठम् ।

उत्तरमेघः २११

हस्तन्यस्तं मुखमसकलव्यक्ति लम्बालकत्वा- दिन्दोर्दैन्यं त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तेर्विभर्ति ॥ २१ ॥

अन्वयः—प्रबलरुदितोच्छूननेत्रम्, निःश्वासानाम्, अशिशिरतया, भिन्न-वर्णाधरोष्ठम्, हस्तन्यस्तम्, लम्बालकत्वात्, असकलव्यक्ति, तस्याः, मुखम्, त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तेः, इन्दोः, दैन्यम्, बिभर्ति, नूनम् ॥ २१ ॥

व्याख्या—प्रबलरुदितोच्छूननेत्रम् = अत्यधिकरुदितोच्छ्वसितनयनम्, निःश्वासानाम् = वदनश्वासप्रश्वासानाम्, अशिशिरतया = उष्णतया, भिन्नवर्णाधरोष्ठम् = विच्छायमघरोष्ठम्, हस्तन्यस्तम् = हस्तस्थापितम्, लम्बालकत्वात् = दीर्घस्रस्तचूर्णकुन्तलत्वात्, असकलव्यक्ति = असम्पूर्णाभिव्यक्ति, तस्याः = मत्प्रियायाः, मुखम् = वदनम्, त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तेः = मेघानुगमनक्षीणद्युतेः, इन्दोः = चन्द्रमसः, दैन्यम् = दीनताम्, बिभर्ति = धारयति; नूनम् = निश्चयेनेति भावः ॥ २१ ॥

शब्दार्थः—प्रबलरुदितोच्छूननेत्रम् = बहुत रोने से सूजे हुए नेत्रों वाला, निःश्वासानाम् = निश्वासों के, अशिशिरतया = गरम होने के कारण, भिन्नवर्णाधरोष्ठम् = जिसके निचले होंठ का रंग फीका पड़ गया है (ऐसा), हस्तन्यस्तम् = हथेली पर रखा हुआ, लम्बालकत्वात् = लटकते हुए बालों के कारण, असकलव्यक्ति = असम्पूर्ण रूप से दिखाई देने वाला, तस्याः = उस मेरी प्रिया का, 'मुखम् = मुख, त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तेः = तेरा अनुगमन करने के कारण फीकी पड़ी कान्तिवाले, इन्दोः = चन्द्रमा के, दैन्यम् = दैन्यभाव को, बिभर्ति = धारण करता है, नूनम् = निश्चय ही, ॥ २१ ॥

भावार्थः—हे मेघ ! अधुना मद्वियोगेन अत्यधिक-रोदनादुच्छ्वसितनेत्रमुष्णनिःश्वासैर्विवर्णाधरोष्ठं करतलस्थापितं लम्बायमानैरलकैरसम्पूर्णाभिव्यक्तं मत्प्रियामुखं त्वदनुसरणात्कान्तिहीनस्य हिमांशोः दीनभावं धारयति नूनम् ॥ २१ ॥

२१२ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! अत्यधिक रोने के कारण सूजी हुई आंखों वाला, निःश्वासों के गरम-गरम होने के कारण विवर्ण ओष्ठ वाला, हथेली पर रखे हुए लटकते हुए लटों के कारण सम्पूर्ण रूप से दिखाई नहीं देने वाला उस मेरी प्रिया का मुख तुम्हारे आवरण के कारण मलिनकान्ति वाले चन्द्रमा के दीन-भाव को निश्चय ही धारण करता होगा ॥ २१ ॥

समास:—प्रकृष्टं बलं यस्मिंस्तत् प्रबलम् ( बहु० )। प्रबलं च तद् रुदितम् = प्रवलरुदितम् ( कर्म० )। उच्छूने नेत्रे यस्य तत् = उच्छूननेत्रम्, प्रबलरुदितेन उच्छूननेत्रम् = प्रबलरुदितोच्छूननेत्रम् ( तृ० तत्० )। न शिशिरता = अशिशिरता ( नञ्० ) तया। भिन्नो वर्णो यस्य सः भिन्नवर्णः (बहु०) अधरश्चासौ ओष्ठः = अधरोष्ठः (कर्म०) भिन्नवर्णः अधरोष्ठो यस्य तत् = भिन्नवर्णाधरोष्ठम् (बहु०), न सकला = असकला ( नञ्० ) असकला व्यक्तिः यस्य तत् असकलव्यक्ति ( बहु० )। तव अनुसरणम् = त्वदनुसरणं ( ष० तत्० )। क्लिष्टा कान्तिर्यस्य सः क्लिष्टकान्तिः ( बहु० ) त्वदनुसरणेन क्लिष्टकान्तिः = त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तिः ( तृ० तत्० ) तस्य ।

कोश:—नूनं तर्केऽथ निश्चये, इत्यमरः ।

टिप्पणीरुदितम्—रोदनमेव रुदितम् = रुद् धातु से भाव में क्त प्रत्यय करके ‘रुदितम्’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उच्छून—‘उच्छून’ शब्द की निष्पत्ति के विषय में महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने ‘उद्’ उपसर्गपूर्वक ‘टुओश्वि’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ‘च्छ्वोः शूडनुनासिके च’ से ‘ऊठ्’ आगम करके ‘उच्छून’ शब्द निष्पन्न किया है, परन्तु यह प्रक्रिया प्रामादिकी है; क्योंकि ‘श्वि’ धातु के अन्त में ‘इ’कार है न कि वकार है अतः इस प्रक्रिया को छोड़कर यदि ‘उद् + श्वि + क्त’ ऐसी स्थिति में धातु के यजादि-गणपठित होने के कारण ‘वचिस्वपियजादीनां किति’ इस सूत्र से ‘व’ को ‘उ’कार सम्प्रसारण करके ‘सम्प्रसारणाच्च’ इस सूत्र से पूर्वरूप करके ‘श्वीदितो निष्ठायाम्’ इस सूत्र से इडागम का निषेध करके ‘हलः’ इस सूत्र से सम्प्रसारणरूप से आये हुए ‘उ’कार को दीर्घ करके ‘ओदितश्च’

उत्तरमेघः २१३

इस सूत्र से निष्ठा के ‘त’कार को ‘न’कार आदेश करके, छत्वादि करके ‘उच्छून’ ऐसा रूप निष्पन्न किया जाय तो प्रक्रिया शुद्ध होगी। अशिशिरता— शिशिरस्य भावः इस विग्रह में ‘तस्य भावस्त्वतलौ’ इस सूत्र से तल् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके ‘शिशिरता’ रूप निष्पन्न होता है, न शिशिरता अशिशिरता यहाँ हेतु में तृतीया विभक्ति है। नञ् का अर्थ यहाँ विरोध में विवक्षित है। असकलव्यक्ति— यक्ष-पत्नी के मुँह पर सदा लटें लटकती रहती थीं अतः उसके मुँह की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती थी। इससे यह अनुमानित होता है कि वह केशों को नहीं सँवारती थी। केश का न सँवारना उसके लिए उचित भी था, क्योंकि वह प्रोषितभर्तृका थी। जिसका पति परदेश में हो उसे प्रोषितभर्तृका कहते हैं। एवं धर्मशास्त्र में प्रोषितभर्तृका के लिए शरीर को सँवारने का निषेध किया गया है। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्मृति में लिखते हैं—

क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषितभर्तृका ॥

इसका अभिप्राय यह है कि सती-साध्वी प्रोषितभर्तृका क्रीड़ा, शरीर-संस्कार (शरीर को सँवारना), समूह में जाना, उत्सव देखना, हास्य (मजाक) करना, दूसरे के घर में जाना—इन सबों का परित्याग कर दे।

अलङ्कारः— प्रस्तुत पद्य के ‘भिन्न-वर्णाऽधरोष्ठम्’ इस पद में पौनरुक्त्य प्रतीति होने के कारण ‘पुनरुक्तवदाभास’ अलङ्कार है। एवं प्रिया का मुँह चन्द्रमा के दीन भाव को धारण कैसे कर सकता है? इस शङ्का का समाधान ‘बिम्बप्रतिबिम्बभाव’ की कल्पना के द्वारा करने से ‘निदर्शना’ अलङ्कार है।

इन दोनों अलङ्कारों के परस्पर निरपेक्ष भाव से रहने के कारण ‘संसृष्टि’ अलङ्कार है ॥ २१ ॥

आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा
मत्साहृश्यं विरहतनु वा भावगम्यं लिखन्ती ।

२१४ | मेघदूतम्

पृच्छन्ती वा मधुरवचनां सारिकां पञ्जरस्थां
कच्चिद्भर्तुः स्मरसि रसिके ! त्वं हि तस्य प्रियेति ॥

अन्वयः—सा, बलिव्याकुला, वा, विरहतनु, भावगम्यं, मत्सादृश्यम्, लिखन्ती, वा, मधुरवचनाम्, पञ्जरस्थाम्, सारिकाम्, 'हे रसिके ! भर्तुः, स्मरसि, कच्चित् ? हि, त्वं, तस्य, प्रिया,' इति, पृच्छन्ती, वा, ते, आलोके, पुरा, निपतति ॥ २२ ॥

व्याख्या—सा = मत्प्रिया, बलिव्याकुला = नित्यनैमित्तिक-देवपूजन-तत्परा, वा = अथवा, विरहतनु = वियोगक्षीणम्, भावगम्यम् = सम्भावनानुमेयम्, मत्सादृश्यम् = मदाकृत्यनुरूपम्, लिखन्ती = चित्रयन्ती, वा = अथवा, मधुरवचनाम् = मधुरभाषिणीम्, पञ्जरस्थाम् = पिञ्जरबद्धाम्, सारिकाम् = शुकप्रियाम्, 'हे रसिके ! = हे विदग्धे ! भर्तुः = स्वामिनः, स्मरसि = चिन्तयसि, कच्चित् = किम् ? हि = यतः, त्वम् = सारिका, तस्य = स्वामिनः, प्रिया = अभीष्टा,' इति = इत्थम्, पृच्छन्ती = जिज्ञासन्ती, प्रश्नं कुर्वतीत्यर्थः, वा = अथवा, ते = मेघस्य, आलोके = दृष्टिमार्गे, पुरा = सद्यः, निपतति = आगमिष्यति; इति भावः ॥ २२ ॥

शब्दार्थः—सा = वह मेरी प्रिया, बलिव्याकुला = नित्यनैमित्तिक देवपूजा में संलग्न, वा = अथवा, विरहतनु = वियोग के कारण कृश, भावगम्यम् = अनुमान से जानी जाने वाली, मत्सादृश्यम् = मेरी आकृति ( चित्र ) को, लिखन्ती = लिखती हुई, वा = या, 'रसिके ! = हे रसीली ! भर्तुः = स्वामी को, स्मरसि = स्मरण करती हो, कच्चित् = क्या ? हि = क्योंकि, त्वम् = तुम, तस्य = उनकी, प्रिया = प्यारी थी,' इति = इस प्रकार, मधुरवचनाम् = मधुर बोलने वाली, पञ्जरस्थाम् = पिंजरे में रहने वाली, सारिकाम् = मैना को, पृच्छन्ती = पूछती हुई, वा = अथवा, ते = तुम्हारे, आलोके = दृष्टि-पथ पर, पुरा = सद्यः, निपतति = आयेगी ॥ २२ ॥

भावार्थः—हे मेघ ! सा मत्प्रिया नित्यनैमित्तिक-देवपूजायां संलग्ना वा विश्लेषकृशामनुमेयां मत्प्रतिकृतिं चित्रयन्ती वा, 'हे रसिके ! स्वामिनं स्मरसि,

उत्तरमेघः २१५

किम् ? यतो हि त्वं तस्य प्रिया' इति पञ्जरस्थां मधुरभाषिणीं सारिकां पृच्छन्ती वा सद्यस्तव दृष्टिपथे आगमिष्यति ॥ २२ ॥

**हिन्दी—**हे मेघ ! वह मेरी प्रिया नित्य-नैमित्तिक देवपूजा में संलग्न या वियोग से दुर्बल तथा अनुमान से जानने योग्य मेरे चित्र को लिखती हुई अथवा मधुरभाषिणी पिंजड़े में बँधी हुई मैना को 'हे रसीली ! स्वामी का स्मरण करती हो क्या ? क्योंकि तुम उनकी प्यारी हो' इस प्रकार से पूछती हुई सद्यः तुम्हारे दृष्टि-पथ पर आयेगी ॥ २२ ॥

**समासः—**बलिषु व्याकुला=बलिव्याकुला ( स० तत्० ) । विरहेण तनु तत् विरहतनु ( तृ० तत्० ) । भावेन गम्यं भावगम्यं तत् (तृ० तत्०) । मधुरं वचनं यस्याः सा मधुरवचना ( बहु० ) ताम् ।

**कोशः—**कच्चित् काम-प्रवेदने, इत्यमरः । उपमायां विकल्पे वा, इत्यमरः। स्यात्प्रबन्धे पुरातीते निकटआगामिके पुरा, इत्यमरः । आलोको दर्शनद्योतौ, इत्यमरः ॥ २२ ॥

**टिप्पणी—**गम्यम्—गन्तुं योग्यं गम्यम् = 'गम्' धातु से यत् प्रत्यय करके 'गम्यम्' ऐसा रूप सिद्ध होता है । लिखन्ती—'लिख्' धातु से वर्तमान काल में लट् के स्थान पर शतृ आदेश करके नुम् करके स्त्रीत्वविवक्षा में ङीष् करके 'लिखन्ती' रूप निष्पन्न होता है । यहाँ 'लिखन्ती' इस शब्द के प्रयोग से यह ध्वनित होता है कि वह यक्षप्रिया बारंबार यक्ष का चित्र बनाती थी परन्तु अश्रुपात आदि से वह चित्र मिट-मिट जाता था, वह पुनः उसे चित्रित करती थी । पञ्जरस्थाम्—उपपद समास करके 'पञ्जर' उपपदक 'स्था' धातु से 'सुपि स्थः' से 'क' प्रत्यय करके ह्रस्व करके स्त्रीत्वविवक्षा से टाप् करके द्वितीया विभक्ति में 'पञ्जरस्थाम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । रसिके—रसोऽस्ति यस्याः इस विग्रह में 'रस' शब्द से 'अत इनि ठनौ' इस सूत्र से 'ठन्' प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'ठस्येकः' इस सूत्र से 'इक' आदेश करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके 'रसिका' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । इसी शब्द के सम्बोधन में 'रसिके ! ऐसा रूप निष्पन्न होता है । कहीं-कहीं रसिके ! के

२१६ मेघदूतम्

स्थान पर 'सुभगे' ऐसा पाठ मिलता है। भर्तुः—बिभर्ति इति 'भर्ता'। 'भृ' धातु से कर्ता में 'तृच्' प्रत्यय करके 'भर्ता' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उक्त रूप षष्ठी विभक्ति का है। यह षष्ठी 'अधीगर्थ-दयेशां कर्मणि' इस सूत्र से 'स्मृ' धातु के योग रहने के कारण कर्म में हुई। प्रिया—प्रीणाति इति इस विग्रह में प्री धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय करके इय आदेश करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके 'प्रिया' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। आलोके—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'लोक्' धातु से भाव में 'घञ्' प्रत्यय करके सप्तमी विभक्ति में 'आलोके' ऐसा रूप निष्पन्न होता है।

अलङ्कारः—इस श्लोक में तुल्य बल वाले पदार्थों का विरोध चातुर्यपूर्ण ढंग से प्रदर्शित होने के कारण 'विकल्प' अलङ्कार है ॥ २२ ॥

उत्सङ्गे वा मलिनवसने सौम्य ! निक्षिप्य वीणां मद्गोत्राङ्कं विरचितपदं गेयमुद्गातुकामा । तन्त्रीमार्द्रां नयनसलिलैः सारयित्वा कथंचिद् भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां विस्मरन्ती ॥२३॥

अन्वयः—हे सौम्य ! मलिनवसने, उत्सङ्गे, वीणाम्, निक्षिप्य, मद्गोत्राङ्कम्, विरचितपदम्, गेयम्, उद्गातुकामा, नयनसलिलैः, आद्राम्, तन्त्रीम्, कथञ्चित्, सारयित्वा, भूयो भूयः, स्वयम्, कृताम्, अपि, मूर्च्छनाम्, विस्मरन्ती, वा, (सा ते आलोके, पुरा निपतति) ।

व्याख्या—हे सौम्य ! हे भद्र ! मलिनवसने = मलीमसाम्बरे, उत्सङ्गे = क्रोडे, वीणाम् = वल्लकीम्, निक्षिप्य = स्थापयित्वा, मद्गोत्राङ्कम् = मदभिधेयान्वितम्, यथास्यात्तथा, विरचितपदम् = रचितगीतम्, गेयम् = गातुं योग्यम्; उद्गातुकामा = उच्चैर्गातुमभिलषन्ती, नयनसलिलैः = नेत्राम्बुभिः, अश्रुभिरित्यर्थः । आर्द्रां = क्लिन्नाम्, तन्त्रीम् = वीणागुणम्, कथञ्चित् = येन केनापि प्रकारेण कष्टेनेत्यर्थः, सारयित्वा = करेण सम्मृश्य, भूयो भूयः = पुनः पुनः;