मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२१० | मेघदूतम्
कथा—कथनं कथा वाक्य-प्रबन्ध अर्थ में विद्यमान 'कथ' धातु से भाव में 'चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च' इस सूत्र से अङ् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में 'टाप्' करके 'कथा' शब्द निष्पन्न होता है। द्वितीयम्—'द्विः' शब्द से पूरण अर्थ में 'द्वेस्तीयः' इस सूत्र से 'तीय' प्रत्यय करके 'द्वितीयः' ऐसा बनाया जाता है। यह नपुंसकलिङ्ग का रूप है। जीवितम्—प्राणधारण अर्थ में 'जीव' धातु से भाव में 'नपुंसके भावे क्तः' 'जीवितम्' रूप निष्पन्न होता है। उत्कण्ठा—यद्यपि 'उत्कण्ठा' का प्रसिद्ध अर्थ 'औत्सुक्य' है, परन्तु महामहो० मल्लिनाथजी ने "रागे त्वलब्धविषये वेदना महती तु या । संशोषणी तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधाः ॥' इस कोश का उद्धरण देकर उसका अर्थ 'विरहवेदना' किया है। बालाम्—यहाँ 'बाला' शब्द का अर्थ अविवाहित कुमारी नहीं समझना चाहिए प्रत्युत १८ वर्ष की 'किशोरी' ऐसा समझना चाहिए।
महाकवि का इस श्लोक का मूल आधार वाल्मीकिरामायण के अशोक-वाटिकास्थित सीता के वर्णन प्रसंग में कहा गया श्लोक ही जान पड़ता है—
हिम-हतनलिनीव नष्टशोभा, व्यसनपरम्परया निपीड्यमाना ।
सहचर-रहितेव चक्रवाकी, जनकसुता-कृपणीं दशां ददर्श ॥
( सुन्दर०, १६।४० )
अलङ्कारः—प्रस्तुतः पद्य में यक्षपत्नी का एवं यक्ष ( जीवित ) का अभेद कथन भेद रहने पर भी किया गया है, अतः भेद में अभेद अध्यवसायमूलक 'अतिशयोक्ति', 'दूरीभूते......चक्रवाकीमिवैकाम्' यहाँ पूर्णोपमा एवं 'पद्मिनी-वान्यरूपाम्' यहाँ भी उपमा है और तीनों निरपेक्ष भाव से हैं अतः 'संसृष्टि' अलङ्कार है ॥ २० ॥
नूनं तस्याः प्रबलरुदितोच्छूननेत्रं प्रियाया
निःश्वासानामशिशिरतया भिन्नवर्णाधरोष्ठम् ।