भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २०९

(मैं तो) उस नवोढा को पाले की मारी कमलिनी की तरह कुछ की कुछ हो गयी होगी, ऐसा अनुमान (सोच रहा) कर रहा हूँ।

समासः— परिमिता कथा यस्याः सा परिमितकथा ताम् (बहु०) गाढा उत्कण्ठा यस्याः सा गाढोत्कण्ठा (बहु०) ताम्। शिशिरेण मथिता शिशिरमथिता (तृ० तत्०) ताम्। अन्यं रूपं यस्याः सा अन्यरूपा (बहु०) ताम्।

कोशः— इव वद् वा यथा शब्दाः, इति दण्डी। उपमायां विकल्पे वा, इत्यमरः। गाढ-वाढ-दृढानि च, इत्यमरः। हेमन्तः शिशिरोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः। उत्कण्ठोत्कलिकेलिके समे, इत्यमरः।

टिप्पणी— सहचरे— सहचरतीति इस विग्रह में 'सह' उपपदपूर्वक चर् धातु से अच् प्रत्यय करके 'सहचर' ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। दूरीभूते— अदूरं दूरं यथा सम्पाद्येत इस विग्रह में 'दूर' उपपदक 'भू' धातु से क्त प्रत्यय करके एवं 'दूर' शब्द से 'च्वि' प्रत्यय करके 'च्वौ च' इस सूत्र से दीर्घ होकर 'दूरीभूत' शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। चक्रवाकी— चक्रवाकत्वजातिविशिष्टा स्त्री इस विग्रह में 'चक्रवाक' शब्द से 'जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्' इस सूत्र से 'ङीष्' प्रत्यय होकर चक्रवाकी बनता है। कविप्रसिद्धि है कि चक्रवाक और चक्रवाकी रात में वियुक्त हो जाते हैं, यहाँ तक कि यदि इन्हें एक पिंजरे में भी बन्द कर दिया जाय तो ये आपस में दोनों दो तरफ मुँह करके रात व्यतीत करते हैं। इस उक्ति में सत्यता कहाँ तक है यह भगवान् ही जाने।

इस वियोग के सम्बन्ध में एक लोककथा भी सुनी जाती है कि 'सीताहरण' के पश्चात् रामचन्द्रजी ने सीताजी की खोज और उनका पता वन-लताओं से पूछते हुए एक चक्रवाक दम्पति से भी पूछा पर उन दोनों ने इनका उपहास करते हुए नकारात्मक उत्तर दिया, इस पर दुःखित होकर रामचन्द्रजी ने शाप दे दिया कि 'तुम चक्रवाक-दम्पतियों का प्रति-रात वियोग हुआ करे' और तभी से ये दोनों रात में नहीं मिलते हैं।