भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 335 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 253

२१२ मेघदूतम्

हिन्दी—हे मेघ ! अत्यधिक रोने के कारण सूजी हुई आंखों वाला, निःश्वासों के गरम-गरम होने के कारण विवर्ण ओष्ठ वाला, हथेली पर रखे हुए लटकते हुए लटों के कारण सम्पूर्ण रूप से दिखाई नहीं देने वाला उस मेरी प्रिया का मुख तुम्हारे आवरण के कारण मलिनकान्ति वाले चन्द्रमा के दीन-भाव को निश्चय ही धारण करता होगा ॥ २१ ॥

समास:—प्रकृष्टं बलं यस्मिंस्तत् प्रबलम् ( बहु० )। प्रबलं च तद् रुदितम् = प्रवलरुदितम् ( कर्म० )। उच्छूने नेत्रे यस्य तत् = उच्छूननेत्रम्, प्रबलरुदितेन उच्छूननेत्रम् = प्रबलरुदितोच्छूननेत्रम् ( तृ० तत्० )। न शिशिरता = अशिशिरता ( नञ्० ) तया। भिन्नो वर्णो यस्य सः भिन्नवर्णः (बहु०) अधरश्चासौ ओष्ठः = अधरोष्ठः (कर्म०) भिन्नवर्णः अधरोष्ठो यस्य तत् = भिन्नवर्णाधरोष्ठम् (बहु०), न सकला = असकला ( नञ्० ) असकला व्यक्तिः यस्य तत् असकलव्यक्ति ( बहु० )। तव अनुसरणम् = त्वदनुसरणं ( ष० तत्० )। क्लिष्टा कान्तिर्यस्य सः क्लिष्टकान्तिः ( बहु० ) त्वदनुसरणेन क्लिष्टकान्तिः = त्वदनुसरणक्लिष्टकान्तिः ( तृ० तत्० ) तस्य ।

कोश:—नूनं तर्केऽथ निश्चये, इत्यमरः ।

टिप्पणीरुदितम्—रोदनमेव रुदितम् = रुद् धातु से भाव में क्त प्रत्यय करके ‘रुदितम्’ ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उच्छून—‘उच्छून’ शब्द की निष्पत्ति के विषय में महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने ‘उद्’ उपसर्गपूर्वक ‘टुओश्वि’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके ‘च्छ्वोः शूडनुनासिके च’ से ‘ऊठ्’ आगम करके ‘उच्छून’ शब्द निष्पन्न किया है, परन्तु यह प्रक्रिया प्रामादिकी है; क्योंकि ‘श्वि’ धातु के अन्त में ‘इ’कार है न कि वकार है अतः इस प्रक्रिया को छोड़कर यदि ‘उद् + श्वि + क्त’ ऐसी स्थिति में धातु के यजादि-गणपठित होने के कारण ‘वचिस्वपियजादीनां किति’ इस सूत्र से ‘व’ को ‘उ’कार सम्प्रसारण करके ‘सम्प्रसारणाच्च’ इस सूत्र से पूर्वरूप करके ‘श्वीदितो निष्ठायाम्’ इस सूत्र से इडागम का निषेध करके ‘हलः’ इस सूत्र से सम्प्रसारणरूप से आये हुए ‘उ’कार को दीर्घ करके ‘ओदितश्च’