मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २१३
इस सूत्र से निष्ठा के ‘त’कार को ‘न’कार आदेश करके, छत्वादि करके ‘उच्छून’ ऐसा रूप निष्पन्न किया जाय तो प्रक्रिया शुद्ध होगी। अशिशिरता— शिशिरस्य भावः इस विग्रह में ‘तस्य भावस्त्वतलौ’ इस सूत्र से तल् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके ‘शिशिरता’ रूप निष्पन्न होता है, न शिशिरता अशिशिरता यहाँ हेतु में तृतीया विभक्ति है। नञ् का अर्थ यहाँ विरोध में विवक्षित है। असकलव्यक्ति— यक्ष-पत्नी के मुँह पर सदा लटें लटकती रहती थीं अतः उसके मुँह की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती थी। इससे यह अनुमानित होता है कि वह केशों को नहीं सँवारती थी। केश का न सँवारना उसके लिए उचित भी था, क्योंकि वह प्रोषितभर्तृका थी। जिसका पति परदेश में हो उसे प्रोषितभर्तृका कहते हैं। एवं धर्मशास्त्र में प्रोषितभर्तृका के लिए शरीर को सँवारने का निषेध किया गया है। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्मृति में लिखते हैं—
क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषितभर्तृका ॥
इसका अभिप्राय यह है कि सती-साध्वी प्रोषितभर्तृका क्रीड़ा, शरीर-संस्कार (शरीर को सँवारना), समूह में जाना, उत्सव देखना, हास्य (मजाक) करना, दूसरे के घर में जाना—इन सबों का परित्याग कर दे।
अलङ्कारः— प्रस्तुत पद्य के ‘भिन्न-वर्णाऽधरोष्ठम्’ इस पद में पौनरुक्त्य प्रतीति होने के कारण ‘पुनरुक्तवदाभास’ अलङ्कार है। एवं प्रिया का मुँह चन्द्रमा के दीन भाव को धारण कैसे कर सकता है? इस शङ्का का समाधान ‘बिम्बप्रतिबिम्बभाव’ की कल्पना के द्वारा करने से ‘निदर्शना’ अलङ्कार है।
इन दोनों अलङ्कारों के परस्पर निरपेक्ष भाव से रहने के कारण ‘संसृष्टि’ अलङ्कार है ॥ २१ ॥
आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा
मत्साहृश्यं विरहतनु वा भावगम्यं लिखन्ती ।