मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २१५
किम् ? यतो हि त्वं तस्य प्रिया' इति पञ्जरस्थां मधुरभाषिणीं सारिकां पृच्छन्ती वा सद्यस्तव दृष्टिपथे आगमिष्यति ॥ २२ ॥
**हिन्दी—**हे मेघ ! वह मेरी प्रिया नित्य-नैमित्तिक देवपूजा में संलग्न या वियोग से दुर्बल तथा अनुमान से जानने योग्य मेरे चित्र को लिखती हुई अथवा मधुरभाषिणी पिंजड़े में बँधी हुई मैना को 'हे रसीली ! स्वामी का स्मरण करती हो क्या ? क्योंकि तुम उनकी प्यारी हो' इस प्रकार से पूछती हुई सद्यः तुम्हारे दृष्टि-पथ पर आयेगी ॥ २२ ॥
**समासः—**बलिषु व्याकुला=बलिव्याकुला ( स० तत्० ) । विरहेण तनु तत् विरहतनु ( तृ० तत्० ) । भावेन गम्यं भावगम्यं तत् (तृ० तत्०) । मधुरं वचनं यस्याः सा मधुरवचना ( बहु० ) ताम् ।
**कोशः—**कच्चित् काम-प्रवेदने, इत्यमरः । उपमायां विकल्पे वा, इत्यमरः। स्यात्प्रबन्धे पुरातीते निकटआगामिके पुरा, इत्यमरः । आलोको दर्शनद्योतौ, इत्यमरः ॥ २२ ॥
**टिप्पणी—**गम्यम्—गन्तुं योग्यं गम्यम् = 'गम्' धातु से यत् प्रत्यय करके 'गम्यम्' ऐसा रूप सिद्ध होता है । लिखन्ती—'लिख्' धातु से वर्तमान काल में लट् के स्थान पर शतृ आदेश करके नुम् करके स्त्रीत्वविवक्षा में ङीष् करके 'लिखन्ती' रूप निष्पन्न होता है । यहाँ 'लिखन्ती' इस शब्द के प्रयोग से यह ध्वनित होता है कि वह यक्षप्रिया बारंबार यक्ष का चित्र बनाती थी परन्तु अश्रुपात आदि से वह चित्र मिट-मिट जाता था, वह पुनः उसे चित्रित करती थी । पञ्जरस्थाम्—उपपद समास करके 'पञ्जर' उपपदक 'स्था' धातु से 'सुपि स्थः' से 'क' प्रत्यय करके ह्रस्व करके स्त्रीत्वविवक्षा से टाप् करके द्वितीया विभक्ति में 'पञ्जरस्थाम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । रसिके—रसोऽस्ति यस्याः इस विग्रह में 'रस' शब्द से 'अत इनि ठनौ' इस सूत्र से 'ठन्' प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'ठस्येकः' इस सूत्र से 'इक' आदेश करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके 'रसिका' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । इसी शब्द के सम्बोधन में 'रसिके ! ऐसा रूप निष्पन्न होता है । कहीं-कहीं रसिके ! के