मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २०७
अर्थात् कुएँ का जल, वट (बरगद) की छाया, श्यामा स्त्री और ईंटे का घर; ये सब ठंढे समय में गर्म और गर्म समय में ठंढे हो जाते हैं । शिखरिदशनाः- अभिधान-चिन्तामणिकार 'शिखर' शब्द का अर्थ पके हुए दाडिम का बीज करते हैं । वे कहते हैं—'पक्वदाडिमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः' पक्व-बिम्बाधरोष्ठी—यहाँ अधरोष्ठ में अधरश्चासौ ओष्ठश्च इसतरह कर्मधारय समास हो जाने पर प्राप्त वृद्धि को रोककर 'ओत्वोष्ठयोः समासे वा' इस सूत्र से ( अधर + ओष्ठ ) यहाँ विकल्प से पररूप हुआ है । एवं पक्व बिम्ब के साथ पुनः समास होने के पश्चात् 'नासिकोदरोष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च' इस सूत्र से विकल्प से 'ङीष्' हुआ है तब 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' रूप बना है, 'बिम्ब' कुंदरू फल को कहते हैं । यह लाल रंग का होता है, अतः यहाँ उसे उपमानरूप में ग्रहण किया गया है । मध्येक्षामा—यहाँ 'मध्य' शब्द से आयी सप्तमी-विभक्ति का समास होने पर भी 'अमूर्धमस्तकात् स्वाङ्गादकामे' इस सूत्र से अलुक हो गया है । आद्या = आदौ भवा आद्या = 'आदि' शब्द से 'दिगादिभ्यो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् हो गया है ।
अलङ्कारः—यहाँ 'अधर' एवं 'ओष्ठ' इन दो पर्यायवाची शब्दों की आवृत्ति होने से 'पुनरुक्तवदाभास' 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' यहाँ लुप्तोपमा, 'चकित-हरिणी-प्रेक्षणा' यहाँ पर भी लुप्तोपमा और 'सृष्टिराद्येव' इस जगह 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार है । परञ्च इन सब अलङ्कारों की परस्पर निरपेक्षता होने से संसृष्टि अलङ्कार है ।। १९ ।।
तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं मे द्वितीयं ** दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् ।** गाढोत्कण्ठां गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालां ** जातां मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम् ॥२०॥**
अन्वयः—सहचरे, मयि, दूरीभूते, चक्रवाकीम्, इव, परिमितकथाम्, एकाम्, ताम्, मे, द्वितीयम्, जीवितम्, जानीथाः । गाढोत्कण्ठाम्, बालाम्, गुरुषु, एषु, दिवसेषु, गच्छत्सु, शिशिरमथिताम्, पद्मिनीम्, वा, अन्यरूपाम्, जाताम्, मन्ये ।