भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २०७

अर्थात् कुएँ का जल, वट (बरगद) की छाया, श्यामा स्त्री और ईंटे का घर; ये सब ठंढे समय में गर्म और गर्म समय में ठंढे हो जाते हैं । शिखरिदशनाः- अभिधान-चिन्तामणिकार 'शिखर' शब्द का अर्थ पके हुए दाडिम का बीज करते हैं । वे कहते हैं—'पक्वदाडिमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः' पक्व-बिम्बाधरोष्ठी—यहाँ अधरोष्ठ में अधरश्चासौ ओष्ठश्च इसतरह कर्मधारय समास हो जाने पर प्राप्त वृद्धि को रोककर 'ओत्वोष्ठयोः समासे वा' इस सूत्र से ( अधर + ओष्ठ ) यहाँ विकल्प से पररूप हुआ है । एवं पक्व बिम्ब के साथ पुनः समास होने के पश्चात् 'नासिकोदरोष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च' इस सूत्र से विकल्प से 'ङीष्' हुआ है तब 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' रूप बना है, 'बिम्ब' कुंदरू फल को कहते हैं । यह लाल रंग का होता है, अतः यहाँ उसे उपमानरूप में ग्रहण किया गया है । मध्येक्षामा—यहाँ 'मध्य' शब्द से आयी सप्तमी-विभक्ति का समास होने पर भी 'अमूर्धमस्तकात् स्वाङ्गादकामे' इस सूत्र से अलुक हो गया है । आद्या = आदौ भवा आद्या = 'आदि' शब्द से 'दिगादिभ्यो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् हो गया है ।

अलङ्कारः—यहाँ 'अधर' एवं 'ओष्ठ' इन दो पर्यायवाची शब्दों की आवृत्ति होने से 'पुनरुक्तवदाभास' 'पक्वबिम्बाधरोष्ठी' यहाँ लुप्तोपमा, 'चकित-हरिणी-प्रेक्षणा' यहाँ पर भी लुप्तोपमा और 'सृष्टिराद्येव' इस जगह 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार है । परञ्च इन सब अलङ्कारों की परस्पर निरपेक्षता होने से संसृष्टि अलङ्कार है ।। १९ ।।

तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं मे द्वितीयं ** दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् ।** गाढोत्कण्ठां गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालां ** जातां मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम् ॥२०॥**

अन्वयः—सहचरे, मयि, दूरीभूते, चक्रवाकीम्, इव, परिमितकथाम्, एकाम्, ताम्, मे, द्वितीयम्, जीवितम्, जानीथाः । गाढोत्कण्ठाम्, बालाम्, गुरुषु, एषु, दिवसेषु, गच्छत्सु, शिशिरमथिताम्, पद्मिनीम्, वा, अन्यरूपाम्, जाताम्, मन्ये ।