मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ मेघदूतम्
कोशः—गोत्रं नाम्नि कुलेऽपि च, इत्यमरः। स्वराणां स्थापनाः सान्ताः मूर्च्छनाः सप्तसप्त हि, इति संगीतरत्नाकरः। आलोको दर्शनोद्योतौ, इत्यमरः।
टिप्पणी—मलिनवसने—पतिव्रता प्रोषितभर्तृका को मैला-कुचैला वस्त्र पहनना चाहिए। उसे तो पति के पीड़ित रहने पर पीड़ित, पति के प्रसन्न रहने पर प्रसन्न, पति के प्रवासी होने पर मलिनवस्त्रा एवं कृशाङ्गी और पति के मर जाने पर प्राणत्याग कर देना चाहिए। वही स्त्री पतिव्रता कहलाती है—
'आर्त्तार्त्ते मुदिते हृष्टाः प्रोषिते मलिना कृशा।
मृता म्रियेत या पत्यौ सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता ॥
महाकवि की उत्कृष्ट रचना अभिज्ञान-शाकुन्तल की नायिका शकुन्तला की स्थिति देखिये, दुष्यन्त से परित्यक्ता होने पर—
'वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः।
अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ॥
निक्षिप्य—'नि' उपसर्गपूर्वक 'क्षिप' धातु से क्त्वा प्रत्यय करके ल्यप् आदेश करके 'निक्षिप्य' रूप निष्पन्न होता है। गेयम्—गातुं योग्यम् इस विग्रह में 'गै' धातु से यत् प्रत्यय करके धातु के ऐकार को आकारादेश करके 'ईद्यति' इस सूत्र से ईत्व करके गुण करके 'गेयम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उद्गातुकामा—यहाँ (गै) 'गा' धातु से विहित तुमुन् प्रत्यय के मकार का 'तुं काममनसोरपि' इससे लोप हो गया है 'काम' पद आगे होने के कारण। कथञ्चित् सम्मेल्य—अपने प्रियतम के नाम से युक्त गीत को गाने की इच्छा यद्यपि यक्षपत्नी करती थी, परन्तु प्रियतम के स्मरण से आँखों में आँसुओं के आ जाने से वीणा की तारें भींग जाती थीं, जिसे वह किसी तरह मिलाती थी। परन्तु प्रियतम की याद में इतना निमग्न हो जाती थी कि वह स्वरचित मूर्च्छना को भी अन्यमनस्कता के कारण भूल जाती थी।
स्वर के आरोह-अवरोह क्रम को मूर्च्छना कहते हैं 'क्रमयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छना परिकीर्तिता' इति भरतः।
अलङ्कारः—यहाँ भी पूर्वश्लोक के समान 'विकल्प' अलङ्कार है ॥२३॥