मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २२१
मत्सङ्गम् – मम सङ्गः मत्सङ्गः, तम् । आस्वादयन्ती — 'आङ्' उपसर्गपूर्वक णिजन्त 'स्वादि' धातु से लट् के स्थान में शतृ प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में ङीप् करके आस्वादयन्ती ऐसा रूप निष्पन्न होता है । रमणविरहेषु — कहीं-कहीं 'रमणविरहे ह्यङ्गनानाम्' ऐसा पाठ मिलता है । उनका कहना है 'विरह' एक है, अतः एकवचनान्त पाठ होना चाहिए । परन्तु बहुवचनान्त पाठ ही यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि विरह के एकत्व रहने पर भी उसकी दुःसहता के कारण अतिशय दीर्घता का द्योतन बहुवचनान्त पाठ से होता है । काम की दशा के दश भेद हैं—
चक्षूरागस्तदनु मनसः सङ्गतिर्भावना च
व्यावृत्तिः स्यात्तदनु विषयग्रामतश्चेतसोऽपि ।
निद्राच्छेदस्तदनु तनुता निस्त्रपत्वं ततोऽनू-
न्मादो मूर्च्छा तदनुमरणं शिरसा प्रक्रमेण ॥
साहित्यदर्पण के निम्नलिखित नियम के अनुसार यहाँ २२वें श्लोक से २४वें श्लोक तक कुल तीन श्लोकों का 'आलोके ते निपतति पुरा' इस अंश के माध्यम से परस्पर सम्बन्ध होने के कारण यहाँ 'सन्दानितक' है । जैसा कि—
छन्दोबद्धपदं पद्यं तेनैकेन च मुक्तकम् ।
द्वाभ्यां तु युग्मकं सन्दानितकं त्रिभिरिष्यते ।
कलापकं चतुर्भिश्च पञ्चभिः (तदूर्ध्वं वा) कुलकं मतम् ॥
अलङ्कारः— पूर्व श्लोकों के समान यहाँ भी 'विकल्प' एवं सामान्य से विशेष का समर्थन होने से 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है । परस्पर दोनों अलङ्कारों का अङ्गाङ्गिभाव होने से 'संकर' अलङ्कार है ॥ २४ ॥
सव्यापारामहनि न तथा पीडयेन्मद्वियोगः
शङ्के रात्रौ गुरुतरशुचं निर्विनोदां सखीं ते ।
मत्सन्देशैः सुखयितुमलं पश्य साध्वीं निशीथे
तामुन्निद्रामवनिशयनां सौधवातायनस्थः ॥२५॥
१५ मे० दू०