मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० मेघदूतम्
**भावार्थः—**हे मेघ ! अथवा विरहदिनादारभ्य निश्चितावधेरवशिष्टान् मासान् गृहदेहल्यां स्थापितकुसुमैर्गणयन्ती, अथवा मनःसंकल्पितोपक्रमं मत्संभोग-सुखमनुभवन्ती ( सा मत्प्रिया तव दृष्टिपथे आगमिष्यति )। बाहुल्येन वधूनां दयितविरहेषु पूर्वोक्तोपायाः कालक्षेपोपायाः भवन्ति ।
**हिन्दी—**हे मेघ ! अथवा वियोग के दिन से प्रारम्भ समय की सीमा के बचे हुए महीनों को घर की देहली पर रखे हुए फूलों के द्वारा गिन-गिन कर पृथ्वी पर रखती हुई, अथवा मन में कल्पना के द्वारा आरम्भ किए हुए मेरे सहवाससुख का अनुभव करती हुई ( वह मेरी प्रिया तुम्हारे दृष्टि-पथ पर आयेगी )। प्रायः स्त्रियों का प्रियतम के वियोग के दिनों में ये मनोविनोद हुआ करते हैं ।
**समासः—**विरहस्य दिवसः=विरहदिवसः (ष० तत्०), तस्मात् स्थापितः=विरहदिवसस्थापितः ( ष० तत्०) तस्य। देहल्यां दत्तानि = देहलीदत्तानि ( स० तत् ० ), देहलीदत्तानि च पुष्पाणि = देहलीदत्तपुष्पाणि ( कर्म० ) तैः । हृदये निहिताः आरम्भाः यस्य सः=हृदयनिहितारम्भः (बहु०) तम्। रमणस्य विरहः = रमणविरहः ( ष० तत् ० ) तेषु ।
**कोशः—**गृहावग्रहणी देहली, इत्यमरः । परिच्छेदे बिलेऽवधिः, इत्यमरः । स्त्रियः सुमनसः पुष्पं प्रसूनं कुसुमं सुमम्, इत्यमरः । स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः ।
**टिप्पणी—स्थापितस्य—**णिजन्त 'स्थापि' धातु से कर्म में 'क्त' प्रत्यय करके 'स्थापितः' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। **देहलीदत्तपुष्पैः—**यहाँ हेतु में 'हेतौ' इस सूत्र से तृतीया हुई है। विन्यस्यन्ती—'वि' एवं 'नि' उपसर्गपूर्वक 'अस्' धातु से शतृ प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके 'विन्यस्यन्ती' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यक्षपत्नी अँगुली पर भी महीनों को गिन सकती थी, परन्तु 'देहली पर रखे हुए फूलों को गिनकर पृथ्वी पर रखती हुई' ऐसा लिखना मुग्धता के आधिक्य को द्योतन करने के लिए ही है।