भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २२३

हिन्दी—हे मित्र ! दिन में चित्र लेखन आदि कामों में लगी मेरी प्रिया को मेरा विरह वैसा पीड़ित नहीं करेगा, जैसा कि मनोविनोद के साधनों से रहित रात्रि में, अतः वह और भी दुःखी होगी, ऐसा मैं अनुमान करता हूँ। इसलिए मध्यरात्रि में जागती हुई, पृथ्वी पर सोयी हुई, पतिव्रता उस मेरी प्रिया को, महल की खिड़की पर स्थित होकर ( तुम ) मेरे सन्देशों से पर्याप्त सुख पहुँचाने के लिए देखना ॥ २४ ॥

समासः—व्यापारैः सहिता = सव्यापारा ( तुल्ययोग बहु० ) ताम्। मम वियोगः = मद्वियोगः ( ष० तत्० )। निर्गतो विनोदो यस्यः सा निर्विनोदा (बहु०) ताम्। गुरुतरा शुक् यस्याः सा गुरुतरशुक् (बहु०) तां गुरुतरशुचम्। उत्सृष्टा निद्रा यया सा उन्निद्रा ( बहु० ) ताम्। अवनिरेव शयनं यस्याः सा अवनिशयना ( बहु० ) ताम्। मम सन्देशाः = मत्सन्देशाः ( ष० तत्० ) तैः । वातस्य आयनं वातायनम् ( ष० तत्० )। सौधवातायने तिष्ठतीति सौधवातायनस्थः ( उपपदः )।

कोशः—शङ्का वितर्कभययोः, इति शब्दार्णवः। साध्वी पतिव्रता, इत्यमरः। अर्धरात्रं निशीथो द्वौ, इत्यमरः। क्षमावनिर्मेदिनी मही, इत्यमरः। अलं भूषणं पर्याप्ति शक्तिवारण वाचकम्, इत्यमरः।

टिप्पणीव्यापाराम्—वि एवं आङ् उपसर्गपूर्वक 'पृ' धातु से भाव में घञ् प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप् करके 'व्यापारा' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। वियोगः—'वि' उपसर्गपूर्वक 'युज्' धातु से भाव में घञ् प्रत्यय करके 'वियोग' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। कहीं-कहीं 'विप्रयोगः' ऐसा पाठ भी मिलता है। अर्थ में कोई भेद नहीं, व्युत्पत्ति में केवल धातु के पहले 'प्र' उपसर्ग और अधिक लगाना पड़ेगा। तथा—तेन प्रकारेण इस विग्रह में तत् शब्द से 'प्रकारवचने थाल्' इस सूत्र से थाल् प्रत्यय किया गया है। निर्विनोदाम्—'निर्' एवं 'वि' उपसर्गपूर्वक 'नुद्' धातु से घञ् प्रत्यय करके निर्विनोदाम् रूप निष्पन्न होता है। उक्त रूप द्वि० विभक्ति का है। गुरुतरशुचम्—अतिशयेन गुर्वी इति गुरुतरा=गुरु शब्द से तरप् प्रत्यय एवं स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् होता है।