मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ मेघदूतम्
शोचन्तं = शुक्, 'शुच्' धातु से क्विप् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप होकर चर्व्व होकर 'शुक्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । अवनिशयनाम्-पतिव्रता प्रोषितभर्तृका के लिए पर्यङ्कादि पर सोना निषिद्ध है, अतः यक्षप्रिया पृथ्बी पर सोती थी । साध्वी—'साधु' शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में गुणवाचक होने के कारण 'वोतो गुणवचनात्' इस सूत्र से 'ङीष्' प्रत्यय किया गया है । सन्देश—'सम्' उपसर्गपूर्वक 'दिश' धातु से घञ् प्रत्यय करके 'सन्देश' रूप निष्पन्न होता है । सौधवातायनस्थः—'सौध' शब्द का अर्थ अमरकोष के अनुसार चूने की लेप वाला महल होता है। यहाँ उक्तपद का प्रयोग 'कुबेर के राज-भवन के समान ही यक्ष का भवन भी था' इस बात को अभिव्यक्त करने के लिए किया गया है ।
यहाँ काम की दश अवस्थाओं में 'जागरण' अवस्था का वर्णन है ॥ २५ ॥
आधिक्षामां विरहशयने सन्निषण्णैकपार्श्वां प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः । नीता रात्रिः क्षण इव मया सार्धमिच्छारतैर्या तामेवोष्णैर्विरहमहतीमश्रुभिर्यापयन्तीम् ॥ २६ ॥
अन्वयः-आधिक्षामाम्, विरहशयने, सन्निषण्णैकपार्श्वाम, प्राचीमूले, कलामात्रशेषाम्, हिमांशोः, तनुम्, इव, या रात्रिः, मया, सार्धम्, इच्छारतः क्षण इव नीता, विरहमहतीम्, ताम्, एव, उष्णैः, अश्रुभिः, यापयन्तीम् (तां पश्य) ॥२६॥
व्याख्या—आधिक्षामाम् = मानसिकव्यथाक्षीणाम्, विरहशयने = वियोगतल्पे, सन्निषण्णैकपार्श्वाम् = सम्यङ्निलौनैकपार्श्वाम्, प्राचीमूले = पूर्वदिङ्मूले, कलामात्रशेषाम् = कलामात्रावशिष्टाम्, हिमांशोः = इन्दोः, तनुम् = शरीरम्, इव = यथा, स्थितामिति शेषः । या = पूर्वोपभुक्ता, रात्रिः = रजनी, मया = यक्षेण, सार्धम् = साकम्, इच्छारतैः = अभिलषितसुरतैः, क्षण इव = स्वल्पकाल इव, नीता = व्यतीता, विरहमहतीम्=वियोगविशालाम्, तामेव=तज्जातीयामेव रात्रिमिति भावः, उष्णैः = तप्तैः, अश्रुभिः = नेत्राम्बुभिः, यापयन्तीम् = गमयन्तीम् (तां पश्य) ॥ २६ ॥