भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २२५

शब्दार्थः—आधिक्षामाम् = मनोव्यथा से दुबली, विरहशयने=वियोग की शय्या पर, संन्निषण्णैकपार्श्वाम् = एक ही करवट से सोयी हुई, प्राचीमूले = पूर्व दिशा के मूल में, कलामात्रशेषाम् = कला मात्र ( सोलहवां अंश ) अवशिष्ट, हिमांशोः = चन्द्रमा के, तनुम् = शरीर के, इव = तरह, या=जो, रात्रिः=रात, मया=मेरे, सार्धम् = साथ, इच्छारतैः=अभिलषित संभोगों के द्वारा, क्षण इव = एक क्षण के समान, नीता = व्यतीत की गयी थी, विरहमहती = वियोग के कारण लम्बी, तामेव = उसी रात को, उष्णैः = गरम, अश्रुभिः = आँसुओं से, यापयन्तीम् = बिताती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २६ ॥

भावार्थः—हे मेघ ! मानसिकव्यथाकृशां विरहतल्पैकपार्श्वेन शयानाम्, पूर्वदिग्मूले कलामात्राऽवशिष्टामिन्दुमूतिमिव स्थिताम्, मया सह या रात्रिः सुरतक्रीडादिभिः क्षण इव नीता वियोगगुर्वी तामेव रात्रिमुष्णैः नेत्राम्बुभिर्गमयन्तीं तां मत्प्रियां पश्य ॥ २६ ॥

हिन्दी—हे मेघ ! मनोव्यथा से दुबली, विरहशय्या पर एक ही करवट से सोयी हुई, पूर्व दिशा के मूल में कलामात्र बची हुई चन्द्रमा की मूर्ति के समान जिन रातों को मेरे साथ संभोगों के द्वारा एक मिनट के समान बिताया था, विरह के कारण लम्बी उन्हीं रातों को गरम-गरम आँसुओं से बिताती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २६ ॥

समासः—आधिना क्षामा = आधिक्षामा ( तृ० तत्० ) ताम् । विरहस्य शयनम् = विरहशयनम् ( ष० तत्० ) तस्मिन् । सम्यक् निषण्णं = संन्निषण्णम् (कुगतिप्रादय इति समासः), संन्निषण्णमेकपार्श्वं यस्याः सा = संन्निषण्णैकपार्श्वा ( बहु० ) ताम् । प्राच्या मूलं = प्राचीमूलम् ( ष० तत्० ) तस्मिन् । कला एव कलामात्रम् ( मयूर व्यं० ) कलामात्रं शेषो यस्याः सा कलामात्रावशेषा ( बहु० ) । हिमा अंशवो यस्य स हिमांशुः ( बहु० ), इच्छया रतानि = इच्छारतानि (तृ० त०) तैः । विरहेण महती = विरहमहती (तृ० तत्०) ताम् ।

कोशः—पुंस्याधिर्मानसी व्यथा, इत्यमरः । हिमांशुश्चन्द्रमाश्चन्द्रः, इत्यमरः ।