मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२८ | मेघदूतम् |
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सलिलेन गुरूणि = सलिलगुरूणि ( तृ० तत्० ) तैः। अभ्रेण सहितं साऽभ्रम् ( तुल्ययोग बहु० ) तस्मिन् ।
कोशः—पादा रश्म्यङ्घ्रितुर्यांशाः, इत्यमरः। पक्ष्माऽक्षिलोम्नि किञ्जल्के तन्त्वाद्यंशेऽप्यणीयसि, इत्यमरः ।
टिप्पणी—प्रीत्या—प्रीणनं प्रीतिः=प्री धातु से क्तिन् प्रत्यय करके 'प्रीति' ऐसा रूप बनता है। यहाँ तृ० विभक्ति का रूप है। जो चन्द्रमा की किरणें पतिसहवास के समय अत्यन्त सुख देती थीं, वही किरणें आज प्रिय-विरह के समय दुःखद हो गयी हैं, अतः यक्षप्रिया की आँखें उसकी ओर जाकर भी तत्क्षण लौट आती हैं। छादयन्ती—'छद्' से णिच् करके लट् के स्थान में शतृ आदेश करके नुम् करके ङीप् करके 'छादयन्ती' ऐसा रूप बनता है। प्रबुद्धाम्—'प्र' उपसर्गपूर्वक 'बुध्' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके टाप् करके 'प्रबुद्धा' ऐसा रूप बनता है। यह रूप द्वि० विभक्ति का है। यहाँ 'विषयद्वेष' नामक कामदशा का कथन है।
अलङ्कारः—'अमृतशिशिराम्' यहाँ सामान्य वचन का लोप होने से लुप्तोपमा एवं 'स्थलकमालिनीमिव' यहाँ श्रौती उपमा है। एवं दोनों निरपेक्ष भाव से हैं अतः यहाँ संसृष्टि अलङ्कार है ॥ २७ ॥
निःश्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं
शुद्धस्नानात्परुषमलकं नूनमागण्डलम्बम् ।
मत्संभोगः कथमुपनयेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रा-
माकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
अन्वयः—शुद्धस्नानात्, पुरुषम्, आगण्डलम्बम्, अलकम्, अधरकिसलय-क्लेशिना, निःश्वासेन, विक्षिपन्तीम्, स्वप्नजोऽपि, मत्संभोगः, कथम्, उपनयेत्, इति, नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्, निद्राम्, आकाङ्क्षन्तीम् (तां पश्य) ॥२८॥