मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ मेघदूतम्
( दुःखने वाली ), कठिनविषमाम् = रूक्ष एवं ऊँची-नीची, एकवेणीम् = एक ही लड़ वाली, ताम् = उस केश की चोटी को, अयमितनखेन = बिना काटे हुए नखों वाले, करेण = हाथ से, गण्डाभोगात् = बड़े गालों पर से, असकृत् = बार-बार, सारयन्तीम् = हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २९ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! प्रथमे विरहदिने पुष्पमालारहिता या केशपाशी गुम्फिता, शापावसाने विगतशोकेन मयोद्वेष्टनीयां रूक्षां निम्नोन्नतां तामेव केशपाशीं, अकर्तितनखेन हस्तेन कपोलविस्तारात् पुनः पुनः अपसारयन्तीम् ( तां मत्प्रियां पश्य ) ॥ २९ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! पहले वियोग के दिन पुष्पमाला को त्यागकर जो बालों की चोटी गूंथी थी, शाप के बीत जाने पर शोकरहित होकर मेरे द्वारा खोली जाने वाली, छूने से क्लेश देने वाली, रूक्ष और ऊँची-नीची एक लड़ वाली उस चोटी को बिना कटे नाखूनों वाले हाथ के द्वारा अपने विस्तृत गालों पर से बराबर हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ।
समासः—विरहस्य दिवसः विरहदिवसः ( ष० तत्० ) । विगलिता शुक् यस्य स विगलितशुक् ( बहु० ) तेन । उद्गतं वेष्टनं यस्याः सा उद्वेष्टनीया ( बहु० ) ताम् । स्पर्शे क्लिष्टा = स्पर्शक्लिष्टा ( स० स० ) ताम् । कठिना चासौ विषमा = कठिनविषमा ( कर्म० ) ताम् । एका चासौ वेणी = एकवेणी (कर्म०) ताम् । अयमिताः नखाः यस्य स अयमितनखः (बहु०) तेन । गण्डस्य आभोगः = गण्डाभोगः ( ष० तत्० ) तस्मात् ।
कोशः—वेणी नदीभेदे कचोच्चये, इत्यमरः । गण्डौ कपोलौ, इत्यमरः । पुनर्भवः कररुहः नखः, इत्यमरः ।
टिप्पणी—दाम—यह 'दामन्' शब्द के द्वि० विभक्ति के एकवचन का रूप है, यह शब्द नपुंसकलिंगी है । हित्वा—त्यागने के अर्थ में विद्यमान ओहाक् धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके 'जहातेर्हिः' इस सूत्र से 'हो' को 'हि' आदेश करके 'हित्वा' रूप निष्पन्न होता है । बद्धाः—'बन्ध' धातु से