भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २३३

'क्त' प्रत्यय करके नलोपादि करके स्त्रीत्व विवक्षा में 'टाप्' करके 'बद्धा' ऐसा रूप बनता है। उद्वेष्टनीयाम्—'उद्वेष्टनं करोति' इस विग्रह में 'उद्वेष्टना' शब्द से 'तत्करोति तदाचष्टे' इस सूत्र से णिच् प्रत्यय होता है। पुनः उसका 'आख्यानात् कृतस्तदाचष्टे कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवच्च कारकम्' इस वार्तिक से कृत् प्रत्यय का लोप हो जाता है, तब 'उद्वेष्ट' इस नाम धातु से 'तव्यत्तव्याऽनीयरः' इस सूत्र से 'अनीयर्' प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् करके 'उद्वेष्टनीया' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यह द्वि० विभक्ति का रूप है। कठिनविषमा—यहाँ दोनों पद विशेषणवाचक हैं परन्तु पूर्वपद को विशेषण एवं उत्तरपद को विशेष्य मानकर "विशेषणं विशेष्येण बहुलम्” इससे समास हुआ। एकवेणीम्—एका चासौ वेणी ऐसा विग्रह जहाँ किया जाता है वहाँ 'पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः' इत्यादि सूत्र से समास होता है एवं 'पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु' इससे 'एका' को पुंवद्भाव किया जाता है।

यहाँ "चित्तविभ्रम" नामक कामदशा ध्वनित होती है।

अलङ्कारः—यहाँ 'स्वभावोक्ति' नामक अलङ्कार है॥ २९॥

सा संन्यस्ताभरणमबला पेशलं धारयन्ती शय्योत्सङ्गे निहितमसकृद् दुःखदुःखेन गात्रम्। त्वामप्यस्रं नवजलमयं मोचयिष्यत्यवश्यं प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्रान्तरात्मा॥ ३०॥

अन्वयः—अबला, संन्यस्ताभरणम्, असकृत्, दुःखदुःखेन, शय्योत्सङ्गे, निहितम्, पेशलम्, गात्रम्, धारयन्ती, सा, त्वामपि, नवजलमयम्, अस्रम्, अवश्यम्, मोचयिष्यति, प्रायः, आर्द्रान्तरात्मा, सर्वः, करुणावृत्तिः, भवति॥ ३०॥

व्याख्या—अबला=दुर्बला, संन्यस्ताभरणम्=परित्यक्ताऽलङ्कारम्, असकृत् =पुनः पुनः, दुःखदुःखेन=अतिशयक्लेशेन, शय्योत्सङ्गे=शय्यामध्ये, निहितम्