भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

उत्तरमेघः २३५

कोशः—गात्रं वपुः संहननम्, इत्यमरः । स्त्री योषिदबला, इत्यमरः । उत्सङ्गचिह्नयोरङ्कः, इत्यमरः ।

टिप्पणी—'अबला' यहाँ का नञ् अत्यार्थक है, इसका अर्थ दुर्बला होगा। दुःखदुःखेन—यहाँ दुःखप्रकारमिति='दुःखदुःखम्' ऐसा होता है क्योंकि 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से दुःख को द्वित्व एवं कर्मधारयवद्भाव हुआ है। नवजलमयम्—यहाँ 'नवजल' शब्द से प्रचुर अर्थ में 'तत्प्रकृतवचने मयट्' इस सूत्र से मयट् प्रत्यय हुआ है। मोचयिष्यति—णिजन्त 'मोचि' धातु के लट् लकार के प्र० पुरुष के एकवचन का यह रूप है। यहाँ इस क्रिया के कर्ता 'त्वम्' इस पद से द्वितीया विभक्ति हुई है। इसकी उपपत्ति महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने 'मुच्' धातु को पचादि गणपठित मानकर, अतएव द्विकर्मक होने के कारण 'द्विकर्मसु पचादीनामुपसंख्यानम्' इससे द्वितीया हुई है, ऐसा बताया है। परन्तु शारदारञ्जन राय ने उक्त वार्तिक के सिद्धान्तकौमुदी या काशिका आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में न होने के कारण इसकी उपपत्ति दूसरे प्रकार से बताई है। उनके मतानुसार 'मुच्' धातु के अण्यन्तावस्था का कर्ता जो 'त्वम्' यह पद है उसकी ण्यन्तावस्था में 'गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता सणौ' इस सूत्र से कर्म संज्ञा हो जाती है, तब द्वितीया विभक्ति होगी। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि राय जी ने 'मुच्' धातु को भी गत्यर्थक ही माना है।

इस श्लोक में 'दुःखदुःखेन शरीरं धारयन्ती' इस कथन से 'मूर्च्छा' नामक कामदशा अभिव्यक्त होती है जो नवीं दशा है। महाकवि ने यहाँ आठ ही कामदशाओं का वर्णन किया है, जबकि 'साहित्य-शास्त्र' के अनुसार काम की १० दशायें होती हैं। प्रथम 'चक्षूरागः' और अन्तिम 'मृत्यु', इन दो दशाओं का वर्णन नहीं किया है। प्रथम का तो इसलिए नहीं किया कि नयनप्रीति अर्थात् समागमन जिनका पहले होगा उन्हीं का वियोग होगा और यह काव्य वियोगावस्था से ही प्रारम्भ होता है और अन्तिम दशा का कथन रसभङ्ग के भय से नहीं किया।