मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २३७
अहंकार, माम् = मुझे, वाचालम् = अधिक बोलने वाला, न करोति=नहीं बना रहा है, ( किन्तु ) हे भ्रातः=हे बन्धु, यत्=जो कुछ भी, मया = मैंने, उक्तम् = कहा है। तत् = वह, निखिलम् = सभी, अचिरात् = शीघ्र ही, ते = तुम्हारी, प्रत्यक्षम् = आंखों के सामने आएगा ॥ ३१ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! मत्प्रियायाश्चित्तं मद्विषयेऽत्यन्तानुरागपूर्णमस्तीत्यहं जानामि। अस्मादहं तां स्वप्रियामस्मिन्नभूतपूर्ववियोगे तादृगवस्थाप्राप्तां संभावयामि। आत्मानं सौभाग्यशालिनं मत्वा नाऽहं बहु भाषयामि, ( अपितु ) हे भ्रातः ! यन्मयोक्तं तन्निखिलं त्वद्दग्गोचरीभविष्यति ॥ ३१ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! मेरी प्रिया का मन मेरे प्रति बहुत ही अनुरागपूर्ण है, ( इस बात को ) मैं जानता हूँ। इसलिए इस अभूतपूर्व वियोग में वह मेरी प्रिया 'ऐसी हो गयी होगी' ऐसा अनुमान करता हूँ। हे भाई ! मुझे 'अपने को सौभाग्यशाली समझने का अभिमान' अधिक बोलने वाला नहीं बना रहा है, ( अपितु ) जो कुछ भी मैंने उसकी दीन-दशादि का वर्णन किया है वह शीघ्र ही तुम्हारी आंखों के सामने आ जायेगा ॥ ३१ ॥
समासः—संभृतः स्नेहो यस्य तत् = संभृतस्नेहम् ( बहु० )। प्रथमश्चासौ विरहः प्रथमविरहः ( कर्मधा० )। इत्थं भूतामिति (सुप्सुपा)। सुभगम्मन्यस्य भावः = सुभगम्मन्यभावः ( ष० तत्० )। अक्षं प्रति इति = प्रत्यक्षम् ( अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीययेति समासः )।
कोशः—स्याज्जल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुगर्ह्यवाक्, इत्यमरः।
टिप्पणी—संभृतः = 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'भू' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके 'सम्भृतः' ऐसा रूप उपपन्न होता है। स्नेह—प्रीत्यर्थक 'स्निह्' धातु से 'घञ्' प्रत्यय करके स्नेह ऐसा रूप उपपन्न होता है। अस्मात्—यहाँ 'हेतौ' इस सूत्र से पञ्चमी हुई है। सुभगम्मन्य —आत्मानं सुभगं मन्यत इति 'सुभगम्मन्यः' यहाँ 'सुभग' उपपदक 'मन्' धातु से 'आत्ममाने खश्च' इस सूत्र से 'खश्' प्रत्यय करके 'अरुद्विषदजन्तस्य मुम्' इस सूत्र से मुमागम
१६ मे० दू०