मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४० मेघदूतम्
ब्राह्मण के लिए निषिद्ध है, भोग-योनि यक्ष इत्यादि के लिए उसका निषेध नहीं है, यक्षप्रिया पी सकती है, परन्तु प्रोषितभर्तृका के लिए 'मदिरा' त्याज्य होने के कारण वह मदिरा नहीं पीती, इसलिए छोड़े हुए भ्रूविलास को मानो वह भूल ही गयी है । उपरिस्पन्दि—इस वाक्य से इष्टप्राप्ति अर्थात् प्रियसमागम का लाभ ध्वनित होता है; क्योंकि नेत्र के ऊपरी भाग के फड़कने से इष्टप्राप्ति होती है । जैसा कि निमित्तनिदान में लिखा है—
'इष्टप्राप्तिं दृशोरूर्ध्वमपाङ्गे हानिमादिशेत् ॥' इति ।
मृगाक्षी—बहुव्रीहि समास से बने 'मृगाक्षि' शब्द से 'बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच्' इस सूत्र से समासान्त 'षच्' प्रत्यय होकर 'मृगाक्ष' ऐसा रूप बनता है । पश्चात् 'षिद्गौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से स्त्रीत्व विवक्षा में 'ङीष्' होकर 'मृगाक्षी' ऐसा रूप निष्पन्न होता है ।
अलङ्कारः—यहाँ उपमा अलङ्कार है एवं अन्यच्छायायोनि भी है, क्योंकि इसी अर्थ का श्लोक वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में आता है ।
तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्मराजीवृतं कृष्णविशालशुक्लम् ।
प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवाऽभिताम्रम् ॥ ३२ ॥
( वा० रा० सु०, २९।२ )
वामश्चास्याः कररुहपदैर्मुच्यमानो मदीयै-
र्मुक्ताजालं चिरपरिचितं त्याजितो दैवगत्या ।
सम्भोगान्ते मम समुचितो हस्तसंवाहनानां
यास्यत्यूरुः सरसकदलीस्तम्भगौरश्चलत्वम् ॥ ३३॥
अन्वयः—मदीयैः, कररुहपदैः, मुच्यमानः, चिरपरिचितम्, मुक्ताजालम्, दैवगत्या, त्याजितः, संभोगान्ते, मम, हस्तसंवाहनानाम्, समुचितः, सरसकदलीस्तम्भगौरः, अस्याः, वामः, ऊरुः, चलत्वम्, यास्यति ॥ २३ ॥