मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ | मेघदूतम्
सरसः (तुल्य० बहु०), कदल्याः स्तम्भः = कदलीस्तम्भः (ष० तत्०)। सरसश्चासौ कदलीस्तम्भः = सरसकदलीस्तम्भः (कर्म० धा०), सरसकदलीस्तम्भ इव गौरः = सरसकदलीस्तम्भगौरः (उपमान कर्म० धा०)।
**कोशः—**पुनर्भवः कररुहो नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः। संवाहनं मर्दनं स्यात्, इत्यमरः। कदली वारणबुसा रम्भा मोचांशुमत्, इत्यमरः।
**टिप्पणी—मदीयैः—**मम इमानि = मदीयानि। यहाँ 'अस्मद्' शब्द का 'त्यदादीनि च' इस सूत्र से वृद्ध संज्ञा होती है, एवं 'वृद्धाच्छः' इस सूत्र से वृद्धसंज्ञक 'अस्मद्' शब्द से 'छ' प्रत्यय होता है और उसके स्थान पर 'आयनेयं नीयीयः फढखछघां प्रत्ययादीनाम्' इस सूत्र से 'ईय्' आदेश होता है। पश्चात् 'प्रत्ययोत्तरपदयोश्च' इस सूत्र से 'अस्मत्' के स्थान में 'मत्' आदेश करके 'मदीय' पद की सिद्धि होती है। उक्त रूप तृतीया विभक्ति के बहुवचन का है। कररुहाः—'करं रोहन्ति' इस विग्रह में 'कर' उपपदपूर्वक 'रुह्' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय हुआ है। **मुच्यमानः—**मोचनार्थक 'मुच्' (लृ) धातु से लट् लकार एवं कर्म में यक् प्रत्यय लाकर 'लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे' इस सूत्र से 'लट्' के स्थान में 'शानच्' आदेश करके 'मुच्यमान' ऐसा शब्द उपपन्न होता है। **त्याजितः—**इस शब्द की उत्पत्ति के विषय मे भी ३०वें श्लोक के 'मोचयिष्यति' पद की तरह महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी एवं डा० शारदारञ्जन रायजी का वैमत्य है। मल्लिनाथजी ने 'द्विकर्मसु पचादीनां चोपसंख्यानमिष्यते' इस वार्तिक के आधार पर 'त्यज्' धातु को द्विकर्मक माना है, परन्तु यह मत सिद्धान्तकौमुदीमान्य नहीं है। अतः रायजी ने 'त्यज्' धातु को भी गत्यर्थक मानकर इसे द्विकर्मक माना है। यहाँ 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'णिच्' प्रत्यय हुआ है। यह 'ऊरु' का विशेषण है। यहाँ 'कर्मवाच्य' का प्रयोग होने से गौण कर्म 'ऊरु' में प्रथमा विभक्ति हुई है। संवाहनम्—'सम्' उपसर्गपूर्वक 'वह्' धातु से णिच् प्रत्यय करके फिर धातु संज्ञा करके 'करणाधिकरणयोश्च' इस सूत्र से 'ल्युट्' प्रत्यय हुआ है। **सरस—**इस शब्द से