भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २४५

धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'ल्यप्' करके 'अन्वास्य' रूप निष्पन्न होता है। याममात्रम्—यहाँ 'कालाऽध्वनोरत्यन्तसंयोगे' इस सूत्र से द्वितीया हुई है। सहस्व—यह रूप मर्षणार्थक ( ष ) सह् धातु के लोट्लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का है। यक्ष मेघ से एक प्रहर तक प्रतीक्षा करने को कहता है; क्योंकि 'संभोग' एक प्रहर से अधिक नहीं हो सकता, उसके बाद यदि तुम गर्जन करोगे भी तो वह मेरे सहवास सुख को प्राप्त कर चुकी होगी अतः उससे कोई क्षति नहीं होगी, मध्य में गर्जने से वह उक्त सुख से वञ्चित रह जाएगी, यह भाव है। रतिविलास में संभोग की परमावधि एक प्रहर माना गया है—‘परमा तु रतिर्यूनामिष्टा यामावसायिकी' इति । उपगूढम्—'उप' उपसर्गपूर्वक 'गुह्' धातु से 'नपुंसके भावे क्त' इस सूत्र ते 'क्त' प्रत्यय करके ढत्व ष्टुत्व आदि करके 'ढो ढे लोपः' इस सूत्र से धातु के ढकार के लोप हो जाने पर 'ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' इस सूत्र से धातु के 'उ'कार को दीर्घ करके 'उपगूढ' ऐसा बनता है।

अलङ्कारः—यहाँ 'याममात्रं' सहस्व के प्रति उत्तरार्ध का वाक्यार्थ हेतु है। अतः 'काव्यलिङ्ग' अलङ्कार है। एवञ्च 'भुजलता' यहाँ लुप्तोपमा है। इस प्रकार दोनों के अङ्गाङ्गिभावतया रहने से 'संकर' अलङ्कार है ॥ ३४ ॥

तामुत्थाप्य स्वजलकणिकाशीतलेनानिलेन प्रत्याश्वस्तां सममभिनवैर्जालकैर्मालतीनाम् । विद्युद्गर्भः स्तिमितनयनां त्वत्सनाथे गवाक्षे वक्तुं धीरः स्तनितवचनैर्मानिनीं प्रक्रमेथाः ॥३५॥

अन्वयः—(हे मेघ !) ताम्, स्वजलकणिकाशीतलेन, अनिलेन, उत्थाप्य, अभिनवैः, मालतीनाम्, जालकैः, समम्, प्रत्याश्वस्ताम्, त्वत्सनाथे, गवाक्षे स्तिमितनयनाम्, मानिनीम्, विद्युद्गर्भः, धीरः, स्तनितवचनैः, वक्तुम्, प्रक्रमेथाः ॥ ३५ ॥

व्याख्या—( हे मेघ ! ) ताम् = मत्प्रियाम्, स्वजलकणिकाशीतलेन =