भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

उत्तरमेघः २४७

यस्याः सा = स्तिमितनयना (बहु०) ताम् । विद्युत् गर्भः यस्य सः विद्युद्गर्भः ( बहु० ) । स्तनितान्येव वचनानि = स्तनितवचनानि ( रूप० क० ) तैः ।

कोशः—सुमना मालती जातिः, इत्यमरः । साकं सार्धं समं सह, इत्यमरः । क्षारको जालकं क्लीबे कलिका कोरकः पुमान्, इत्यमरः । सनाथं प्रभुमित्याहुः सहिते चित्ततापिनो, इति शब्दार्णवः । गर्भोपवारकेऽन्तःस्थे कुक्षिस्थे चार्भके मतः, इति शब्दार्णवः ।

टिप्पणीउत्थाप्य—'उद्' उपसर्गपूर्वक णिजन्त 'स्थायि' धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके पुगादि करके 'उत्थाप्य' ऐसा निष्पन्न होता है । प्रत्याश्वस्ताम्—'प्रति' एवं 'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'श्वस्' धातु से कर्ता में 'क्त' प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके 'प्रत्याश्वस्ता' ऐसा निष्पन्न किया जाता है, यह रूप द्वितीया विभक्ति के एकवचन का है । मानिनी—प्रशस्तो मानो यस्याः सा मानिनी । धीरः—यहाँ इस पद को देने का अभिप्राय 'दृढ़तापूर्वक यक्षपत्नी को भलीभाँति समझावे, क्योंकि स्त्रियाँ स्वभाव से घबरालू होती हैं, अन्यथा जो स्वयं दृढ़ नहीं हैं वह दूसरे को धैर्य कैसे बँधायेगा' यह है ।

अलङ्कारः—इस श्लोक में 'जालकैः समम्' यहाँ 'सहोक्ति' एवं 'स्तनित' में वचन आरोप प्रकृत कथन में उपयोगी है अतः 'परिणाम' अलङ्कार, एवञ्च दोनों के परस्पर निरपेक्ष भाव से रहने के कारण 'संसृष्टि' नामक अलङ्कार है ।। ३५ ।।

भर्तुर्मित्रं प्रियमविधवे ! विद्धि मामम्बुवाहं तत्संदेशैर्हृदयनिहितैरागतं त्वत्समीपम् । यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यतां प्रोषितानां मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥ ३६॥

अन्वयः—हे अविघवे ! माम्, भर्तुः, प्रियम्, मित्रम्, हृदयनिहितैः, तत्सन्देशैः, त्वत्समीपम्, आगतम्, अम्बुवाहम्, विद्धि । यः, अबलावेणिमोक्षोत्सु-

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