मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० मेघदूतम्
व्याख्या—हे मेघ ! इति = स्वपरिचयम्, आख्याते=कथिते सति (त्वयि) उन्मुखी = उन्नमितानना, सा = मत्प्रिया, उत्कण्ठोच्छ्वसितहृदया = औत्सुक्य-विकसितमना, मैथिली = सीता, पवनतनयम् = वायुसुतम्, हनूमन्तमित्यर्थः, इव = यथा, त्वाम् = मेघम्, वीक्ष्य = अवलोक्य, सम्भाव्य च = सत्कृत्य च, अस्मात् = वल्लभमैत्री-ज्ञानात्, परम् = अनन्तरम् अविहिता = सावधाना सति, तल्लीना सतीत्यर्थः, श्रोष्यति = आकर्णयिष्यति, एव = निश्चयेन, मत्सन्देशमिति शेषः । हे सौम्य != हे भद्र ! सीमन्तिनीनाम् = कामिनीनाम्, सुहृदुपगतः = मित्रनीतः, कान्तोदान्तः=वल्लभवृत्तान्तः, संगमात्=प्रियमिलनात्, किञ्चिदूनः=ईषन्न्यूनः, भवति इति शेषः ॥ ३७ ॥
शब्दार्थः—( हे मेघ !) = इस प्रकार, आख्याते = ( तुम्हारे ) कहने पर उन्मुखी = ऊपर की ओर मुँह किए; सा = वह मेरी प्रिया, उत्कण्ठोच्छ्वसित-हृदयः=उत्सुकता के कारण विकसित हृदय वाली (होती हुई), मैथिली = सीता, पवनतनयम् = हनुमानजी की, इव = तरह, त्वाम् = तुमको, वीक्ष्य = देखकर, सम्भाव्य च = और (तुम्हारा) सत्कार करके, अस्मात् = (तुम्हें पति का मित्र है यह जान लेने के), परम् = पश्चात्, अविहिता = सावधान (होकर) श्रोष्यति = ( संदेशों को) सुनेगी, एव = निश्चय ही । हे सौम्य != हे सज्जन ! सुहृदुप-गतः = मित्र के द्वारा लाया गया, कान्तोदान्तः=प्रिय का वृत्तान्त, संगमात् = प्रिय समागम से, किञ्चित = कुछ ही, ऊनः = कम होता है ॥ ३७ ॥
भावार्थः—हे मेघ ! अनेन प्रकारेण त्वत्कथिते सति जानकी हनुमन्तमिवोन्नतवदना विकसितचित्ता मत्प्रिया त्वां दृष्ट्वा सत्कृत्य च सावधाना सती मत्सन्देशमवश्यं श्रोष्यति, यतो हि कामिनीनां मित्र-प्राप्तः कान्तवृत्तान्तो वल्लभ-संगमादीषन्न्यूनो भवति ॥ ३७ ॥
हिन्दी—हे मेघ ! इस प्रकार तुम्हारे कहने पर जिस प्रकार सीताजी ने हनुमान् जी को देखा था और उनका सत्कार किया था उसी प्रकार मेरी प्रिया भी अपने मुँह को ऊपर उठाकर उत्सुकता से विकसित हृदय वाली होती हुई तुम्हें देखकर और तुम्हारा सत्कार करके, सावधान होकर मेरे सन्देश को अवश्य सुनेगी, क्योंकि हे सज्जन ! स्त्रियों के लिए मित्र के द्वारा लाया गया पति का वृत्तान्त प्रियसमागम से कुछ ही थोड़ा होता है ॥ ३७ ॥