भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २५१

समासः—पवनस्य तनयः = पवनतनयः ( ष० तत्० ) तम् । उन्नतं मुखं यस्याः सा उन्मुखी ( बहु० ) । उच्छ्वसितं हृदयं यस्याः सा उच्छ्वसितहृदया ( बहु० ), उत्कण्ठया उच्छ्वसितहृदया = उत्कण्ठोच्छ्वसितहृदया ( तृ० तत्०) । शोभनं हृदयं यस्य स सुहृद् (बहु०) । सुहृदा उपगतः = सुहृदुपगतः (तृ० तत्०) । कान्तस्य उदन्तः = कान्तोदान्तः ( ष० तत्० ) ।

कोशः—नारी सीमन्तिनी वधूः, इत्यमरः । वार्ताप्रवृत्तिर्वृत्तान्तमुदन्तः स्यात्, इत्यमरः । स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः ।

टिप्पणी—मैथिली—मथ्यन्तोऽत्र रिपव इति मिथिला । विलोडनार्थक 'मिथ्' धातु से 'मिथिलादयश्च' इस सूत्र से इलच् प्रत्यय करके मिथिला शब्द निष्पन्न होता है । मिथिलायां भवः इस विग्रह में 'मिथिला' शब्द से 'तत्र भवः' इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके 'मैथिल' ऐसा रूप निष्पन्न होता है । एवं स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् करके 'मैथिली' ऐसा निष्पन्न होता है । प्राचीन मिथिला के ( जिसे इस समय दरभङ्गा, मधुबनी, जनकपुर, तिरहुत आदि कहते हैं, ) राजा जनक थे और उन्हीं के द्वारा हल चलाते समय पृथ्वी से जानकीजी का जन्म हुआ था । ये हल के फाल पर मिली थीं अतः ये 'सीता' एवं मिथिला भूमि में जन्मी थीं इसलिए 'मैथिली' कही जाती हैं । पवनतनयम्—हनुमान्‌जी को 'पवन-तनय' कहा जाता है । उनका यह नाम क्यों पड़ा इस बात की चर्चा ग्रन्थ विस्तार से नहीं की जाती है । इन्होंने रामचन्द्र जी की अँगूठी (प्रत्यभिज्ञान) लेकर उनका दूत बनकर चार सौ कोष विस्तृत समुद्र को लाँघकर लङ्का में जाकर सीताजी का पता लगाया था और उन्हें रामचन्द्रजी का सन्देश सुनाया था । सीताजी ने भी हनुमान् को रामचन्द्रजी का पक्का दूत समझ लेने के बाद उनका सत्कार किया था, जैसा कि वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में ये श्लोक आये हैं—

विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राज्ञस्त्वं वानरोत्तम ।
येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्षितम् ॥
शतयोजनविस्तीर्णः सागरो मकरालयः ।
विक्रमश्लाघनीयेन हनुमता गोष्पदी कृतः ॥ इत्यादि ।