भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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२६२ मेघदूतम्

शब्दार्थः—( हे प्रिये ! ) प्रणयकुपिताम् = प्रेम में रूठी हुई, त्वाम् = तुमको (तुम्हारे चित्र को), धातुरागैः = गेरू आदि रंगों के द्वारा, शिलायाम् = पत्थर पर, आलिख्य = लिखकर, आत्मानम् = अपने को ( अपने चित्र को ) ते = तुम्हारे, चरणपतितम् = पैरों पर गिरा हुआ, कर्तुम् = चित्रित करना, यावत् = जबतक, इच्छामि = चाहता हूँ, तावत् = उसी समय, मुहुः = बार-बार प्रवृद्धैः = उमड़े हुए, अस्रैः = अश्रुओं से, मे = मेरी, दृष्टि = आँखें, आलुप्यते = डूब जाती हैं ( डब-डबा जाती हैं )। क्रूरः = कठोर, कृतान्तः = भाग्य, तस्मिन् = उस चित्र में, अपि = भी, नौ = हम दोनों का, संगमम् = मिलन, न सहते = नहीं सहता है ॥ ४२ ॥

भावार्थः— हे प्रिये ! प्रेमकुपितां त्वच्चित्रं गैरिकादिधातुवर्णैः प्रस्तरपट्टे विलिख्य स्वप्रतिकृतिं यावत् त्वच्चरणपतितां चित्रितुमिच्छामि तावदेव भूयो भूयः प्रवृद्धैरश्रुभिर्मम नेत्रमाव्रियते, निर्दयो विधिः चित्रेऽप्यावयोः सहवासं न क्षमते ॥ ४२ ॥

हिन्दी—( हे प्रिये ! ) प्रणय में कुपित तुम्हारे चित्र को गेरू आदि रंग से पत्थर पर लिखकर अपने चित्र को जब तक तुम्हारे पाँवों पर गिरा हुआ चित्रित करना चाहता हूँ, तभी बार-बार उमड़ते आंसुओं से मेरी आँखें डब-डबा जाती हैं। कठोर विधाता चित्र में भी हम दोनों के मिलन को नहीं सहन करता ॥ ४२ ॥

समासः— प्रणये कुपिता = प्रणयकुपिता ( स० तत्० ) ताम्, धातव एव रागाः = धातुरागाः (रूपक०) तैः । चरणयोः पतितः = चरणपतितः (स० तत्०) तम् । कृतः अन्तः येन सः कृतान्तः ( बहु० ) ।

कोशः— सारङ्गादौ च रागः स्यादातारुण्ये रञ्जने पुमान्, इति शब्दार्णवः । नृशंसो धातुकः क्रूरः, इत्यमरः । कृतान्तो यमसिद्धान्तदैवाकुशलकर्मसु, इत्यमरः । धातुर्वार्त्ताऽऽदिशब्दाऽऽदि गैरिकादिषु, इति यादवः ।

टिप्पणी—कुपिता—'कुप्' धातु से कर्ता में 'क्त' प्रत्यय करके इडादि करके स्त्रीत्व-विवक्षा में टाप् करके 'कुपिता' यह रूप बनता है। क्रोध दो प्रकार का होता है। एक तो ईर्ष्याजन्य क्रोध और दूसरा प्रणयकोप । रतिकाल में नायिका का बनावटी क्रोध रतिवर्धक ही होता है, यक्ष, उसी समय का स्मरण