भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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२६४ | मेघदूतम्

वियों के; मुक्तास्थूलाः = मोतियों के समान बड़े, अश्रुलेशाः = आंसुओं की बूँदें (बाष्पकण) तरुकिसलयेषु = वृक्षों के पल्लवों पर, बहुशः = बहुत, न पतन्ति = नहीं गिरते (इति = ऐसा) न = नहीं; अपितु गिरते ही हैं, खलु = निश्चय ॥४३॥

भावार्थः— हे प्रिये ! स्वप्नावलोकनेषु मया महता यत्नेन लब्धायास्तव गाढाऽऽलिङ्गनार्थमाकाशे प्रसारितबाहु मां पश्यन्तीनामरण्यदेवीनां मौक्तिक-पीवराः ( बाष्प-बिन्दु-रूपाः ) अश्रवः पतन्त्येव ॥ ४३ ॥

हिन्दी— हे प्रिये ! स्वप्न देखने में मैं बहुत प्रयास से जब तुम्हें पाता हूँ और तुम्हारे गाढ़ आलिङ्गन के लिए आकाश में बाहुओं को फैलाता हूँ, उस समय मुझको देखने वाली वनदेवियों के मोतियों की तरह बाष्पबिन्दु क्या वृक्षों के पल्लवों पर न गिर पड़ते, अपितु अवश्य गिर जाते हैं ।

समासः— स्वप्ने संदर्शनानि = स्वप्नसंदर्शनानि (तृ० तत्०) तेषु । निर्गता दया यस्मात् सः निर्दयः ( बहु० ) निर्दयश्चासौ आश्लेषः निर्दयाश्लेषः, स एव हेतुः = निर्दयाश्लेषहेतुः ( रूपक० ) तस्य । प्रणिहितो भुजो येन स प्रणिहित-भुजः ( बहु० ) आकाशे प्रणिहितभुजः = आकाशप्रणिहितभुजः ( स० तत् ० ) तम् । स्थलीनां देवताः = स्थलीदेवताः (ष० तत्०) तासाम् । मुक्ता इव स्थूलाः = मुक्तास्थूलाः ( उपमित कर्म० ) अश्रूणां लेशाः—अश्रुलेशाः ( ष० तत्० ) । तरुणां किसलयानि = तरुकिसलयानि ( ष० तत्० ) तेषु ।

कोशः— स्वप्नः सुप्तस्य विज्ञानम्, इति विश्वः । दर्शनं समये शास्त्रे दृष्टौ स्वप्नेऽक्षिण संविदि, इति शब्दार्णवः । भुज बाहू प्रवेष्टो द्वोः, इत्यमरः ।

टिप्पणी— ऊपर दिये गये शब्दार्णव कोश के अनुसार स्वप्न का अर्थ संवित् = ज्ञान होता है एवं दर्शन का भी वही अर्थ होता है । इस प्रकार 'स्वप्नसंदर्शने' में 'पुनरुक्ति' नामक काव्य-दोष की प्रसक्ति होती है, परन्तु 'सामान्यविशेष' न्याय से यह पुनरुक्ति दोष नहीं होता । जैसे आम्र = शब्द का अर्थ ही आम्र वृक्ष है पुनः 'आम्रवृक्ष' यहाँ पर वृक्ष सामान्य एवं आम्रविशेष है उसी तरह यहाँ भी 'स्वप्न' एक विशेष ज्ञान है, ऐसा समझना चाहिए ।

दर्शन— 'दृश' धातु से करण में ल्युट् प्रत्यय करके 'दर्शन' ऐसा रूप निष्पन्न होता